सर्दी-जुकाम की दवा-नन्हे बच्चों की दवा पर सरकार का रेड अलर्ट -4 साल से कम उम्र के बच्चों क़ो इस दवाई के पिलाने पर लगाई बंदिश
दवा की सुरक्षा केवल डॉक्टर के कमरे तक सीमित विषय नहीं -दवा की बोतल और पैकेट पर लिखी स्पष्ट जानकारी भी रोगी सुरक्षा की पहली पंक्ति बन सकती है- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर वैश्विक स्तरपर किसी भी देश के लिए केवल सरकार बनाना, सत्ता का संचालन करना और विकास की योजनाएं घोषित करना ही पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सुशासन की कसौटी तब सामने आती है,जब सरकार जनहित से जुड़े उन क्षेत्रों में भी लगातारनिगरानी कठोर नियमन और समयबद्ध निर्णय ले, जहां एक छोटी- सी प्रशासनिक चूक किसी नागरिक की जिंदगी पर भारी पड़ सकती है।स्वास्थ्य और दवाओं की सुरक्षा ऐसा ही अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है।विशेष रूप से छोटे बच्चों के मामले में सरकार,दवा निर्माता चिकित्सक,फार्मासिस्ट और अभिभावक,सभी की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है।इसी व्यापक जनहित और बाल सुरक्षा की दृष्टि से 22 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार द्वारा चार वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए क्लोरफेनिरामाइन मैलेट और फिनाइलएफ्रिन हाइड्रोक्लोराइड वाले कुछ फिक्स्ड-डोज कॉम्बिनेशन पर कड़ा नियामक कदम उठाना महत्वपूर्ण माना जा सकता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि सरकार के इस निर्णय का मूल उद्देश्य किसी सामान्य सर्दी-जुकाम को लेकर भय पैदा करना नहीं,बल्कि छोटे बच्चों में ऐसी दवाओं के अनावश्यक अथवा अनुचित उपयोग से संभावित जोखिम को कम करना है। मीडिया में उपलब्ध जानकारी के अनुसार इन दोनों सक्रिय घटकों को मिलाकर बनाए गए फिक्स्ड- डोज कॉम्बिनेशन के संबंध में विशेषज्ञ स्तरपर विचार किया गया और ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड यानी की सिफारिशों के बाद चार वर्ष से कम आयु के बच्चों में इनके उपयोग को लेकर प्रतिबंधात्मक व्यवस्था लागू की गई।इसके साथ निर्माताओं के लिए लेबल, पैकेजिंग,दवा के साथ उपलब्ध सूचना तथा प्रचार सामग्री पर स्पष्ट आयु-संबंधी चेतावनी देना अनिवार्य किया गया है कि चार वर्ष से कम उम्र के बच्चों को ऐसी दवा नहीं दी जानी चाहिए। यह व्यवस्था इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि दवा की सुरक्षा केवल डॉक्टर के कमरे तक सीमित विषय नहीं है; दवा की बोतल और पैकेट पर लिखी स्पष्ट जानकारी भी रोगी सुरक्षा की पहली पंक्ति बन सकती है।
साथियों, मीडिया में जानकारी के अनुसार क्लोरफेनिरामाइन एक एंटीहिस्टामिन दवा है, जिसका उपयोग एलर्जी और सर्दी-जुकाम से जुड़े कुछ लक्षणों में किया जाता रहा है।दूसरी ओर फिनाइलएफ्रिन एक डिकंजेस्टेंट के रूप में नाक बंद होने और जकड़न जैसे लक्षणों को कम करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इन घटकों का संयोजन कुछ सर्दी-जुकाम तथा ऊपरी श्वसन तंत्र से संबंधित लक्षणों वाली दवाओं में मिलता रहा है। लेकिन यह समझना आवश्यक है कि किसी दवा का वयस्कों या बड़े बच्चों में इस्तेमाल होना अपने आप यह सिद्ध नहीं करता कि वही दवा बहुत छोटे बच्चों के लिए भी समान रूप से उपयुक्त होगी। बच्चों का शरीर विकसित हो रहा होता है, उनका वजन, चयापचय, अंगों की कार्यप्रणाली और दवाओं के प्रति प्रतिक्रिया उम्र के साथ बदलती है। इसलिए बाल चिकित्सा में दवा की मात्रा, संयोजन और उपयोग की उपयुक्तता को अलग वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखना आवश्यक होता है।