लाल किले से दुनियाँ के बाजारों तक: मोदी-मुर्मु के आर्थिक संदेश ने दिखाई 2047 के भारत की वैश्विक तस्वीर
सप्त धारा बनाम कच्चे तेल का झटका: विकास की रफ्तार,कमजोर रुपया,व्यापार घाटा और भारत की आर्थिक अग्निपरीक्षा -क्या 2047 का भारत बदलेगा वैश्विक अर्थव्यवस्था का संतुलन? -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर किसी राष्ट्र के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय पर्व के अवसर पर दिए गए संबोधन केवल औपचारिक भाषण नहीं होते। विशेषकर भारत जैसे लोकतांत्रिक,विशाल उपभोक्ता बाजार और तेजी से उभरते वैश्विक आर्थिक केंद्र के मामले में शीर्ष संवैधानिक पदों से निकला प्रत्येक बड़ा आर्थिक संकेत घरेलू उद्योग,शेयर बाजार,विदेशी निवेशकों और अंतरराष्ट्रीय नीति-निर्माताओं के लिए दिशा-सूचक बन जाता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि,लाल किले से निकली घोषणा अब बाजार, उद्योग और निवेशकों के लिए अवसर का संकेत है;लेकिन उस अवसर को वास्तविक संपत्ति में बदलने की निर्णायक कुंजी अब नीति के क्रियान्वयन, उत्पादक निवेश और आर्थिक अनुशासन के हाथ में है।15 अगस्त 2026 को भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से विकसित भारत @2047, शक्ति की सप्त धारा, आत्मनिर्भरता,कृत्रिम बुद्धिमत्ता,सेमीकंडक्टर,परमाणु ऊर्जा,रक्षा विनिर्माण और युवाओं को केंद्र में रखा।पीएम ने अगले एक वर्ष में एक करोड़ युवाओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रशिक्षण देने,सात-आठ सेमीकंडक्टर संयंत्रों को अगले एक-दो वर्षों में परिचालन में लाने और 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 गीगावॉट तक पहुंचाने जैसे बड़े लक्ष्य रखे।स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भी भारत की आर्थिक मजबूती, डिजिटल अर्थव्यवस्था, युवा शक्ति, समावेशी विकास, किसानों श्रमिकों,वैज्ञानिकों और उद्यमियों की भूमिका को रेखांकित किया। राष्ट्रपति के संदेश में भारत की आर्थिक लचीलापन और दुनियाँ के वास्तविक समय के डिजिटल लेनदेन में भारत की बड़ी हिस्सेदारी को विशेष महत्व मिला। इन दोनों संबोधनों को साथ रखकर देखें तो भारत का आर्थिक संदेश बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देता है,अगले दो दशकों में भारत को केवल बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि उत्पादन, तकनीक, ऊर्जा, रक्षा, डिजिटल व्यवस्था और वैश्विक आपूर्ति शृंखला की सटीकता से निर्णायक शक्ति बनाना है।
साथियों, शक्ति की सप्त धारा, भारत के अगले आर्थिक चक्र का खाका इसको समझने की करें तो पीएम की शक्ति की सप्त धारा में विनिर्माण,कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार, गति शक्ति, रक्षा शक्ति, हरित-नीली अर्थव्यवस्था और सॉफ्ट पावर को विकास के सात प्रमुख आधार के रूप में सामने रखा गया। यह महज सात क्षेत्रों की सूची नहीं है,बल्कि यदि इसे नीतिगत और वित्तीय संसाधनों से जोड़ा जाता है तो यह भारत के अगले औद्योगिक चक्र की आधारभूमि बन सकती है।विनिर्माण भारत को रोजगार और निर्यात देगा, कृषि- प्रसंस्करण ग्रामीण आय तथा खाद्य निर्यात बढ़ा सकता है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नवाचार उत्पादकता को बदल सकते हैं,गति शक्ति लॉजिस्टिक लागत घटा सकती है, रक्षा विनिर्माण आयात निर्भरता कम करते हुए निर्यात का नया बाजार खोल सकता है और हरित-नीली अर्थव्यवस्था ऊर्जा तथा समुद्री संसाधनों को विकास के नए केंद्र में ला सकती है। इसलिए इसका प्रभाव केवल सकल घरेलू उत्पाद पर नहीं,बल्कि रोजगार चालू खाते, विनिर्माण, पूंजी निवेश और निर्यात प्रतिस्पर्धा पर भी पड़ सकता है।
