
इंदौर :- दुनिया में विभिन्न रंगों का समावेश है।चाहे वह रंग प्रकृति के खूबसूरत रंग हो चाहें मानव द्वारा निर्मित सुंदर आकर्षक रंग।रंग के बिना कोई भी सौंदर्य पूर्ण नहीं हो सकता है।तभी तो भारतीय सनातन परंपरा में रंगों पर विशेष पर्व त्यौहार की परंपरा सदियों से चली आ रही है। भारत के प्राचीन ग्रंथ मीमांसा सूत्र,गाह्या सूत्र, नारद पुराण,भविष्य पुराण में भी होली रंगों का पर्व का उल्लेख मिलता है। भगवान श्री कृष्णराधा को रंगों के पर्व होली का जन्मदाता माना जाता है। रंग उत्सव की शुरुआत बरसाना की होली, ग्वालबाल संग होली, लट्ठमार होली, राधा संग होली उत्सव आज भी जीवित होकर जनमानस में सक्रिय है। होली वसंत ऋतु की विदाई और फागुन मास के आगमन का सूचक है। सरसों के पीले पुष्प, गेहूं की बालियां, पलाश की लालिमा, टिशु के फूल, चंपा चमेली की खुशबू,कचनार कली भांग, बूटी और किसानों के खेत से फगुनाहट के स्वर रोचक और मनमोहक कर देते हैं।उम्र की सीमाओं से परे हटकर, जाति धर्म संप्रदाय के बंधन से मुक्त होकर रंगों के उत्सव में संस्कृति और संस्कार की मिलीजुली रंगते पेश की जाती है। एकता में विविधता भारत देश की पहचान है। देश के विभिन्न भागों में रंगोत्सव मनाने के अंदाज भी भिन्न-भिन्न है।होलिका दहन के पश्चात धुलीवंदन और रंगपंचमी पर मालवा निमाड़ में परंपरागत गेर का भव्य आयोजन का इतिहास रहा है ।इंदौर, देवास, उज्जैन, ग्वालियर, भोपाल,सागर सतना रीवा जैसे शहरों में परंपरागत गेर आयोजन का प्रचलन है। प्राचीन ग्रंथो से ज्ञात होता है कि यह परंपरा ब्रज मंडल की होली के प्रचलन से प्रारंभ हुई है।वहीं से यह अन्य शहरों में मध्यप्रदेश, राजस्थान उत्तर प्रदेश ,जैसे विभिन्न राज्यों में गेर आयोजन की परंपरा की शुरुआत हुई। गेर होली पर्व के पांच दिन बाद पंचमी के शुभ अवसर पर निकाली जाती है।यह रंग पंचमी मनाने का एक अलग अंदाज माना जाता है। इंदौर की गेर की बात सबसे अलग है।यह गेर मध्यप्रदेश ही नहीं वरन पूरे विश्व भर में सुप्रसिद्ध है।इंदौर की गेर का इतिहास कई सौ वर्ष पुराना माना जाता है। कहां जाता है कि इसकी शुरुआत होलकर राजवंश ने की थी।होलकर शासन काल में राजवाड़ा परिसर से राजा प्रजा के साथ होली खेलते थे।रंगभरी टंकी में लोगों को डूबाने की घटना, होली मनाने वाले हुरियारे सामूहिक रूप से एक दूसरे को रंगने के लिए शहर की सड़कों पर निकलते थे।यहां रंग पंचमी मनाने की अपनी खास शैली है। इस दिन इंदौर में राजवाड़ा से शुरू होकर जेलरोड, विजयनगर,सराफा बाजार,भवरकुवा जैसे मुख्य मार्गों पर पानी से भरे टैंकों से रंगों की बौछार की जाती है। गेर की यह परंपरा निमाड़ मालवा में खूब प्रसिद्ध है। राजा रजवाड़ों के शासन समाप्त होने के बाद भी इंदौर की जनमानस ने गेर परंपरा रंगीन परंपरा को अब तक अपने सीने से लगा रखा है। आज के जनप्रतिनिधि नगरनिगम,सत्तापक्ष,विपक्ष के जनप्रतिनिधि गेर परंपरा के चल समारोह में होली रंग में इतिहास रच देते हैं।सभी धर्म परंपरा के लोग इसमें शामिल होकर गेर उत्सव को जमीन से लेकर आसमान तक रंग ही रंग से भर देते हैं।गेर में हाथी,घोड़े,बग्गियों के साथ आदिवासी लोगों की टोली भी आकर्षण का केंद्र रहती है।बड़े-बड़े टैंकरों में रंग भरकर मोटर पंप के जरिए भीड़ पर फेंका जाता है।सड़क पर,अपने घरों पर कई मंजिल ऊपर खड़े लोग भी इस रंग से नहीं बच पाते हैं। होलकर शासनकाल में प्राकृतिक रंग टेसू के फूल से बनाए जाते थे। होली की अग्नि को महाराज होलकर स्पर्श करते फिर वह प्रज्वलित होती थी। फिर रियासत का राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत होता था।होलकर राजवंश की आर्मी के 20 गार्ड पांच हवाई फायर और तोप की आवाज से होली के आयोजन की शुरुआत होती थी। आज भी पूरा इंदौर शहर इसमें शामिल होता है सभी दुकानदार होटल,मॉल, कंपलेक्स,परिवहन,स्कूल,कॉलेज, विश्वविद्यालय का समूह रंग पंचमी की गेर परंपरा को धूमधाम से मनाते हैं।
डॉ.विजय पाटिल शिक्षक सह साहित्यकार
सेंधवा जिला बड़वानी मप्र