
बिलासपुर। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। समाज की समस्याओं को शासन-प्रशासन तक पहुंचाना, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और सच को सामने लाना पत्रकारों की जिम्मेदारी है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति चंद पत्रकारों के कथित व्यवहार के आधार पर पूरे पत्रकार समुदाय को ब्लैकमेलर कहता है, तो यह निश्चित रूप से विचारणीय विषय है।
मामला पूज्य सिंधी सेंट्रल पंचायत बिलासपुर के पूर्व अध्यक्ष, श्री झूलेलाल मंगलम धाम के वरिष्ठ पदाधिकारी एवं समाजसेवी तथा बिल्डर प्रकाश गवलानी से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, विगत दिनों श्री झूलेलाल मंगलम धाम में आयोजित एक सामाजिक कार्यक्रम में भोपाल के भाजपा विधायक भगवानदास सबनानी सहित रायपुर एवं बिलासपुर के अनेक वरिष्ठ समाजसेवी और समाज के लोग उपस्थित थे।
कार्यक्रम के दौरान समाज को व्यापार के साथ-साथ प्रशासनिक, राजनीतिक और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाने तथा दैनिक समाचार पत्र और अपना न्यूज चैनल शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ने का सुझाव दिया गया। इसी चर्चा के दौरान प्रकाश गवलानी द्वारा कथित रूप से पत्रकारों को ब्लैकमेलर कहे जाने की बात सामने आई।
बैठक में रायपुर के पत्रकार देवानंद शर्मा सहित बिलासपुर के एक वरिष्ठ पत्रकार भी मौजूद थे। इस टिप्पणी से उपस्थित पत्रकारों को काफी ठेस पहुंचने की बात कही जा रही है।
आखिर सभी पत्रकारों को एक ही तराजू में तौलना कहां तक उचित?
हमारा सवाल यह है कि यदि किसी पत्रकार ने किसी व्यक्ति को ब्लैकमेल किया है, तो संबंधित व्यक्ति को चाहिए कि वह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ऐसे पत्रकारों का नाम और उनके खिलाफ उपलब्ध प्रमाण सार्वजनिक करे तथा कानूनी कार्रवाई करे। लेकिन कुछ लोगों के कथित व्यवहार के कारण पूरे पत्रकार समुदाय को ब्लैकमेलर कहना क्या उचित है? जिस तरह सभी बिल्डर एक जैसे नहीं होते, उसी तरह सभी पत्रकार भी एक जैसे नहीं होते। हर क्षेत्र में अच्छे और बुरे लोग होते हैं।
बिल्डर और कॉलोनीवासियों के विवाद भी चर्चा में
प्रकाश गवलानी से जुड़े कुछ निर्माण एवं कॉलोनी संबंधी विवादों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। बताया जाता है कि उनकी कॉलोनी के कुछ निवासियों ने विभिन्न मंचों पर अपनी समस्याएं उठाई हैं तथा रेरा और न्यायालय में भी मामले विचाराधीन होने की बात कही जा रही है। पूर्व में कॉलोनी में बकाया राशि और बिल्डर से जवाबदेही की मांग को लेकर पोस्टर-बैनर लगाए जाने की भी चर्चा रही है। हालांकि इन मामलों की वास्तविक स्थिति संबंधित दस्तावेजों और न्यायालयीन रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकती है।
ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि दूसरों के पेशे पर टिप्पणी करने से पहले प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यवहार और अपने कार्यों की समीक्षा नहीं करनी चाहिए?
सच लिखने वाले पत्रकारों को दबाव में लाने के आरोप
पत्रकारिता का काम किसी की प्रशंसा में कसीदे पढ़ना नहीं, बल्कि जनता से जुड़े मुद्दों को निष्पक्षता से सामने लाना है। यदि कोई पत्रकार किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ सवाल उठाता है या उसके कार्यों की आलोचना करता है, तो उसका जवाब तथ्यों और प्रमाणों से दिया जाना चाहिए, न कि उसे डराने या दबाव में लाने का प्रयास होना चाहिए।
पत्रकारों का कहना है कि समाज में ऐसे भी उदाहरण हैं, जहां खबरों को लेकर विवाद, मानहानि के मुकदमे और लंबे समय तक कानूनी लड़ाइयां चलती रहती हैं। पत्रकारिता की स्वतंत्रता और पत्रकारों की गरिमा का सम्मान होना भी उतना ही जरूरी है।
एक पत्रकार की लड़ाई, जिसके पीछे है सच और ईमानदारी का भरोसा
इस पूरे प्रकरण में एक ऐसे पत्रकार का उदाहरण भी सामने रखा जा रहा है, जो लंबे समय से कानूनी और व्यक्तिगत चुनौतियों का सामना करने के बावजूद अपनी लड़ाई जारी रखे हुए है। बताया जाता है कि उसके पास न धनबल है, न पद और न ही कोई राजनीतिक गॉडफादर, फिर भी वह अपने पक्ष और अपनी पत्रकारिता की गरिमा के लिए डटा हुआ है।
जब उससे पूछा गया कि उसके पीछे कौन खड़ा है, तो उसका जवाब था—मेरे पीछे मेरी मां का आशीर्वाद है, सिर पर भगवान झूलेलाल की कृपा है, संतों का आशीर्वाद है, लाखों लोगों की दुआएं हैं और सबसे बड़ी ताकत सच एवं ईमानदारी की कलम है।
यह जवाब बताता है कि पत्रकार की असली ताकत उसकी कलम, उसका आत्मसम्मान और जनता का विश्वास होता है, न कि धन-दौलत या सत्ता का प्रभाव।
अहंकार और पद का नशा किसी के लिए स्थायी नहीं
समाज में सम्मान धन-दौलत, पद और प्रभाव से नहीं, बल्कि व्यवहार, संस्कार और दूसरों के प्रति सम्मान से मिलता है। किसी भी व्यक्ति को यह नहीं भूलना चाहिए कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। आज जिसके पास धन और प्रभाव है, कल परिस्थितियां बदल भी सकती हैं। जीवन का अंतिम सत्य यही है कि इंसान अपने साथ धन-दौलत नहीं ले जाता, बल्कि अपने कर्म और व्यवहार की छाप छोड़कर जाता है।
हमारा स्पष्ट संदेश : सभी पत्रकार एक जैसे नहीं होते
प्रकाश गवलानी से हमारा सवाल है कि यदि किसी पत्रकार से व्यक्तिगत शिकायत है तो उसका नाम लेकर प्रमाण सहित अपनी बात रखें। लेकिन पूरे पत्रकार समुदाय को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं है। पत्रकार भी समाज का हिस्सा हैं और समाज के हित में अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं।
समाज के वरिष्ठ पदाधिकारी और जिम्मेदार व्यक्ति होने के नाते उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने शब्दों और व्यवहार में संयम रखें। यदि पत्रकारों के संबंध में की गई टिप्पणी से किसी की भावनाएं आहत हुई हैं, तो उन्हें इस विषय पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
क्योंकि कलम की ताकत को धन और पद के तराजू में नहीं तौला जा सकता। सच की आवाज को दबाया नहीं जा सकता और किसी एक व्यक्ति की गलती के लिए पूरे समाज या पूरे पेशे को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
समाज से और पत्रकारों से बिना शर्त माफी मांगे इसमें ही उसका भला है