साथियों बात अगर हम एक करोड़ एआई-कुशल युवा: जनसंख्या से उत्पादक पूंजी की ओर इसको समझने की करें तो एक करोड़ युवाओं को अगले एक वर्ष में कृत्रिम बुद्धिमत्ता कौशल देने की घोषणा भारत की सबसे महत्वपूर्ण दीर्घकालीन आर्थिक घोषणाओं में से एक है। इसका वास्तविक महत्व इस बात में होगा कि प्रशिक्षण कितनी गुणवत्ता का है और कितने प्रशिक्षित युवाओं को वास्तविक रोजगार, उद्यमिता और उद्योग से जोड़ा जाता है।यदि भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता को केवल सूचना- प्रौद्योगिकी क्षेत्र तक सीमित न रखकर कृषि, स्वास्थ्य, विनिर्माण, बैंकिंग, शिक्षा, रक्षा और सरकारी सेवाओं में लागू करता है,तो उत्पादकता में बड़ा परिवर्तन संभव है। यही वह क्षेत्र है जहां भारत की विशाल युवा आबादी आर्थिक बोझ के बजाय वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ बन सकती है।मुफ्त ऑनलाइन प्रतियोगी परीक्षा कोचिंग की घोषणा भी इसी व्यापक सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से जुड़ती है। इसका उद्देश्य गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के शिक्षा एवं कोचिंग खर्च को कम करना है। यदि इससे प्रतिभा और अवसर के बीच की दूरी घटती है, तो इसका दीर्घकालीन प्रभाव सटिका से मानव पूंजी पर पड़ेगा।
साथियों बात कर हम सेमीकंडक्टर और परमाणु ऊर्जा: आत्मनिर्भरता से रणनीतिक स्वतंत्रता तक को समझने की करें तो, भारत की अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ी संरचनात्मक चुनौतियों में ऊर्जा और उच्च-प्रौद्योगिकी आयात निर्भरता शामिल है। ऐसे में सेमीकंडक्टर उत्पादन और 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य केवल औद्योगिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा की रणनीति है। प्रधानमंत्री ने सात-आठ नए सेमीकंडक्टर संयंत्रों को अगले एक-दो वर्षों में परिचालन में लाने की बात कही है।यदि भारत चिप निर्माण, महत्वपूर्ण खनिज,इलेक्ट्रॉनिक्स और उन्नत विनिर्माण का विश्वसनीय केंद्र बनता है, तो चीन प्लस वन रणनीति भारत के पक्ष में और मजबूत हो सकती है। वहीं परमाणु ऊर्जा का विस्तार आयातित जीवाश्म ईंधन पर दीर्घकालीन निर्भरता कम करने में सहायक हो सकता है। इसका अर्थ है कि ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी सुरक्षा को आर्थिक विकास की मुख्यधारा में सटीकता से शामिल किया जा रहा है।
साथियों लेकिन दूसरी तरफ कच्चे तेल का दबाव,भारत की सबसे बड़ी बाहरी आर्थिक कमजोरी को समझने की करें तो,यहीं भारत की आर्थिक कहानी का दूसरा पक्ष सामने आता है। जुलाई 2026 में भारत का वस्तु व्यापार घाटा बढ़कर 31.98 अरब डॉलर हो गया, जो छह महीने का उच्च स्तर था। आयात 76.22 अरब डॉलर रहा, जबकि वस्तु निर्यात 44.24 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। पश्चिम एशिया के तनाव, महंगे कच्चे तेल और ऊंची माल ढुलाई लागत ने आयात बिल पर दबाव डाला। हालांकि सेवाओं में 16.95 अरब डॉलर का अधिशेष एक महत्वपूर्ण सहारा बना हुआ है।