आस्था के उत्सवों को मनोरंजन की मंडी बनाने से आखिर कब बचेंगे हम?
**लेखक: सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’**
**बिलासपुर, छत्तीसगढ़**
भारतीय संस्कृति में पर्व और त्योहार केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं हैं, बल्कि हमारी आस्था, परंपरा, सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत के जीवंत प्रतीक हैं। नवरात्रि में मां दुर्गा की आराधना, होली में प्रेम और सद्भाव के रंग, दीपावली में प्रकाश का संदेश तथा अन्य धार्मिक उत्सवों में सेवा, संयम और सदाचार की प्रेरणा समाहित है। इन पर्वों का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर सद्भाव, संवेदना और मानवीय मूल्यों को जागृत करना भी है। लेकिन जब इन्हीं पावन अवसरों पर फूहड़ता, अश्लीलता, अनावश्यक प्रदर्शन और मर्यादाहीन नृत्य-संगीत हावी होने लगें, तब एक संवेदनशील व्यक्ति का व्यथित होना स्वाभाविक है।
प्रश्न यह नहीं है कि लोग त्योहारों में आनंद क्यों लेते हैं। प्रश्न यह है कि **क्या आनंद मनाने के नाम पर हम अपने ही पर्वों की आत्मा को विस्मृत करते जा रहे हैं?**नवरात्रि का नाम आते ही मन में देवी आराधना, दुर्गा सप्तशती के पाठ, आरती, भजन, गरबा और डांडिया की सुंदर छवियां उभरती हैं। इन परंपराओं में भक्ति भी है, सामूहिक उल्लास भी और सांस्कृतिक सौंदर्य भी। गरबा और डांडिया जैसे पारंपरिक नृत्य स्वयं हमारी लोक-संस्कृति की समृद्ध अभिव्यक्तियां हैं। उनकी लय, ताल और सामूहिकता में एक विशिष्ट सांस्कृतिक गरिमा दिखाई देती है।लेकिन कुछ आयोजनों में जब देवी आराधना के लिए सजे मंचों पर ऐसे फिल्मी गीत बजाए जाते हैं, जिनके बोल या प्रस्तुतिकरण का धार्मिक अवसर से कोई सामंजस्य नहीं होता, तब उत्सव की मूल भावना पीछे छूटने लगती है। नृत्य यदि भक्ति और लोकपरंपरा से हटकर केवल अशोभनीय शारीरिक प्रदर्शन का माध्यम बन जाए, तो यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि हम उत्सव मना रहे हैं या उसके नाम पर केवल भीड़ जुटा रहे हैं।
आधुनिक संगीत का प्रयोग अपने आप में गलत नहीं है और न ही प्रत्येक फिल्मी गीत अनुचित होता है। आपत्ति वहां है, जहां गीतों के चयन, नृत्य की शैली, वेशभूषा और सार्वजनिक व्यवहार में अवसर की गरिमा तथा दूसरों की सहजता का ध्यान नहीं रखा जाता। देवी की आराधना के लिए आयोजित कार्यक्रम में मनोरंजन की ऐसी प्रतिस्पर्धा क्यों हो, जिसमें भक्ति का स्वर ही दब जाए?
होली भारतीय जनजीवन का ऐसा रंगोत्सव है, जो सामाजिक दूरियों को कम करने, पुराने मनमुटाव भुलाने और प्रेमपूर्वक मिलने का संदेश देता है। फाग, फगुआ, लोकगीत, हास्य-विनोद और पारंपरिक ठिठोली इसकी विशेषताएं हैं। छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराओं सहित देश के विभिन्न अंचलों में होली के गीतों की अपनी विशिष्ट पहचान रही है। हमारी परंपरा में हंसी है, चुहल है, व्यंग्य है और जीवन के सहज उल्लास के लिए पर्याप्त स्थान है। लेकिन इन सबकी एक मर्यादा भी है। किसी की गरिमा को ठेस पहुंचाना, अश्लील शब्दों को उत्सव का अनिवार्य हिस्सा मान लेना, महिलाओं पर अभद्र टिप्पणियां करना या किसी की इच्छा के विरुद्ध रंग लगाने और नाचने-गाने के लिए बाध्य करना होली की मस्ती नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और सम्मान की सीमाओं का उल्लंघन है।
‘बुरा न मानो, होली है’ कह देने मात्र से कोई अनुचित व्यवहार उचित नहीं हो जाता। त्योहार की आड़ में किसी को अपमानित करने या असहज करने का अधिकार किसी को नहीं मिल जाता। जिस रंग से चेहरे पर मुस्कान आनी चाहिए, यदि उसी रंग के बहाने किसी के मन में भय, अपमान या असुरक्षा पैदा हो, तो हमें अपने उत्सव के स्वरूप पर आत्ममंथन करना चाहिए।
