देश :- आज के दौर में ऐसा लगता है कि लोग भक्त कम और अंधभक्त ज्यादा होते जा रहे हैं। चाहे मामला प्रेम-मोहब्बत का हो, फिल्मी सितारों का, नेताओं का या फिर संत-महात्माओं का—हम अक्सर बिना पूरी सच्चाई जाने किसी पर विश्वास कर लेते हैं। यही अंधविश्वास बाद में हमारे लिए परेशानी और धोखे का कारण बन जाता है।
विश्वास करना गलत नहीं है, लेकिन आँखें बंद करके विश्वास करना जरूर गलत है। किसी व्यक्ति को अपना आदर्श बनाने से पहले उसके विचार, व्यवहार और कर्म को समझना जरूरी है। परिचय बढ़ाइए, सवाल पूछिए, सच्चाई परखिए और फिर आगे कदम बढ़ाइए।
आज धर्म और आस्था के नाम पर भी कई तरह की गतिविधियां देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग धर्म और समाज की भावनाओं का सहारा लेकर लोगों को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश करते हैं। आस्था के नाम पर यदि कोई व्यक्ति आपके विवेक को ही बंद करने की कोशिश करे, तो वहां सावधान होने की जरूरत है।
गुरु बनाइए, लेकिन ‘गुरु घंटाल’ नहीं। सच्चे संत की पहचान उसके दिखावे से नहीं, बल्कि उसके आचरण, सेवा, त्याग और विचारों से होती है। इसी तरह किसी नेता, सामाजिक कार्यकर्ता या आम इंसान पर भरोसा करने से पहले उसके कर्मों को देखना चाहिए, केवल उसके शब्दों को नहीं।
आज सोशल मीडिया के दौर में हर दिन कोई नया वीडियो, संदेश या कहानी सामने आती है। सच क्या है और झूठ क्या है, यह समझना कई बार मुश्किल हो जाता है। अधूरी जानकारी और अधूरे सच के आधार पर राय बनाने से समाज में मनमुटाव और विवाद बढ़ते हैं।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि कुछ लोग इसी अंधभक्ति का फायदा उठाते हैं। वे लोगों की भावनाओं और विश्वास को अपनी ताकत बनाकर अपना प्रभाव बढ़ाते हैं। जब तक व्यक्ति को सच्चाई का एहसास होता है, तब तक वह अपना समय, पैसा और विश्वास बहुत कुछ गंवा चुका होता है।
इसलिए आज जरूरत है आँखें खोलने की, दिमाग की घंटियां बजाने की और हर बात को परखने की। सवाल पूछिए, प्रमाण देखिए, सच्चाई जानिए और उसके बाद ही किसी व्यक्ति या विचार के साथ खड़े हों।
इसमें आपका भी भला है, आपके परिवार का भी, समाज का भी और देश का भी।
भक्त बनिए, लेकिन अंधभक्त मत बनिए।
विश्वास रखिए, लेकिन विवेक के साथ।
आस्था रखिए, लेकिन आँखें खुली रखिए।
क्योंकि जब विवेक जागता है, तभी सही और गलत के बीच का फर्क समझ आता है।
फैसला आपका है…
हम सदा सच के साथ।
संपादकीय
✒️ विजय दुसेजा
संपादक — हमर संगवारी
