अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पर तीसरे हमले की कोशिश- सुरक्षा बनाम असुरक्षा:यूनाइटेड स्टेट्स सीक्रेट सर्विस के बावजूद राजनीतिक हिंसा का बढ़ता खतरा?
अमेरिका में संभावित गहरा होता ध्रुवीकरण, बढ़ता आक्रोश और राजनीतिक हिंसा की संभावनाएं उसे अस्थिरता की ओर धकेल सकती है- लोकतांत्रिक स्थिरता के लिए खतरे संभावना? -एडवोकेट किशन सनमुखदास भवानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर अमेरिका, जिसे लंबे समय तक लोकतांत्रिक स्थिरता,संस्थागत मजबूती और सामाजिक सहमति का प्रतीक माना जाता रहा,आज गहरे वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहा है। यूनाइटेड स्टेट्स की अवधारणा, जो विविधता में एकता के सिद्धांत पर आधारित थी,अब कई विश्लेषकों की नजर में डिवाइडेड स्टेट्स की ओर झुकती दिखाई दे रही है। इस बदलाव के पीछे कई जटिल कारक काम कर रहे हैं, राजनीतिक नेतृत्व की नीतियाँ,आर्थिक असमानता, सांस्कृतिक संघर्ष,मीडिया की भूमिका और डिजिटल युग का एल्गोरिद्मिक प्रभाव। विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रम्प के दौर और उसके बाद की राजनीति ने इस ध्रुवीकरण को तीव्र रूप से उजागर किया है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि अमेरिका में वैचारिक विभाजन कोई अचानक उत्पन्न हुई घटना नहीं है, बल्कि यह कई दशकों से विकसित हो रही प्रवृत्ति का परिणाम है। हालांकि, डोनाल्ड ट्रम्प की राजनीतिक शैली जो राष्ट्रवाद,आप्रवासन विरोध,और अमेरिका फर्स्ट जैसे नारों पर आधारित थी,ने इस विभाजन को अधिक तीखा बना दिया। उनके समर्थकों के लिए यह नीतियाँ आर्थिक सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा का प्रतीक थीं,जबकि विरोधियों के लिए यह लोकतांत्रिक मूल्यों, समावेशिता और वैश्विक सहयोग के लिए खतरा थीं। इस तरह अमेरिका के भीतर दो स्पष्ट वैचारिक खेमे बन गए,एक जो परंपरागत मूल्यों और राष्ट्रीय प्राथमिकता को प्राथमिकता देता है, और दूसरा जो बहुलतावाद, उदारवाद और वैश्विक सहभागिता का समर्थक है।यह विभाजन केवल राजनीतिक विचारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक जीवन के लगभग हर पहलू में दिखाई देने लगा है।शिक्षा, मीडिया,न्यायपालिका और यहां तक कि विज्ञान और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में भी लोग अपने- अपने वैचारिक समूहों के अनुसार सत्य को परिभाषित करने लगे हैं। उदाहरण के लिए, कोविड -19 पैडेमिक के दौरान मास्क, वैक्सीन और लॉकडाउन जैसे मुद्दे वैज्ञानिक बहस से अधिक राजनीतिक पहचान का हिस्सा बन गए। इससे यह स्पष्ट होता है कि ध्रुवीकरण ने अमेरिकी समाज की बुनियादी सहमति को कमजोर कर दिया है।

साथियों बात अगर हम हाल ही में ट्रंप पर हुए तीसरे हमले को समझने की करें तो व्हाइट हाउस प्रेस सचिव ने अमेरिकी पर शनिवार को हुए हमले की कोशिश को लेकर कई अहम बातें बताई उन्होंने कहा कि व्हाइट हाउस प्रेस डिनर में हुई गोलीबारी राष्ट्रपति ट्रंप पर तीसरा बड़ा हमला था इतिहास में किसी भी अन्य राष्ट्रपति को बार-बार इस तरह गंभीर हमलों का सामना नहीं करना पड़ा है.ट्रंप ने प्रेस डिनर में गोली लगने वाले सीक्रेट सर्विस एजेंट से बातचीत भी की.