(आलेख : बादल सरोज)
इति सिरी संघ पुराणे, भारत खण्डे, यूजीसी काण्डे, द्वितीयो अध्याय के साथ रंगमंच पर जो शुरू हुआ है, उसमे नाटक के छहों तत्व पूरे उरूज पर हैं। एकदम चुस्त और ठीये तक पहुंचाने वाला कथानक है, अपनी-अपनी भूमिकाएं पूरे तालमेल के साथ निबाहने वाले पात्र हैं, दादा कोंडके की अगली पीढ़ी के द्विअर्थी से बहुअर्थी होते संवाद हैं, मोनालिसा दृष्टि से हरेक के अनुकूल दीखते हुए भी प्रतिकूल बनी रहने वाली मंच सज्जा है, सुव्यवस्थित थीम है, पात्रों की सज्जा है : रूप बदल-बदल कर, कई बार तो बिना रूप बदले ही वही अभिनेता लौट-फिरकर अनेक-अनेक भूमिकाओं में अवतरित हो रहा है : एक पल में एक इंसान — डॉ जैकिल – नजर आता है, अगले पल में बिना चोला बदले शैतान — मिस्टर हाईड – में बदल जाता है।
विडम्बना से भरपूर कथानक में रहस्य भी है, रोमांच भी है। त्रासद व्यंग और जुगुप्सित हास्य — ब्लैक ह्यूमर और डार्क कॉमेडी – के साथ एक डरावने दु:स्वप्न को यथार्थ में बदलने की मंशा भी है। निर्माता, निर्देशक, सूत्रधार और पटकथा लेखक एक ही है, इसलिए इस तरह की विसंगतियों का संगति में होने जैसा अस्वाभाविक, स्वाभाविक भी है।

इस बार शुरुआत सर्वोच्च व्यास पीठ से हुई। उस सुप्रीम कोर्ट ने, जिसने असम के मुख्यमंत्री का नरसंहार के लिए उकसाने वाला वीडियो, मुस्लिम समुदाय के प्रति हिंसा के खुले आव्हान का प्रमाण सामने आने और यूपी के मुख्यमंत्री योगी के ऐसे ही विभाजनकारी बयानों को प्रस्तुत किये जाने के बाद भी उसका संज्ञान लेने से इंकार कर दिया था। सीपीएम और अन्य जागरूक भारतीयों की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि उसके पास ‘पहले से ही बहुत से काम है’। जिसके पास ऐसे भड़काऊ, आग लगाऊ मामलों की सुनवाई के लिए वक्त नहीं था, उसी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अगुआई वाली युगल खंडपीठ ने आनन-फानन में इतनी फुर्ती दिखाई कि दूसरे पक्षों को समुचित अवसर दिए बिना ही, पहली और आरंभिक सुनवाई में ही उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को मजबूत बनाने वाली यूजीसी की गाइड लाइन्स — प्रमोशन ऑफ़ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्युशंस रेगुलेशन 2026 – पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी।
माननीय जज यह तक भूल गए कि ये गाइड लाइन्स – नए नियम – अचानक से नहीं बन गए थे। यूजीसी या केंद्र सरकार ने अपने आप स्व-विवेक से नहीं बनाए थे। जातिगत आधार पर उत्पीडन के चलते आत्महत्या जैसा भयानक कदम उठाने वाले रोहित वेमुला और मुम्बई की युवा डॉक्टर पायल तडवी की माँओं द्वारा दायर याचिकाओं के निराकरण में दिए स्वयं उनके — सुप्रीम कोर्ट के — फैसले का परिणाम थे। उन्होंने बहुत सोचे-समझे से तरीके से इस तथ्य को अनदेखा कर दिया कि ये कथित गाइड लाइन्स खुद उन्हीं – मतलब सुप्रीम कोर्ट – के हस्तक्षेप, निर्देश और देखरेख में, सभी राजनीतिक दलों की भागीदारी वाली संसदीय समिति के सर्वसम्मत अनुमोदन और देश भर के लोगों से राय, सलाह, सुझाव और आपत्तियों को मांगे जाने की प्रक्रिया पूरी किये जाने के बाद पूरे छह साल में बनी थीं।
