13 अप्रैल / जन्मदिवस
सिन्धु घाटी की सभ्यता विश्व़ की प्राचीनतम् सभ्यता है। सिन्धु नदी के तट पर ही वेदों की रचना हुई थी। सिन्ध प्रान्त सन्तों, महात्माओं व ऋषियों का पावन स्थल रहा है। सभ्यता, संस्कृति व सदाचार के लिए विख्यात सिन्ध प्रांत में सिन्धु गौरव अमर शहीद संत भगत कंवरराम साहिब जी का जन्म सिन्ध के सन्त खोताराम साहिब जी के वरदान से 13 अप्रैल सन् 1885 ईस्वी को बैसाखी के दिन सिन्ध प्रांत में सक्खर जिले के मीरपुर माथेलो तहसील के जरवार ग्राम में हुआ था। उनके पिता श्री ताराचंद और माता श्रीमती तीरथ बाई दोनों ही सरल स्वभाव के थे। ईश्व़र में विश्व़ास रखने वाले, सन्तों-महात्माओं की सेवा में तत्पर, प्रभु भक्त़ि एवं हरि कीर्तन करके संतोष और सादगी से अपना जीवन व्यतीत करते थे।

उदरपूर्ति के लिए ताराचंद एक छोटी सी दुकान चलाते थे। उनके जीवन में संतान का अभाव था। सिन्ध के परम संत खोताराम साहिब के यहां माता तीरथ बाई हृदय भाव से सेवा करती थीं। संत के आशीर्वाद से उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम ‘कंवर’ रखा गया। कंवर का अर्थ है ‘कंवल’ अर्थात कमल का फूल। नामकरण के समय संत खोताराम साहिब ने भविष्यवाणी की कि जिस प्रकार कमल का फूल तालाब के पानी और कीचड़ में खिलकर दमकता रहता है, वैसे ही इस जगत में ‘कंवर’ भी निर्मल, विरक्त़ होगा और सारे विश्व़ को कर्तव्य पथ, कर्म, त्याग और बलिदान का मार्ग दिखाएगा।
बाल्यावस्था से ही संत कंवरराम जी की रुचि ईश्व़र भक्त़ि और भजन कीर्तन में थी। उनके मधुर स्वर की गूंज गांव के आस-पास हर जगह फैली हुई थी। उनकी माता उन्हें कुंहर (झुरगा/चने) उबाल कर बेचने के लिए देती थीं। वह अपने मधुर स्वर से गाते, आवाज़ लगाते हुए कुंहर बेचा करते थे। जरवार ग्राम में सिन्ध के महान संत खोताराम साहिब के सुपुत्र संत सतराम दास जी का संध्या समय कीर्तन हो रहा था। उसी समय कुंहर बेचने के लिए मधुर सुरीली और बुलंद आवाज़ में किशोर कंवर की ध्वनि संत के कानो तक गई। झुरगा/चने को सिन्धी भाषा में ‘कुंहर’ कहा जाता है। कुंहर का अर्थ ऐसा ही समझा जा सकता है कि कोई मेरे पापों को हर ले, शांत करे।
संत सतराम दास जी ने कुंहर बेचने वाले सुरीले किशोर कंवर को सेवादारियों के माध्यम से बुलवाया और आग्रह किया कि वे उसी बुलंद और मधुर स्वर में पुन: गाएं। उनके सुरीले सुरों की मधुरता और अंर्तभाव ने संत हृदय को मोहित कर दिया। संत सतराम दास जी ने उनके सभी कुंहर (झुरगा/चना) ले कर संगत में बंटवा दिए और कुंहर की कीमत के पैसे भी कंवर ने न लेकर संपूर्ण कुंहर उनके चरणों में रख दिए। संतजी के आशीर्वाद की अनेक धाराएं निकल पड़ीं। पहली मुलाकात में ही कंवरराम जी गुरु महाराज की आध्यात्म पूंजी के उत्तराधिकारी बन गए।
बाल्यकाल से शदाणी संत तनसुख राम साहिब के शिष्य सूरदास ‘भाई हासारामजी’ (हयात पिथाफी) के कड़े अनुशासन में रहने के कारण कंवरराम संयमी और नम्र तो थे ही, यौवनावस्था में वे फल लगे वृक्ष की तरह झुक गए। उनका जन्म भी संतों के आशीर्वाद का ही परिणाम था। बाल्य और किशोर जीवन दोनों ही संतों के संग में व्यतीत हुआ। संतों के व्यक्त़ित्व के प्रभाव के कारण वे सदैव ईश्व़रीय चिंतन में खोए रहते थे। भाई ताराचंद को अपने पुत्र का गुमसुम रहना नहीं भाया। वे उसे लेकर रहड़की दरबार में उपस्थित हुए। वहां