आज का युग परिवर्तन का युग है। पहनावे, संगीत, नृत्य और मनोरंजन के तरीकों में बदलाव स्वाभाविक है। प्रत्येक पीढ़ी को अपनी रुचि के अनुसार जीवन जीने का अधिकार है। किसी की वेशभूषा देखकर उसके चरित्र का निर्णय करना भी उचित नहीं है। फिर भी सार्वजनिक धार्मिक आयोजनों में यह अपेक्षा असंगत नहीं कि प्रस्तुतियां अवसर के अनुरूप हों और किसी व्यक्ति की गरिमा अथवा धार्मिक भावनाओं को अनावश्यक रूप से आहत न करें।स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच का अंतर समझना आवश्यक है। स्वतंत्रता हमें अपनी पसंद चुनने का अधिकार देती है, लेकिन साथ ही दूसरों के अधिकारों और सम्मान का ध्यान रखने की जिम्मेदारी भी सौंपती है। अपनी पसंद का संगीत सुनना एक बात है; उसे इस तरह सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करना कि धार्मिक आयोजन की गरिमा भंग हो या आसपास के लोगों को असुविधा हो, दूसरी बात है। इसी प्रकार आकर्षक परिधान पहनना और सजना-संवरना किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद है। समस्या किसी विशेष कपड़े में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो पूरे आयोजन को केवल दिखावे, प्रदर्शन और दूसरों का ध्यान आकर्षित करने की प्रतियोगिता बना देती है। संस्कृति की रक्षा का अर्थ किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अनावश्यक पहरा लगाना नहीं, बल्कि सामूहिक आयोजनों में विवेक, शालीनता और परस्पर सम्मान की भावना विकसित करना है।
आज अनेक आयोजनों में भव्य मंच, महंगी सजावट, तेज ध्वनि वाले उपकरण, आकर्षक रोशनी और सोशल मीडिया पर प्रदर्शन की होड़ दिखाई देती है। इनमें से प्रत्येक व्यवस्था अपने आप में अनुचित नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब आयोजन की सफलता का पैमाना भक्ति, सहभागिता और सांस्कृतिक गुणवत्ता के बजाय केवल भीड़, चमक-दमक, वायरल वीडियो और प्रदर्शन बन जाता है। क्या किसी धार्मिक आयोजन की सफलता इस बात से तय होगी कि वहां कितने लोग श्रद्धापूर्वक आरती में शामिल हुए, या इस बात से कि कितने लोग कैमरे के सामने नाचे? क्या नवरात्रि की सार्थकता देवी के प्रति श्रद्धा, सेवा और साधना में है, या केवल आकर्षक प्रस्तुतियों और दिखावे में? ये प्रश्न किसी की आस्था को कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि आस्था को उसके वास्तविक अर्थ में समझने के लिए हैं। धार्मिक पर्वों में आधुनिक तकनीक और रचनात्मकता का स्वागत होना चाहिए, लेकिन तकनीक साधन बनी रहे, उद्देश्य नहीं। प्रकाश की व्यवस्था इतनी भव्य हो सकती है कि पूरा परिसर जगमगा उठे, लेकिन यदि मनुष्य के भीतर संवेदना का दीप ही बुझ जाए, तो उस रोशनी का सांस्कृतिक अर्थ अधूरा रह जाता है।
जब किसी आयोजन में अश्लील गीत बजते हैं, अभद्र नृत्य होते हैं या धार्मिक मंचों का उपयोग केवल मनोरंजन के लिए होने लगता है, तो सारा दोष युवाओं पर डालकर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। आयोजक, सांस्कृतिक समितियां, अभिभावक, सामाजिक संस्थाएं और स्थानीय समुदाय, सभी की इसमें भूमिका है। यदि आयोजक कार्यक्रम की शुरुआत में ही यह स्पष्ट कर दें कि गीतों का चयन अवसर के अनुरूप होगा, नृत्य प्रस्तुतियों में शालीनता रहेगी, ध्वनि की निर्धारित सीमाओं का पालन किया जाएगा और किसी के साथ दुर्व्यवहार स्वीकार नहीं होगा, तो अनेक समस्याओं को रोका जा सकता है। इसी तरह युवाओं को केवल उपदेश देने के बजाय उन्हें पारंपरिक लोकगीतों, शास्त्रीय एवं लोकनृत्यों, भजन, सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं और रचनात्मक प्रस्तुतियों के अवसर देने चाहिए। छत्तीसगढ़ की लोकधुनों, पंथी, राउत नाचा और अन्य लोककलाओं से प्रेरित कार्यक्रम त्योहारों को नई ऊर्जा दे सकते हैं। परंपरा को जीवित रखने का सर्वोत्तम तरीका उसे नई पीढ़ी के लिए आकर्षक बनाना है, न कि उसे केवल पुराने समय की वस्तु बताकर छोड़ देना। धार्मिक आयोजन समितियों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नियम सब पर समान रूप से लागू हों। किसी के पहनावे, लिंग, आयु या सामाजिक स्थिति के आधार पर अपमानजनक व्यवहार नहीं होना चाहिए। अनुचित आचरण की पहचान उसके वास्तविक स्वरूप और प्रभाव से होनी चाहिए, न कि व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से।