कि ये 14 साल पहले 2012 में बने ऐसे ही नियमों का थोड़ा-सा सुथरा और सुधरा रूप थीं। कि खुद इसी कोर्ट ने ही सारे तथ्यों की जांच के बाद यह पाया था कि 2012 के नियम अपना मकसद पूरा करने में असफल रहे हैं, इसलिए उन्हें थोड़ा दुरुस्त करने, शिकायत मिलने और उसके निराकरण होने की प्रक्रिया की समय सीमा तय करते हुए उसे पारदर्शी बनाये जाने की जरूरत है।
मसला सिर्फ इतना भर नही है कि सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खण्डपीठ ने यह सब जानने के बावजूद स्टे दे दिया, यह भर भी नहीं है कि केंद्र सरकार और यूजीसी की तरफ से खड़े हुए सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता के मुंह से बोल तक नहीं फूटे, उन्होंने जो ऊपर लिखा जा चुका है, उसकी याद तक माननीय न्यायमूर्तियों को नहीं दिलाई। जिस बात की उन्हें तनखा मिलती है, वह – याचिका का विरोध करने और सरकार का पक्ष रखने की — ड्यूटी भी नहीं निभाई। इन सबके साथ, इससे ज्यादा चिंताजनक वे टिप्पणियाँ हैं, जो सीजेआई ने की हैं।
अदालतों की खबर रखने वाली खबरिया साइट्स और अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक़, उन्होंने जो बोला वह एक तरह से दुराग्रही याचिकाकर्ताओं के कहे को दोहराने जैसा था। फटाफट दिए स्टे का औचित्य बताते हुए 29 जनवरी, 2026 को दिए गए इस आदेश में कहा कि ये नए नियम “प्रथम दृष्टया अस्पष्ट” हैं और इनका दुरुपयोग समाज में विभाजन पैदा कर सकता है। यह भी कि ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को केवल दलित, आदिवासी और ओबीसी के खिलाफ भेदभाव के रूप में परिभाषित किया गया है और इस तरह “सामान्य श्रेणी के छात्रों को उनके साथ किये जाने वाले जाति-आधारित भेदभाव के मामलों में सुरक्षा से बाहर रखता है।“
इस तरह सर्वोच्च अदालत ने भारतीय समाज की एक नई, अब तक ‘छुपी’ रही स्थिति को दर्ज किया है कि इस देश में सामान्य श्रेणी के नागरिको को भी ‘उच्च जाति’ का होने के चलते प्रताड़ना और भेदभाव भुगतना पड़ता है!! व्यास पीठ इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंची, इस पर आगे देखेंगे। फिलहाल तो यह देखना दिलचस्प होगा कि अगली सुनवाई में इस नई खोज की पुष्टि में किस तरह के तथ्य और घटनाओं के ब्यौरे सामने लाये जाते हैं। अभी तो यह देख लेते हैं कि इस स्टे के बाद हुआ क्या? और इस सर्वोच्च व्यास पीठ से लेकर सड़क तक जो हुआ, क्या उसकी कोई पारस्परिक संबद्धता – बोले तो क्रोनोलोजी – है?