संत सतराम दास साहिब भी कुंहर बेचने वाले इस अदभुत बालक की मानों व्याकुलता से प्रतीक्षा कर रहे थे। औपचारिक निवेदन के उपरांत भाई ताराचंद ने इस बालक के जन्म का आशीर्वाद संत खोताराम साहिब द्वारा दिए जाने की जानकारी भी दी। दिव्यता का आकर्षण एक तरफ नहीं होता अपितु दोनो ओर से होता है। जहां कंवर राम को संत सतराम दास साहिब की सेवा में जाने की व्याकुलता थी, वहीं संत सतराम दास साहिब को भी सुयोग्य शिष्य पाने की अभिलाषा व्यग्र किए हुए थी।
गुरु की अधर-सुधा से अभिसिंचित वाणी जब गंभीरता से प्रस्फुटित हुई, कंवर राम साहिब का हृदय कमल खिल उठा। वे रहड़की के लोक प्रसिद्ध दरबार में स्वीकार कर लिए गए। उनके पिता भाई ताराचंद तो अत्यंत हर्ष से कण्ठ के अवरुद्ध हो जाने के कारण केवल नमन मात्र ही कर सके। एक भी शब्द उनके मुख से नहीं निकल पाया। हर्ष था पुत्र के स्वीकारे जाने का तो मलाल था पुत्र रत्न से बिछुड़ने का। दोनों भावों से भरे, वे सच्चे संत से विदा लेकर अपने घर लौट आए।
मृदुभाषी संत कंवरराम में कभी अभिमान, कटुता, छल-कपट या लोभ जन्म न ले सका। संगीतज्ञ हासारामजी से उन्होंने गायन शिक्षा प्राप्त की। अपने गुरु संत सतराम दास साहिब जी की सेवा में रहकर वे बड़े ज्ञानी ध्यानी बन गए। उनके सदगुणों के कारण उन्होंने कंवरराम जी को गायन, नृत्य और संगीत विद्या में प्रवीण कर दिया। वे अपने गुरु के साथ जगह-जगह परंपरागत ‘भगत’ (सिन्धी भगत एक सिन्धी लोक कला है जिसमें गीत, नृत्य, कहानी और नाटक शामिल होते हैं। यह मनोरंजन का सबसे लोकप्रिय सिन्धी लोक रुप है।) कार्यक्रम प्रस्तुत करते रहे। गुरु सतराम दास जी के परम् धाम सिधारने के पश्च़ात उनका सारा भार संत कंवरराम जी के कांधों पर आ पड़ा। सिर पर पगड़ी, तन पर जामा पहनकर और पैरों में घुंघरु बांधकर संत कंवर राम गांव-गांव जाकर ‘भगत’ के माध्यम से ईशवंदना, प्रभु भक्त़ि, आध्यात्मिक, नैतिक और मानवीय आदर्शों और साम्प्रदायिक सदभाव का प्रचार करते थे। संतजी बोलचाल में अत्यंत सादे और सरल थे, वे सफेद खादी की धोती, कुर्ता, कंधे पर गमछा, सिर पर गोल टोपी या पगड़ी, पैरों में जैसलमेरी जूती धारण करते थे। कीर्तन के समय उनके पहनावे की झलक संत तुकाराम, नामदेव में देखी जा सकती है और गायन के समय प्रभु भक्त़ि में लीन होकर नृत्य करते रहना श्रद्धालुओं को चैतन्य महाप्रभु का सजीव दर्शन कराता था।
संत कंवरराम जी की दिव्य कंचन काया में अनोखी आकर्षण शक्त़ि थी। हृदय में मधुरता का झरना था। मुख से मधुर और नम्र बोल निकलते थे। उनकी आवाज़ में अत्यधिक मिठास थी, उनके कलाम, भजन में ऐसी तासीर थी कि संत कंवरराम साहिब की भक्त़ि की जानकारी मिलते ही हज़ारों की तादाद में आस-पास के गांवों के हिंदू-मुसलमान एकत्रित हो जाया करते थे। संत कंवरराम साहिब के गीतों व उनकी रचनाओं में ईश्व़र अल्लाह का समान रुप से समावेश होता था। इसलिए जहां हिन्दू उनके भगत में जाने के लिए आतुर रहते थे तो वहीं मुसलमान उनके गीतों व कलामों के दीवाने थे तथा उनके भगत में बढ़–चढ़कर हिस्सा लिया करते थे। वे सिन्ध के तानसेन कहे जाते थे। वे अक्सर अमृत वेला में गाते थे और दिन के दो पहर तक उनका भजन उसी तन्मयता के साथ चलता रहता था। दूर-दूर से आए हुए लोग उनके मधुर गायन का आनंद लेते थे, उनके गायन में ज्यादा हिस्सा सूफी कलामों का होता था। वे कलाम केवल लोगों के लिए नहीं बल्कि सिन्धी सूफी संस्कृति के पैगाम को जन-जन तक पहुंचाने के लिए प्रचारक बनकर गाते थे। उनमें स्वयं को जानने पहचानने का ज्ञान, निष्कपट प्रेम और नैतिकता समाई हुई थी।