इससे स्पष्ट है कि भारत की विकास कहानी मजबूत होते हुए भी ऊर्जा कीमतों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। भारत अपनी तेल आवश्यकता का 90 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। जुलाई में रूस की हिस्सेदारी भारत के कच्चे तेल आयात में रिकॉर्ड 50.83 प्रतिशत, अर्थात लगभग 24.7 लाख बैरल प्रतिदिन, रहीयह स्थिति भारत को सस्ता और अपेक्षाकृत सुरक्षित ऊर्जा स्रोत देती है, लेकिन इसके साथ भू- राजनीतिक और प्रतिबंध संबंधी जोखिम भी जुड़े हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें लगातार ऊंची रहती हैं, तो इसका प्रभाव महंगाई, चालू खाते, रुपये, परिवहन लागत, पेट्रोल-डीजल कीमतों और कंपनियों के लाभ मार्जिन तक पहुंच सकता है।
साथियों,तेल और कमजोर रुपया,विकास की राह की अग्निपरीक्षा इसको समझने की करें तो,यदि कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत भारतीय मुद्रा में लगभग 90 रुपये प्रति लीटर के आसपास प्रभाव डालने वाली स्थिति तक पहुंचती है, तो उसका प्रभाव केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन महंगा होगा, लॉजिस्टिक लागत बढ़ेगी और कृषि से लेकर विनिर्माण तक लगभग प्रत्येक क्षेत्र पर लागत का दबाव आ सकता है।ऊंचे तेल आयात बिल से डॉलर की मांग बढ़ती है, जिससे रुपये पर दबाव पड़ सकता है। कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए कुछ हद तक लाभकारी हो सकता है, लेकिन तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और अन्य आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ाकर आयातित महंगाई को जन्म दे सकता है। इसलिए भारत के लिए तेल कीमत और रुपया दोनों एक साथ आर्थिक परीक्षा बन सकते हैं।
साथियों,भारतीय शेयर बाजार: घोषणा से अवसर लेकिन मूल्यांकन में सावधानी,को समझने की करें तो राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की घोषणाओं से शेयर बाजार में सबसे अधिक रुचि उन्हीं क्षेत्रों में पैदा होगी जिन्हें दीर्घकालीन सरकारी प्राथमिकता मिल रही है,रक्षा, पूंजीगत वस्तुएं, बुनियादी ढांचा, विद्युत, परमाणु ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल सेवाएं, विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स।लेकिन निवेशकों के लिए एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है,नीति घोषणा और कंपनी के वास्तविक मुनाफे के बीच कई वर्ष का अंतर हो सकता है।किसी क्षेत्र को सरकारी प्राथमिकता मिलने का अर्थ यह नहीं कि उस क्षेत्र की हर कंपनी का शेयर स्वतः बढ़ेगा। शेयर कीमत में पहले से भविष्य की उम्मीदें शामिल हो सकती हैं। इसलिए आदेश -पुस्तिका,लाभ,ऋण,नकदी प्रवाह, मूल्यांकन और वास्तविक परियोजना क्रियान्वयन को सटीकता से देखना अधिक महत्वपूर्ण होगा।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजार और वैश्विक निवेशक: भारत अब वैकल्पिक बाजार नहीं इसको समझने की करें तो, भारत की यह रणनीति अंतरराष्ट्रीय पूंजी के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि वैश्विक कंपनियां चीन से उत्पादन का कुछ हिस्सा स्थानांतरित करना चाहती हैं, तो भारत का बड़ा घरेलू बाजार, युवा कार्यबल,डिजिटल आधारभूत ढांचा और लोकतांत्रिक व्यवस्था उसे आकर्षक विकल्प बनाते हैंसेमीकंडक्टर रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और हरित ऊर्जा में विदेशी कंपनियों कीभागीदारी बढ़ती है तो उसका लाभ केवल भारत को नहीं, बल्कि वैश्विक कंपनियों को भी मिलेगा। अंतरराष्ट्रीय निवेशक भारतीय कंपनियों के साथ-साथ उन वैश्विक कंपनियों को भी देख सकते हैं जिनकी भारत में आपूर्ति शृंखला, संयुक्त उद्यम या पूंजी निवेश की रणनीति है।लेकिन विदेशी निवेशक भारत की वृद्धि दर के साथ राजकोषीय अनुशासन, रुपये की स्थिरता, कर व्यवस्था, व्यापार नीति, अमेरिकी शुल्क, भू- राजनीतिक जोखिम और तेल कीमतों को भी सटीकता से बराबर देखेंगे।