यही वह बिंदु है जहां सरकार का नया कदम केवल एक दवा पर लगाया गया प्रतिबंध नहीं, बल्कि ‘रेगुलेटरी प्रीकॉशन’ यानी संभावित जोखिम को पहले ही नियंत्रित करने की नीति का उदाहरण बन जाता है। यदि किसी विशेष आयु वर्ग के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प उपलब्ध हैं और विशेषज्ञ समितियां किसी संयोजन के संभावित जोखिम की ओर संकेत करती हैं, तो नियामक संस्था का दायित्व बनता है कि वह बाजार में उपलब्ध दवाओं के उपयोगr को स्पष्ट नियमों के माध्यम से सुरक्षित बनाए। खासकर चार वर्ष से कम उम्र के बच्चों के संदर्भ में सावधानी का स्तर अधिक होना स्वाभाविक है, क्योंकि इस आयु वर्ग में माता-पिता अक्सर बच्चे के लक्षणों को देखकर स्वयं दवा देने का प्रयास कर सकते हैं। यहां ‘सर्दी-जुकाम सामान्य बीमारी है’ जैसी सोच कभी- कभी गलत आत्मविश्वास पैदा कर सकती है।
साथियों, अभिभावकों के लिए भी यह निर्णय एक महत्वपूर्ण संदेश लेकर आया है,बच्चे को दवा देना घरेलू अनुमान का विषय नहीं होना चाहिए। विशेष रूप से चार वर्ष से कम उम्र के बच्चों को बिना चिकित्सकीय सलाह के सर्दी-जुकाम, खांसी, एलर्जी या नाक बंद होने की दवा देना जोखिमपूर्ण हो सकता है। अभिभावकों को दवा की पैकेजिंग पर दी गई आयु संबंधी चेतावनी पढ़नी चाहिए, दवा की मात्रा स्वयं तय नहीं करनी चाहिए और डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा को निर्धारित मात्रा तथा अवधि के अनुसार ही देना चाहिए। यदि किसी दवा के लेबल पर चेतावनी दी गई है या बच्चे की उम्र के लिए उपयोग सीमित है, तो उसे नजरअंदाज करना बिल्कुल उचित नहीं है।यहां स्वास्थ्य जागरूकता और डिजिटल युग की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। आज अभिभावक इंटरनेट और सोशल मीडिया से स्वास्थ्य संबंधी जानकारी तेजी से प्राप्त करते हैं, लेकिन हर ऑनलाइन सलाह चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित नहीं होती।किसी परिचित ने किसी बच्चे को कोई दवा दी और उसे फायदा हुआ इस आधार पर वही दवा दूसरे बच्चे को देना सुरक्षित चिकित्सा पद्धति नहीं है। बच्चे की उम्र, वजन, लक्षण, बीमारी का कारण और अन्य दवाओं के साथ संभावित प्रभाव अलग हो सकते हैं। इसलिए डिजिटल जानकारी को डॉक्टर की सलाह का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
साथियों, सरकार के मौजूदा कदम को पिछले कुछ महीनों में दवा नियमन को लेकर उठाए गए व्यापक प्रयासों की पृष्ठभूमि में भी देखना चाहिए।उपलब्ध जानकारी के अनुसार जून 2026 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 16 फिक्स्ड-डोज कॉम्बिनेशन दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगाया था। इसके अतिरिक्त कफ सिरप सहित सिरप को ओवर-द- काउंटर श्रेणी से बाहर करने तथा चिकित्सकीय पर्चे के माध्यम से दवा उपलब्ध कराने से संबंधित नियामक सख्ती का उल्लेख भी सामने आया है। यदि इन कदमों को एक साथ देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि दवा क्षेत्र में सरकार का जोर केवल दवा उपलब्ध कराने पर नहीं, बल्कि दवा कीगुणवत्ता,उपयुक्तता,निगरानी और जिम्मेदार उपयोग पर भी बढ़ रहा है।