संत कंवरराम जी की आवाज में एक सोज़ था, दर्द था। वे भक्त़ि में मग्न होकर गाते थे और दिल पर जादू कर देते थे। लोग मंत्रमुग्ध होकर उनकी आवाज का अमृत पीते थे, उनके गीत सुनते थे। संत कंवरराम साहिब जी ने ना जाने कितने ही कलाम गाए..? पर उन सबसे उत्तम, सबसे सुंदर, सबसे मीठा कलाम और गीत यदि कोई था, तो वह स्वयं उनका जीवन ! उनकी जिंदगी ख़ुद एक गीत की तरह ही थी। जिसका एक ही अर्थ था, “प्रभु को न भुलाओ। दुखी, दरिद्र, दीन गरीब मिस्किन ही हैं ठाकुरजी के टूटे हुए रुप। उनकी सेवा करो। उनको सुखी रखने का प्रयास करते रहो।”
इस महापुरूष के प्रयासो से भारत के संतों और सूफियों की अमरवाणी सिन्ध के शहर-शहर, गांव-गांव और घर-घर गूंजी। वे कबीर, मीरा, सूरदास, गुरु नानक, सामी, सचल सरमस्त के अतिरिक्त भारत के अनेक महान कवियों और दरवेशों के दोहों और भजनों और राजा विक्रमादित्य, राजा हरीशचंद्र, भक्त़ ध्रुव और भक्त प्रहलाद आदि की गाथाओं को अपनी मधुर और खनकती हुई आवाज़ में गाते थे। ऐसा प्रतीत होता था मानों भक्त़ि संगीत का कोई विशाल समागम हो रहा हो। उन्होंने धर्म, नस्ल और जाति के भेद-भाव को अपने निकट नहीं आने दिया। उनकी बुलंद आवाज़ अंधेरे और खामोशी को चीरती हुइ मीलों तक सुनाई देती थी। उनके श्रद्धालु भांप जाते थे कि निकट ही किसी गांव में संत कंवरराम की भगत का आयोजन हो रहा है।
उन्होंने भगत के कार्यक्रम के माध्यम से सत्य, अहिंसा, साम्प्रदायिक सौहार्द, विश्व़बंधुत्व, ईशवंदना, मानवीय प्रेम, समता और नैतिक आचरण का संदेश आम और खास तक पहुंचाया। संत कंवरराम त्याग और तपस्या की प्रतिमूर्ति, जीवन के मर्म को जानने वाले ऋषि, दया के सागर, दीन दुखियों, यतीमों और विकलांगों के मसीहा थे। जहां उनके मुख मण्डल पर किसी ऋषि सा तेज झलकता था वहीं उनके नेत्रों से नूर बरसता था। मानव सेवा ही उनका मुख्य ध्येय था। अपंगो, नेत्र हीनों, रोगियों एवं कुष्ठ-रोगियों की सेवा अपने हाथों से करके वे स्वयं को धन्य मानते थे। सेवा के क्षेत्र में संत कंवरराम साहिब का नाम सर्वोच्च स्थान पर आता है। उनके परोपकारी एवं आध्यात्मिक जीवन ने मानव के संस्कारो में कल्याण, सर्व धर्म समभाव, परोपकार एवं मानव आदर्शों को नई दिशा प्रदान की है।
चालीस वर्ष की अदभुत गुरु भक्त़ि में संतजी के जीवन में अनेक घटनाएं घटीं। शिकारपुर के शाही बाग में प्रभात के समय एक महिला ने अपने मृत शिशु को संत की झोली में लोरी के लिए दिया। बच्चा मृत है, इस बात से उसकी मां के अतिरिक्त सभी लोग अनजान थे, संत कंवरराम जी ने हृदय भाव से प्रभु आराधना करके लोरी गाई। संतजी की गोद में बच्चा रोने लगा। यह चमत्कार देखकर महिला संत के चरणों में गिर कर फूट-फूटकर रो पड़ी। उसने बालक के मृत होने की बात सारी संगत को सुनाई। वहां उपस्थित संगत स्तब्ध हो गई। ऐसे मधुर भाषी और महान संत थे संत कंवर राम साहिब। इसी प्रकार कई अन्य उदाहरण भी मिलते हैं। वे सदैव सामाजिक समरसता, एकता और भाईचारे का प्रचार करते रहे। साम्प्रदायिक सदभाव के विरोधी एक बड़े हठधर्मी पीर ने हिंदूओं से बदला लेने के लिए अपने अनुयाइयों को उकसाया। उन दिनों संत कंवरराम जी हिंदूओं में एक प्रसिद्ध और गौरवशाली व्यक्त़ि थे। उन्हें ही इस प्रतिशोध का केंद्र बनाया गया।