साथियों बातें कर हम सरकार की विनिवेश नीति औरबाजार में पूंजी की नई कहानी को समझने की करें तो आंकड़े के अनुसार 2026 में दस सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों से अल्पांश हिस्सेदारी बिक्री के जरिए 62,000 करोड़ रुपये से अधिक जुटाने की बात सामने आई है। इस आंकड़े को अंतिम रूप से प्रकाशित सरकारी आंकड़ों से मिलान करना आवश्यक है;इसलिए इसे यहां उपलब्ध रिपोर्टेड आंकड़े के रूप में देखना उचित होगा। अल्पांश हिस्सेदारी बिक्री का व्यापक आर्थिक महत्व यह है कि इससे सरकार को राजस्व मिलता है और बाजार में सार्वजनिक उपक्रमों की हिस्सेदारी का व्यापक स्वामित्व बढ़ सकता है।यदि विनिवेश से प्राप्त राशि को केवल राजस्व व्यय में लगाने के बजाय बुनियादी ढांचे, पूंजीगत व्यय और उत्पादक परिसंपत्तियों में लगाया जाता है, तो इसका गुणक प्रभाव अर्थव्यवस्था पर अधिक हो सकता है। दूसरी ओर, लगातार सरकारी हिस्सेदारी बिक्री से संबंधित कंपनियों के शेयरों में अल्पकालीन आपूर्ति दबाव भी आ सकता है। इसलिए बाजार इसे अवसर और जोखिम, दोनों रूपों में देखेगा।
साथियों, रक्षा अर्थव्यवस्था: खर्च से निर्यात तक को समझने की करें तो, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की घोषणा का आर्थिक महत्व भी बहुत बड़ा है। भारत यदि ड्रोन, मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, विमान, इंजन और उन्नत रक्षा तकनीक का घरेलू उत्पादन बढ़ाता है, तो रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा देश के भीतर उद्योग, अनुसंधान और रोजगार पैदा कर सकता है।यहीं से ‘मेक इन इंडिया’ की अवधारणा ‘मेक फॉर द वर्ल्ड’ में बदल सकती है। इससे भारतीय रक्षा कंपनियों, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों तथा प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए नए निर्यात बाजार खुल सकते हैं।निवेशकों के लिए सबसे बड़ा सवाल, घोषणा नहीं, क्रियान्वयन है,भारत की आर्थिक कहानी के सामने आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि लक्ष्य कितने बड़े हैं, बल्कि यह है कि इन लक्ष्यों को कितनी तेजी और दक्षता से जमीन पर उतारा जाएगा। सेमीकंडक्टर संयंत्र, परमाणु परियोजनाएं, रक्षा उत्पादन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रशिक्षण और बुनियादी ढांचा सभी में बड़ी पूंजी, कुशल मानव संसाधन, नियामकीय स्थिरता और समयबद्ध क्रियान्वयन की आवश्यकता होगी।यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय निवेशक भारत को लेकर उत्साहित होने के साथ-साथ सावधान भी रहेंगे। यदि भारत व्यापार सुगमता, भूमि,श्रम,कर,लॉजिस्टिक्स और ऊर्जा संबंधी बाधाओं को कम करता है,तो घोषित लक्ष्य निवेश में परिवर्तित हो सकते हैं। यदि क्रियान्वयन धीमा रहा तो घोषणाओं और वास्तविक आर्थिक परिणामों के बीच अंतर बढ़ सकता है।
*-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318*