कैरोलिन ने कहा यह घटना याद दिलाती है कि डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी के लिए फंडिंग कितनी जरूरी है,बता दें, वॉशिंगटन में शनिवार रात आयोजित व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर उस समय दहशत में बदल गया था, जब राष्ट्रपति ट्रंप के संबोधन से ठीक पहले गोलीबारी की घटना सामने आई,कार्यक्रम में कुछ ही पलों में अफरा- तफरी मच गई, यह घटना वॉशिंगटन हिल्टन होटल में हुई, जहां करीब 2300 से अधिक मेहमान मौजूद थे.इस मामले में एक आरोपी की पहचान 31 वर्षीय कोल टोमस एलन के रूप में हुई है.इस के बाद व्हाइट हाउस प्रेस सचिव ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप का सीक्रेट सर्विस पर भरोसा बरकरार है,राष्ट्रपति की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए डीएचएस के शीर्ष अधिकारियों और व्हाइट हाउस अधिकारियों के साथ बैठक होगी, सुरक्षा के लिए अगर बदलाव जरूरी होंगे, तो किए जाएंगे।
साथियों बात अगर हम नीतियों के कारण बढ़ते आक्रोश को समझने की करें तो आर्थिक असमानता, वैश्वीकरण के प्रभाव, और मिडिल क्लास की गिरती स्थिति ने पहले ही लोगों में असंतोष पैदा कर दिया था। जब राजनीतिक नेतृत्व इन असंतोषों को पहचान कर उन्हें संबोधित करने के बजाय उन्हें भावनात्मक और सांस्कृतिक मुद्दों में बदल देता है,तो आक्रोश और गहरा हो जाता है। डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों ने एक वर्ग को यह महसूस कराया कि वे भूले हुए अमेरिकी हैं,जिनकी आवाज अब सुनी जा रही है। वहीं, दूसरे वर्ग को लगा कि इन नीतियों के कारणनस्लीय और सामाजिक विभाजन को बढ़ावा मिल रहा है।इस आक्रोश का सबसे स्पष्ट रूप हमें 6 जनवरी 2021 के यूनाइटेड स्टेट्स कैपिटल अटैक में देखने को मिला, जब हजारों लोगों ने अमेरिकी संसद भवन पर हमला किया।यह घटना केवल एक राजनीतिक विरोध नहीं थी, बल्कि यह उस गहरे अविश्वास का प्रतीक थी जो लोगों के एक हिस्से को लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति हो गया था। यह विश्वास संकट इस बात को दर्शाता है कि जब राजनीतिक ध्रुवीकरण चरम पर पहुंचता है, तो वह लोकतंत्र की मूल संरचना को भी चुनौती देने लगता है।

साथियों बात अगर हम क्या अमेरिका वास्तव में डिवाइडेड स्टेट्स की ओर बढ़ रहा है? इसको समझने की करें तो इसका उत्तर सरल नहीं है, लेकिन कई संकेत इस दिशा में इशारा करते हैं। आज अमेरिका में रेड स्टेट्स और ब्लू स्टेट्स की पहचान केवल चुनावी नक्शे तक सीमित नहीं है,बल्कि यह सांस्कृतिक,सामाजिक और आर्थिक अंतर को भी दर्शाती है। अलग-अलग राज्यों में नीतियों, कानूनों और सामाजिक मानदंडों में इतना अंतर है कि वे कभी- कभी अलग-अलग देशों जैसे प्रतीत होते हैं।हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि अमेरिका की संस्थाएं अभी भी मजबूत हैं और उन्होंने कई संकटों का सामना किया है। अमेरिकन सिविल वार जैसे गंभीर विभाजन के बाद भी देश ने खुद को फिर से एकजुट किया था। इसलिए यह कहना कि अमेरिका पूरी तरह डिवाइडेड स्टेट्स बन चुका है,अतिशयोक्ति हो सकती है, लेकिन यह निश्चित है कि वर्तमान स्थिति चिंताजनक है और यदि इसे नियंत्रित नहीं किया गया,तो यह लोकतांत्रिक स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है।