दूषित कफ सिरप से बच्चों की मौतों के मामलों ने इस विषय की गंभीरता को और बढ़ाया है। डायथिलीन ग्लाइकोल जैसे विषैले संदूषकों से जुड़े मामलों ने दुनिया को यह याद दिलाया है कि दवा जीवन बचाने का माध्यम है, लेकिन यदि उसके निर्माण, गुणवत्ता नियंत्रण,भंडारण,वितरण या उपयोग में गंभीर लापरवाही हो जाए तो वही दवा जानलेवा जोखिम में बदल सकती है। मध्य प्रदेश और राजस्थान सहित विभिन्न स्थानों पर दूषित सिरप से जुड़े बच्चों की मौतों की घटनाओं ने दवा सुरक्षा, गुणवत्ता परीक्षण और नियामक जवाबदेही को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। इसलिए दवा सुरक्षा का अर्थ केवल किसी एक सक्रिय घटक पर प्रतिबंध लगाना नहीं,बल्कि उत्पादन से लेकर मरीज तक पहुंचने की पूरी श्रृंखला पर निगरानी स्थापित करना है।
साथियों, यहां एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या केवल केंद्र सरकार के आदेश से दवा सुरक्षा सुनिश्चित हो जाएगी? इसका उत्तर स्पष्ट रूप से ‘नहीं’ है। भारत जैसे विशाल और संघीय ढांचे वाले देश में केंद्र के साथ राज्यों के औषधि नियंत्रक, खाद्य एवं औषधि प्रशासन, स्थानीय निरीक्षण तंत्र,अस्पताल, चिकित्सक फार्मासिस्ट और दवा कंपनियां भी समान रूप से जिम्मेदार हैं।केंद्र सरकार द्वारा जारी निर्देश तभी प्रभावी होंगे जब राज्य स्तर पर उनका कठोर अनुपालन सुनिश्चित हो। मेडिकल स्टोर पर प्रतिबंधित या आयु-विशिष्ट दवाओं की बिक्री की नियमित जांच हो, चिकित्सकीय पर्चे की व्यवस्था का वास्तविक पालन हो और नियम तोड़ने वाले निर्माताओं अथवा विक्रेताओं के खिलाफ समय पर सटीकता से कार्रवाई की जाए।
साथियों,इस पूरी व्यवस्था में दवा कंपनियों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। किसी दवा का उत्पादन केवल इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि बाजार में उसकी मांग है। फार्मास्युटिकल उद्योग का मूल उद्देश्य लाभ के साथ-साथ मरीज की सुरक्षा होना चाहिए। पैकेजिंग पर चेतावनी को छोटे अक्षरों में औपचारिकता की तरह लिख देना पर्याप्त नहीं होगा। चेतावनी ऐसी भाषा और स्थान पर होनी चाहिए जिसे सामान्य उपभोक्ता आसानी से समझ सके। प्रचार सामग्री में भी ऐसी प्रस्तुति से बचना होगा जिससे अभिभावकों को यह भ्रम हो कि सर्दी-जुकाम की हर दवा बच्चों के लिए स्वतः सुरक्षित है। नियमन का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा जब कम्प्लायंस कागज से निकलकर व्यवहार में दिखाई दे।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दवा सुरक्षा का मूल सिद्धांत यही है कि बच्चों के लिए दवाओं का उपयोग वैज्ञानिक प्रमाण, आयु- विशिष्ट सुरक्षा और स्पष्ट नियामक निर्देशों के आधारd पर होना चाहिए। विश्वभर में ‘पेडियाट्रिक मेडिसिन सेफ्टी’ लगातार महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य विषय बन रहा है। भारत जैसे विशाल बाजार में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहां दवाओं की उपलब्धता व्यापक है और लाखों परिवार स्वास्थ्य संबंधी निर्णय स्वयं लेने की स्थिति में होते हैं। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी केवल प्रतिबंध जारी करना नहीं, बल्कि जनजागरूकता पैदा करना, निगरानी व्यवस्था मजबूत करना और नियमों के उल्लंघन पर त्वरित कार्रवाई करना भी है।