व्यास पीठ ने इन नियमों के कारण ‘समाज में विभाजन पैदा’ होने की जिस आशंका के आधार पर यह असाधारण कदम उठाया था, वह आशंका स्थगित हो गयी? नहीं , इसके ठीक उलट, जातिश्रेष्ठता का दंभ भरने वाला जिन्न पूरी नग्नता के साथ नाचने लगा। सवर्ण समावेशों का दावा करने वाले झुंडों की अगुआई में दिल्ली सहित देश के कई शहरों में आक्रामक प्रदर्शन शुरू हो गए। गैर-सवर्ण समुदायों के लिए ‘जूते मारो …. को’ सहित ऐसे नारे लगाए जाने लगे, जैसे अब तक सिर्फ अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के लिए आरक्षित रखे जाते थे। क्या यह सब अनायास और स्वतःस्फूर्त तरीके से होने लगा या यह जिसकी सौवीं वर्ष मन रही है, उस आरएसएस द्वारा, अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की महापरियोजना का यूजीसी अध्याय है? कौन है यह लोग? किस कुनबे से इनकी नाभि नाल के संबंध हैं? यह जानना इस पूरी दुष्ट परियोजना को समझना आसान बनाएगा।
जिन्होंने यूजीसी की नयी गाइडलाइन्स को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, वे श्रीमान विष्णु शंकर जैन उपनाम के हिसाब से तो जैन हैं, मगर उनकी ख्याति “हिंदू कानूनी योद्धा’’ की है। अपने आपको “वैचारिक रूप से दक्षिणपंथी” बताते हैं और ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ के प्रवक्ता और कर्ताधर्ता हैं। यह वह संस्था है, जिसका धंधा सैकड़ों हजारों वर्ष पुरानी इमारतों को हिन्दू मंदिर बताने के दावे ठोकना है। बनारस के ज्ञानवापी, मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि, अयोध्या विवाद के मामलों के याचिकाकर्ता रहे हैं। कुतुब मीनार परिसर में पूजा के अधिकार, ताजमहल को शिव मंदिर बताने वाले दावों के कर्णधार रहे हैं। मुकदमा ठोककर वक्फ अधिनियम की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती देने का काम भी इनके खाते में जुड़ा है। इनके पिता, वरिष्ठ वकील हरि शंकर जैन बाबरी मस्जिद–राममंदिर प्रकरण में वकील थे और उन्हीं की सहायता करके इन श्रीमान ने अपने कैरियर की शुरुआत की थी। उनकी इन्हीं योग्यताओं के चलते सितंबर 2022 में, केंद्र सरकार ने उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में पैनल वकील के रूप में नियुक्त किया था, इस हैसियत से विभिन्न मामलों में सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं। मतलब यह कि दो पीढ़ी से संघी कुनबे के संग हैं।
सुप्रीम कोर्ट के स्टे आर्डर के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू में वहां के छात्र होने का दिखावा करते हुए जो भीड़ जमा की गयी थी, उसमें ज्यादातर छात्र नहीं, बल्कि ख़ास तरह के यू-ट्यूबर थे। गाली-गलौज की भाषा में नारेबाजी करने वाले, ब्राह्मणवाद जिंदाबाद का उदघोष करने वाले इस यू-ट्यूबर गैंग की अब तक की कर्म-कुंडली सामने आ चुकी है। इनमें एक यू-ट्यूबर मेघा लवरिया है, जिसे अक्सर भड़काऊ बयान देते देखा जाता है।
साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और हिंसा का आव्हान उनका मुख्य सुर है। “एक बार बंगाल में भाजपा की सरकार आने दीजिए, फिर हम बताएंगे कि बांग्लादेशी रोहिंग्या को कैसे निकाला जाता है’ से “मैं तो कहती हूं ऐसी वोट चोरी होनी चाहिए, डंके की चोट पर होनी चाहिए।“ जैसे कुछ वायरल बयानों को देखकर उनके राजनीतिक रुझान को जाना जा सकता है। दूसरी रूचि तिवारी हैं, जिनके विडियोज साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के साथ, उससे अधिक दलित-आदिवासियों के प्रति नफरत से भरे होते है। उनके प्रति ‘हम’ और ‘वे’ की भाषा में बात करना उनका मुख्य लहजा है। “वे आरक्षण चाहते हैं, लेकिन कहते हैं जातिवाद मत करो” जैसे शीर्षक वाले खुले दलित विरोधी विडियो बनाना उनकी वह उपलब्धि है, जिस पर कुनबा उन पर मोहित हैं।
लगता है, ये दोनों युवतियां नहीं जानतीं कि जिस ब्राह्मणवाद के जिंदाबाद के नारे लगा-लगाकर वे अपना गला बिठाए हुए हैं, वह भस्मासुर जब पूरी तरह जाग्रत हो जाएगा, तब वह शूद्रों और पिछड़ों की तरफ बाद में जाएगा, सबसे पहले अपनी परिभाषा में जिन्हें शूद्रातिशूद्र कहता है, उन महिलाओं – यानि खुद इन्हीं मोहतरमाओं की गर्दन का नाप लेने आयेगा। उमा भारती इसे भुगत चुकी हैं, जब मुख्यमंत्री का पदभार संभालते हुए उन्होंने मनुस्मृति लहराते हुए उसके आधार पर राज चलाने का खम ठोका था – जो जल्दी ही उन्हीं पर अमल में आयी।
कुल जमा यह कि यूजीसी के बहाने देश भर में – अभी खासकर हिंदी भाषी प्रदेशों में जो सवर्णवादी, अब साफ़-साफ़ शब्दों में ब्राह्मणवादी, उन्माद भडकाया जा रहा है, उसका सूत्रधार, पटकथा लेखक, निर्माता-निर्देशक, यहाँ तक कि एक्टर सप्लायर भी आरएसएस है। इधर जिसे वे हिन्दू समाज मानते हैं, उसके 90 प्रतिशत हिस्से को जूते मारे जाने के युद्धोन्माद का शंख फूँका जा रहा था, उधर लखनऊ में सरसंघचालक मोहन भागवत ठीक इस सबके बीच सभी हिदुओं की एकता का मंत्रोच्चार कर रहे थे। हिन्दू धर्म से सनातन धर्म और अब शुद्ध सनातन – ब्राह्मण धर्म – तक पहुंचना सौवीं वर्ष में असली एजेंडे पर आना है।
यूपी बिहार में यादव बनाम अन्य, दलितों में जाटव बनाम अन्य, हरियाणा में जाट बनाम पैंतीस जात की सोशल इंजीनयरिंग के जरिये जिस भुतहा खँडहर की तामीर की जानी थी, वह यही था। उन्हें खुद पता है कि हिन्दू एकता जिस चिड़िया का नाम है, वह सिर्फ जुमलों में पाई जाती है। असली चिड़ियाएँ तो उस जाल में लपेटकर फंसाकर रखी जानी है, जिसका नाम ब्राह्मणवाद है। स्टे देते समय दिया गया सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच का यह निष्कर्ष कि “सामान्य श्रेणी के छात्रों को उनके साथ किये जाने वाले जाति-आधारित भेदभाव के मामलों में सुरक्षा से बाहर रखता है।“ इसी निरंतरता में पढ़ा जाना चाहिए ।
इसे पढ़कर सुप्रीम कोर्ट के अब तक के प्रसिद्ध और कालजयी महत्वपूर्ण फैसले सुनाने वाले जजों में से एक जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर और ताजा फैसला सुनाने वाले दोनों माननीय जज सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की जाति की याद आई। दोनों माननीय जन्मना ब्राह्मण हैं। सिर्फ धुर अज्ञानी या पीड़ितों के जातिगत उत्पीडन का सवाल उठाने को ही जातिवाद मानने वाले डेढ़ चतुर ज्ञानी ही होंगे, जो कहेंगे कि क्या जजों की जाति का संज्ञान लिया जाना चाहिए? कि न्यायपालिका में न्याय की आसंदी पर बैठने वालों की भी भला कोई जाति होती है? यूं तो होने को एक समय वह भी था, जब कहा जाता था कि ‘जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान, मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान।’ मगर हाल के वर्षों में साधू और साध्वियां ज्ञान से ज्यादा अपनी जाति की पहचान का बखान करते मिलते हैं। जिन्हें ईश्वर और भगवान माना जाता है, उनकी जातियां और उप-जातियां तक ढूंढ ली गयी हैं।