साथियों बात अगर हम नेताओं की सुरक्षा और उन पर हमलों की घटनाएं इसको समझने की करें तो यह ध्रुवीकरण का एक खतरनाक पहलू उजागर करती हैं। यह सच है कि अमेरिकी इतिहास में चार राष्ट्रपतियों अब्राहम लिंक़न ,जेम्स ए . गारफील्ड, विलियम मककिनली और जॉन एफ.केन्नेडी की हत्या की गई थी। ये घटनाएं दिखाती हैं कि राजनीतिक हिंसाअमेरिका के इतिहास का हिस्सा रही है,लेकिन वर्तमान समय में सोशल मीडिया,कट्टरपंथी विचारधाराओं और षड्यंत्र सिद्धांतों के कारण यह खतरा और जटिल हो गया है।जहां तक डोनाल्ड ट्रम्प पर हमलों या हमले की कोशिशों का सवाल है,यह स्पष्ट है कि उनकी राजनीति और व्यक्तित्व ने उन्हें अत्यधिक विवादास्पद बना दिया है। हालांकि,यह भी जरूरी है कि इन घटनाओं काविश्लेषण तथ्यात्मक आधार पर किया जाए, क्योंकि हर कथित हमले की पुष्टि या प्रकृति अलग-अलग हो सकती है। लेकिन व्यापक रूप से यह कहा जा सकता है कि जब समाज में ध्रुवीकरण बढ़ता है, तो राजनीतिक नेताओं के खिलाफ हिंसा का जोखिम भी बढ़ जाता है।अब सवाल उठता है कि इतनी मजबूत सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद हमलावर कैसे पहुंच जाते हैं? इसका उत्तर सुरक्षा की सीमाओं और मानव व्यवहार की अनिश्चितता में छिपा है। यूनाइटेड स्टेट्स सीक्रेट सर्विस दुनियाँ की सबसे उन्नत सुरक्षा एजेंसियों में से एक है, लेकिन किसी भी सुरक्षा प्रणाली में ज़ीरो रिस्क संभव नहीं है। हमलावर अक्सर अप्रत्याशित तरीके अपनाते हैं, भीड़ का फायदा उठाते हैं या अंदरूनी कमजोरियों का उपयोग करते हैं। कई बार वे पेशेवर अपराधी नहीं होते, बल्कि भावनात्मक रूप से प्रेरित साधारण लोग होते हैं, जो अचानक हिंसक कदम उठा लेते हैं।इसके अलावा, डिजिटल युग में कट्टरपंथी विचारों का प्रसार तेज़ी से होता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोगों को ऐसे इको चैंबर में डाल देते हैं, जहां वे केवल उन्हीं विचारों को सुनते हैं जो उनके विश्वासों की पुष्टि करते हैं। इससे उनकी सोच और अधिक कट्टर हो जाती है और वे अपने विरोधियों को दुश्मन के रूप में देखने लगते हैं। यही मानसिकता कभी-कभी हिंसा में बदल जाती है।
साथियों बात अगर हम अमेरिका के वर्तमान परिदृश्य को समझने के लिए यह भी जरूरी है कि हम इसे वैश्विक संदर्भ में देखें, तों आज दुनिया के कई लोकतंत्र भारत, यूरोप, लैटिन अमेरिका भी इसी तरह के ध्रुवीकरण का सामना कर रहे हैं। इसका कारण केवल स्थानीय राजनीति नहीं है, बल्कि वैश्वीकरण, तकनीकी बदलाव और पहचान की राजनीति जैसे व्यापक कारक हैं। अमेरिका में जो हो रहा है, वह एक वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा है, लेकिन अमेरिका की वैश्विक भूमिका के कारण इसका प्रभाव अधिक व्यापक होता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का विश्लेषण करेंगे तो हम पाएंगे क़ि यह कहा जा सकता है कि अमेरिका एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है।एक ओर,उसके पास मजबूत संस्थाएं, स्वतंत्र न्यायपालिका और सक्रिय नागरिक समाज है, जो उसे स्थिरता प्रदान कर सकते हैं। दूसरी ओर, गहरा होता ध्रुवीकरण, बढ़ता आक्रोश और राजनीतिक हिंसा की संभावनाएं उसे अस्थिरता की ओर धकेल सकती हैं।यूनाइटेड स्टेट्स और डिवाइडेड स्टेट्स के बीच का यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं है,बल्कि यह अमेरिका की आत्मा औरउसकी पहचान का प्रश्न है। यदि राजनीतिक नेतृत्व, मीडिया और नागरिक समाज मिलकर संवाद, सहमति और समावेशिता को बढ़ावा देते हैं, तो यह संकट अवसर में बदल सकता है। लेकिन यदि विभाजन की राजनीति जारी रहती है, तो यह न केवल अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया के लिए गंभीर परिणाम ला सकती है।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