साथियों, इस पूरे घटनाक्रम से सुशासन की एक व्यापक परिभाषा सामने आती है। सुशासन का अर्थ केवल बड़ी परियोजनाएं, डिजिटल सेवाएं या आर्थिक विकास नहीं है। जब सरकार किसी संभावित स्वास्थ्य जोखिम की पहचान करती है, विशेषज्ञों की राय लेती है, तकनीकी सलाहकार बोर्ड की सिफारिशों पर निर्णय करती है, कंपनियों को स्पष्ट चेतावनी देने के लिए बाध्य करती है और बच्चों जैसे संवेदनशील वर्ग को अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करती है,तब शासन का मानवीय पक्ष सामने आता है। जनता सरकार से यही अपेक्षा करती है कि वह संकट के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय संभावित संकट को पहले पहचानकर रोकने की क्षमता विकसित करे।फिर भी इस दिशा में आगे की राह लंबी है। केवल एक-दो दवाओं या कुछ एफडीसी पर कार्रवाई से दवा सुरक्षा की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। देश को निरंतर फार्माकोविजिलेंस, मजबूत गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाओं, तेज नमूना परीक्षण, राज्य औषधि नियंत्रण तंत्र में पर्याप्त मानव संसाधन, डिजिटल ट्रैकिंग और दवा निर्माताओं की जवाबदेही को और मजबूत करना होगा। संदिग्ध दवाओं की पहचान और बाजार से वापसी की प्रक्रिया भी तेज तथा पारदर्शी होनी चाहिए। यदि किसी दवा के कारण गंभीर प्रतिकूल प्रभाव सामने आते हैं, तो उनकी रिपोर्टिंग और जांच की व्यवस्था आम नागरिक के लिए भी सरल होनी चाहिए।
साथियों, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दवा सुरक्षा को केवल स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी मानने की मानसिकता बदलनी होगी। यह सरकार,नियामक संस्थाओं डॉक्टरों,फार्मासिस्टों दवा कंपनियों, अस्पतालों और आम नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है। चार वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए क्लोरफेनिरामाइन मैलेट और फिनाइलएफ्रिन हाइड्रोक्लोराइड वाले एफडीसी को लेकर केंद्र सरकार का मौजूदा कदम इसी साझा जिम्मेदारी को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण नियामक संदेश है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति कामूल्यांकन इस बात से नहीं होना चाहिए कि उसने कितनी दवाएं बाजार में उतारीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि उसने अपने नागरिकों को सुरक्षित दवा उपलब्ध कराने के लिए कितनी मजबूत व्यवस्था बनाई। छोटे बच्चों की सुरक्षा के मामले में ‘पहले सावधानी, फिर उपचार’ का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। सरकार का यह निर्णय यदि कठोर निरीक्षण, पारदर्शी नियमन, चिकित्सकीय जिम्मेदारी, उद्योग की जवाबदेही और अभिभावकों की जागरूकता के साथ लागू होता है, तो यह केवल एक नियामक आदेश नहीं रहेगा, बल्कि जनहित आधारित सुशासन का प्रभावी उदाहरण बन सकता है। आज दुनिया के हर देश के नागरिक की यही अपेक्षा है कि सरकारें केवल नेतृत्व न करें, बल्कि जब नागरिकों की जिंदगी और स्वास्थ्य का सवाल हो, तब समय पर सही निर्णय लें, नियमों का कड़ाई से पालन कराएं और किसी भी संभावित खतरे को बड़ा संकट बनने से पहले रोकें। बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा में यही जिम्मेदार शासन की सबसे मानवीय और सबसे आवश्यक पहचान है।
*-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318*