केवल नियम बना देने से सांस्कृतिक चेतना विकसित नहीं होती। इसके लिए परिवार, विद्यालय, समाज और धार्मिक संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा। बच्चों को यह समझाना होगा कि त्योहारों का अर्थ केवल छुट्टी, मनोरंजन या खरीदारी नहीं, बल्कि साझा स्मृतियों, पारिवारिक संबंधों, सामुदायिक सहयोग और मानवीय संवेदनाओं का उत्सव भी है। नवरात्रि में कन्या सम्मान की बात तभी सार्थक है, जब दैनिक जीवन में भी महिलाओं के प्रति सम्मान बना रहे। होली पर प्रेम और भाईचारे का संदेश तभी प्रभावी होगा, जब हम दूसरे की इच्छा और सीमाओं का सम्मान करें। दीपावली में प्रकाश का स्वागत तभी अर्थपूर्ण होगा, जब हम अपने व्यवहार से किसी के जीवन में अंधकार न फैलाएं। यही वह सांस्कृतिक निरंतरता है, जो किसी पर्व को एक दिन के आयोजन से आगे बढ़ाकर जीवन-मूल्य में बदल देती है।यह भी याद रखना होगा कि किसी परंपरा की रक्षा के नाम पर दूसरों को अपमानित करना, हिंसा करना या कानून हाथ में लेना स्वयं उसी मर्यादा के विरुद्ध है, जिसकी रक्षा का दावा किया जा रहा हो। सुधार संवाद, जागरूकता, जिम्मेदार आयोजन और आवश्यक होने पर विधिसम्मत कार्रवाई से ही संभव है।
भारतीय पर्वों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी विविधता, जीवंतता और लोगों को जोड़ने की क्षमता है। इन्हें न तो संकीर्णता में बांधने की आवश्यकता है और न ही बाजारवाद के हवाले करने की। आवश्यकता इस संतुलन की है, जिसमें आनंद भी हो, आधुनिकता भी हो, रचनात्मकता भी हो और सांस्कृतिक मर्यादा भी अक्षुण्ण रहे। हमें यह तय करना होगा कि हम आने वाली पीढ़ियों को अपने त्योहारों की कौन-सी विरासत सौंपना चाहते हैं ऐसी परंपरा, जिसमें श्रद्धा के स्थान पर शोर, लोकगीतों के स्थान पर अर्थहीन फूहड़ता और आत्मीयता के स्थान पर दिखावे की प्रतिस्पर्धा हो; या ऐसी संस्कृति, जिसमें भक्ति के साथ उल्लास, स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी और आधुनिकता के साथ संस्कार भी जीवित रहें। पर्वों की पवित्रता केवल मंदिरों, मूर्तियों और सजाए गए पंडालों में नहीं बसती। वह हमारे आचरण, हमारी भाषा, हमारे व्यवहार और दूसरों के प्रति हमारे सम्मान में दिखाई देती है। मां दुर्गा की आराधना करते समय यदि हम नारी सम्मान भूल जाएं, होली के रंगों में यदि मानवीय मर्यादा भुला दें और सांस्कृतिक उत्सवों में यदि अपनी ही परंपराओं का उपहास होने दें, तो हमें अपनी प्राथमिकताओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
**त्योहारों को आधुनिक बनाइए, लेकिन उनकी आत्मा को विस्मृत मत कीजिए। उत्सवों को भव्य बनाइए, लेकिन उनकी गरिमा को छोटा मत कीजिए। आनंद मनाइए, लेकिन किसी की संवेदना को कुचलकर नहीं।**क्योंकि संस्कृति का वास्तविक सौंदर्य मंच की चमक में नहीं, मन की पवित्रता में है। और जिस दिन हम यह अंतर समझ लेंगे, उस दिन हमारे पर्व केवल कैलेंडर पर आने वाले उत्सव नहीं रहेंगे, बल्कि हमारी सभ्यता, संस्कार और मानवीय चेतना के सच्चे उत्सव बन जाएंगे।
*संदर्भ:* – भारत सरकार के केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के दिशानिर्देशों में अश्लीलता, दोहरे अर्थ वाले निम्नस्तरीय संवादों और महिलाओं के अपमानजनक चित्रण से बचने की बात कही गई है। इसी प्रकार, इंदौर पुलिस के 2026 के त्योहार संबंधी निर्देशों में सार्वजनिक आयोजनों के दौरान ध्वनि-सीमा, धार्मिक स्थलों की मर्यादा, सुरक्षा और आपसी सौहार्द का ध्यान रखने पर जोर दिया गया है। ये संदर्भ आलेख में उठाए गए सांस्कृतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व के विचारों को आधार देते हैं।
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
– लेखक/ वरिष्ठ पत्रकार
– बिलासपुर, छत्तीसगढ़