संत कंवरराम साहिब जी ने मांझांदन दरबार में अपने जीवन का अंतिम भजन गाया। “आओ कांगा कर गाल्ह” , जो कि मारु राग का कलाम है। राग मारु मातम का राग है, जो सिर्फ दुख की घड़ी या गमी पर गाया जाता है।
1 नवम्बर 1939 का दिन मानवता के इतिहास में अति कलंकित और दुखदाई रहा। मांझांदन के दरबार में भाई गोविंद रामजी के वर्सी महोत्सव में भजन के पश्च़ात दादू नगर में किसी बालक के नामकरण अवसर पर पहुंचे। भजन के पश्च़ात भोजन करने के समय उनके हाथ से कौर छूट गया। संत मन ही मन प्रभु की माया को समझते हुए उनकी कृपा का स्मरण करते रहे और उन्होंने समक्ष रखी भोजन की थाली एक ओर कर दी। अपनी भजन मण्डली के साथ संत कंवरराम जी गाड़ी बदलने की दृष्टि से रात्रि 10 बजे ‘रुक’ जंक्शन स्टेशन पर पहुंचे। दो बंदूकधारियों ने आकर उन्हें प्रणाम किया और अपने कार्य सिद्धि के लिए संतजी से दुआ मांगी। त्रिकालदर्शी संत कंवरराम साहिब ने उन्हें प्रसाद में अंगूर देते हुए, उनसे कहा कि अपने पीर मुर्शिद को याद करो। उनमें विश्व़ास रखो, कार्य अवश्य पूरा होगा। संतजी रेल के डिब्बे में प्लेट फार्म की दूसरी ओर वाली सीट पर खिड़की से सट कर बैठ गए और अपनी मण्डली के एक साथी से अखबार जोर-जोर से पढ़कर सुनाने को कहा। उन्होंने अपने अंगरक्षकों की बंदूकें ऊपर की सीट पर रखवा दीं। अंधेरी रात में, गाड़ी के चलते ही बंदूक-धारियों ने संतजी को निशाना बनाकर गोलियां दाग दीं। सिन्ध की पावन धरती एक महात्मा के पवित्र खून से रंग दी गई। सर्वधर्म सदभाव का ध्वज फहराने वाले, मानवता के मसीहा ने ‘हरे राम’ कहते हुए प्राण त्याग दिए। पूरे सिन्ध में हाहाकार मच गया। उनके शहीद होने की खबर पूरे सिन्ध, हिंद के कोने-कोने में आग की तरह फैल गई। यह खबर सुनते ही स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, बाज़ार सभी बंद हो गए। चारों तरफ मातम छा गया। समस्त नर-नारी, बच्चे, हिंदू-मुसलमान बिलख-बिलख कर अपने आत्मीय के लिए रो रहे थे। दीपावली का पर्व आया तो सिन्ध में दिए नहीं जलाए गए।
आग लगी आकाश में झर-झर बरसे अंगार
संत न होते जगत में तो जल मरता संसार
संत अद्भ़ुत व्यक्त़ित्व कृतित्व से भरे-पुरे होते है, जो अपने साधनामय जीवन में अर्जित ज्ञान, तपस्या को समाज में समर्पित करना ही जीवन का लक्ष्य मानते है, अमर शहीद संत भगत कंवरराम साहिब सिन्धियो के एक ऐसे संत जिनके दर से कभी भी कोई खाली नहीं जाता है। ऐसी मधुर आवाज के धनी की मुर्दे भी जी उठे। ऐसे करुणामय जिन्होंने अपने कातिल को भी रामनाम और सफलता का आशीर्वाद दिया। सेवा, भक्त़ि और बलिदान के साक्षात् स्वरुप मस्त-मलंग ईश्व़र भक्त़ि में लीन होकर भक्त़िमय हो गये।
अपने जीवन मूल्यों से मानवता को सेवा, भक्त़ि, बंधुत्व और बलिदान का मार्ग दिखाने वाले ऐसे सिन्ध प्रान्त के प्रतिष्ठित श्रद्धेय संत अमर शहीद भगत कंवरराम साहिब जी ने नैतिक आचरण का संदेश आम और खास सभी तक पहुंचाया है। सिन्ध के सरताज अमर शहीद संत शिरोमणी भग॒त कंवर राम साहिब जी के 141वें जन्मोत्सव पर उनके श्री चरणों में कोटि-कोटि नमन.!
संकलन एवं साभार प्रस्तुति:-
इन्दू गोधवानी..रायपुर..✍️ 9425514255
“जिये सिन्धी” “वधे सिन्धी”