गरज यह कि जाति-श्रेष्ठता की चेतना परवरिश का हिस्सा होती है और अपना प्रभाव छोडती है, उसका निष्प्रभावीकरण – डीटोक्सीफिकेशन – अपने आप नहीं होता, इसे करना होता है।
जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर ने सर्वोच्च अदालत का जज रहते हुए ही कहा था कि “न्यायाधीशों की नियुक्ति से पहले उनके पिछले जीवन और कामकाज के रिकॉर्ड, सामाजिक पृष्ठभूमि, वर्गीय पूर्वाग्रह और सांप्रदायिक झुकाव की जांच की जानी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे तटस्थ और धर्मनिरपेक्ष हैं।“ उनका कहना था कि लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समता का सोच सहज सामाजिक परिवेश और परवरिश का हिस्सा नहीं है।“ जस्टिस अय्यर का मानना था कि “जजों को जमीनी हकीकत का ज्ञान होना चाहिए, क्योंकि उनका सामाजिक-वर्गीय दृष्टिकोण फैसलों को प्रभावित करता है।“ 29 जनवरी को एक बार फिर साबित हुआ कि उनकी आशंका निराधार नही थी।
सवाल इन दोनों माननीयों भर का नहीं है। विभिन्न मीडिया विश्लेषणों और नागरिक समाज की रिपोर्टों के अनुसार, 2023 के अंत तक सर्वोच्च न्यायालय के लगभग 34 न्यायाधीशों में से 14 यानी लगभग 41% ब्राह्मण थे। स्वतंत्रता के बाद से, भारत के लगभग 30% मुख्य न्यायाधीश ब्राह्मण रहे हैं।
यही स्थिति उच्च न्यायालय और निचली न्यायपालिका की है। वर्ष 2020 की एक रिपोर्ट के अनुसार, उच्च न्यायालय के 330 न्यायाधीशों में से लगभग 166 ब्राह्मण समुदाय से थे। यह असंतुलन बदला या सुधरा नहीं है।
फरवरी 2026 में राज्यसभा को दी गई जानकारी के अनुसार, देश की उच्च न्यायपालिका में 2021 से अब तक नियुक्त हुए जजों में से लगभग 73% से 80% जज ‘सामान्य’ या ‘उच्च जाति’ पृष्ठभूमि से हैं।
यही हाल असली राज चलाने वाली नौकरशाही का है। सीपीआई (एम) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास के आईएएस, आईपीएस और आईएफएस के रिक्त पदों और ओबीसी, एससी और एसटी अधिकारियों के प्रतिनिधित्व के बारे में पूछे गए सवाल पर केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने बताया कि जनसंख्या में ओबीसी 55%, एससी 24%, एसटी 10% हैं, किन्तु आईएएस और आईपीएस में इनका प्रतिनिधित्व 10% से भी कम है।
उनके द्वारा दिए गए आंकड़ों के हिसाब से देश भर के आईएएस में ओबीसी 245 (4.3%), एससी 135 (2.4%), एसटी 67 (1.2%), आईपीएस में ओबीसी 255 (5.5%), एससी 141 (3%), एसटी 71 (1.4%), तथा आईएफएस में ओबीसी 231 (10.6%), एससी 95 (4.3%), एसटी 48 (2.2%) हैं, जबकि आईएएस का 92%, आईपीएस के 90% और आईएफएस के 82% अधिकारी सामान्य वर्ग से आते हैं।
यूजीसी के नए नियम इस, अश्लीलता की हद तक, बेहूदा अनुपात को बदलने की अत्यंत क्षीण संभावना प्रस्तुत करते हैं, उस पर भी खड़ा किया जा रहा तूमार घुटने के पेट की तरफ मुड़ने के सिवा कुछ नहीं है।
(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)