- सुरेश सिंह बैस
बिलासपुर। शहर में बिजली आपूर्ति की लगातार बिगड़ती स्थिति केवल तकनीकी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रशासनिक उदासीनता और जवाबदेही के अभाव का गंभीर उदाहरण बन चुकी है। हालात इतने बदतर हैं कि रात भर बिजली गुल रहना अब सामान्य बात हो गई है, और उससे भी चिंताजनक यह कि उपभोक्ताओं की शिकायतें सुनने के लिए बनाए गए फ्यूज कॉल सेंटर तक में ताला लटका मिल रहा है। यह स्थिति किसी भी विकसित होते शहर के लिए शर्मनाक है।
हर महीने होता है मेंटेनेंस
हर महीने मेंटेनेंस के नाम पर खर्च और दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट दिखाई देती है। जरा सी आंधी या मौसम में बदलाव होते ही पूरे शहर की बिजली व्यवस्था चरमरा जाती है। इससे यह साफ जाहिर होता है कि व्यवस्था की तैयारी और रखरखाव केवल कागजों तक सीमित है। सवाल यह उठता है कि जब पहले से संभावित मौसमीय व्यवधानों का अनुमान होता है, तो विभाग ने पूर्व तैयारी क्यों नहीं की?
बिजली उपभोक्ताओं के प्रति लापरवाही
सबसे बड़ी चिंता उपभोक्ताओं के प्रति लापरवाही की है। रात के अंधेरे में जब लोग परेशानी झेलते हैं, तब शिकायत दर्ज कराने के लिए बनाए गए कॉल सेंटर में कर्मचारी तक मौजूद नहीं रहते। रहते भी है तो वही रटा रटाया सा जवाब देते हैं।यह न केवल सेवा के प्रति गैर-जिम्मेदारी है, बल्कि आम जनता के साथ सीधा विश्वासघात भी है। यदि शिकायत प्रणाली ही निष्क्रिय हो जाए, तो नागरिक आखिर अपनी समस्याएं किसके सामने रखें?
आमजन और जीवन अस्त-व्यस्त
इस अव्यवस्था का सबसे अधिक असर आम जनजीवन पर पड़ रहा है। भीषण गर्मी के दौर में बिजली कटौती से बुजुर्ग, बच्चे और मरीज सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। कई घरों में जरूरी मेडिकल उपकरण तक बंद पड़ जाते हैं, जिससे जान का खतरा तक उत्पन्न हो जाता है। यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर मानवीय संकट है।
जिम्मेदार रहते गायब
यह भी ध्यान देने योग्य है कि जब उपभोक्ता शिकायत लेकर कार्यालय पहुंचते हैं, तो वहां भी जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी नदारद मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि समस्या केवल तकनीकी नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था में व्याप्त लापरवाही और अनुशासनहीनता की है। ठेका प्रणाली के तहत काम कर रहे कर्मचारियों की जवाबदेही तय न होना भी इस संकट का एक बड़ा कारण है।
आमजन की विभाग से ठोस कार्रवाई की अपेक्षा
अब समय आ गया है कि बिजली विभाग केवल आश्वासन देने के बजाय ठोस और प्रभावी कदम उठाए। सबसे पहले, फ्यूज कॉल सेंटर जैसी मूलभूत सेवाओं को 24×7 सक्रिय और जवाबदेह बनाया जाए। दूसरे, मेंटेनेंस कार्यों की वास्तविक मॉनिटरिंग हो और उसकी जवाबदेही तय की जाए। तीसरे, ठेका कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर सख्त निगरानी और आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।बिजली केवल सुविधा नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन की अनिवार्यता है। यदि इसकी आपूर्ति में इस तरह की लापरवाही जारी रही, तो जनता का भरोसा पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। प्रशासन को यह समझना होगा कि अंधेरे में डूबता शहर केवल बिजली की कमी नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बन जाता है। अब जरूरत है,सख्त निर्णयों की, जवाबदेही तय करने की, और सबसे बढ़कर, जनता के विश्वास को पुनः स्थापित करने की।
