
महासमुंद कुटुंब न्यायालय के न्यायाधीश प्रफुल्ल कुमार सोनवानी का नाम विवाद में आया, पत्नी आकांक्षा भारद्वाज की न्यायिक सेवा समाप्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा; साले अभिषेक भारद्वाज पर भी पूर्व में आर्म्स एक्ट की कार्रवाईअनिल शुक्ला की रिपोर्टबिलासपुर। न्यायधानी बिलासपुर के राजकिशोर नगर में जन्मदिन समारोह के दौरान हुए विवाद ने अब कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले में महासमुंद कुटुंब न्यायालय में पदस्थ न्यायाधीश प्रफुल्ल कुमार सोनवानी, उनकी पत्नी आकांक्षा भारद्वाज और उनके रिश्तेदार अभिषेक भारद्वाज के नाम सामने आए हैं। एक ओर जन्मदिन समारोह में शामिल लोगों ने गाली-गलौज, धमकी और पद का प्रभाव दिखाने के आरोप लगाए हैं, वहीं दूसरी ओर न्यायाधीश पक्ष ने भी मारपीट और अभद्रता की शिकायत दर्ज कराई है। दोनों पक्षों की FIR के बाद मामला पुलिस जांच के दायरे में है।लेकिन इस विवाद की चर्चा केवल जन्मदिन समारोह तक सीमित नहीं है। न्यायाधीश प्रफुल्ल कुमार सोनवानी की पत्नी आकांक्षा भारद्वाज का न्यायिक सेवा से जुड़ा पुराना मामला और उनके रिश्तेदार अभिषेक भारद्वाज के विरुद्ध पूर्व में हुई आर्म्स एक्ट की कार्रवाई भी चर्चा में आ गई है।महासमुंद कुटुंब न्यायालय में पदस्थ हैं प्रफुल्ल कुमार सोनवानीजिला न्यायालय महासमुंद की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध न्यायाधीशों की सूची में प्रफुल्ल कुमार सोनवानी का नाम न्यायाधीश, परिवार न्यायालय के पद पर दर्ज है। वे महासमुंद में कुटुंब न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं। उनकी न्यायिक पदस्थापना की पुष्टि न्यायालय की आधिकारिक सूची से होती है।ऐसे में बिलासपुर में उनके साथ हुए विवाद और दोनों पक्षों की ओर से दर्ज FIR को लेकर न्यायिक पद से जुड़े आचरण, निष्पक्षता और प्रशासनिक प्रक्रिया पर भी चर्चा शुरू हो गई है।पत्नी आकांक्षा भारद्वाज की न्यायिक सेवा का विवादित इतिहासप्रफुल्ल कुमार सोनवानी की पत्नी आकांक्षा भारद्वाज का नाम भी छत्तीसगढ़ की न्यायिक व्यवस्था से जुड़े एक चर्चित मामले में सामने आ चुका है।उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, आकांक्षा भारद्वाज का चयन वर्ष 2012-13 में सिविल जज (प्रवेश स्तर) के पद पर हुआ था। उन्होंने 27 दिसंबर 2013 को न्यायिक सेवा में कार्यभार ग्रहण किया था।न्यायिक सेवा के दौरान एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध अनुचित व्यवहार की शिकायत से जुड़ा विवाद सामने आया। इस मामले में आंतरिक जांच और न्यायिक प्रशासनिक प्रक्रिया के बाद 9 फरवरी 2017 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं।इसके बाद आकांक्षा भारद्वाज ने अपनी बर्खास्तगी को न्यायालय में चुनौती दी। मई 2024 में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने उनकी बर्खास्तगी के आदेश को निरस्त करते हुए वरिष्ठता के साथ पुनर्बहाली का आदेश दिया। इसके बाद दिसंबर 2024 में उनकी पुनः पदस्थापना की खबरें सामने आईं।हालांकि, यह कानूनी विवाद यहीं समाप्त नहीं हुआ। जनवरी 2025 में हाईकोर्ट की अनुशंसा के बाद विधि एवं विधायी विभाग ने उनकी सेवा समाप्ति का नया आदेश जारी किया। इस आदेश के विरुद्ध आकांक्षा भारद्वाज ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट की 15 अप्रैल 2025 की वाद सूची में आकांक्षा भारद्वाज बनाम छत्तीसगढ़ राज्य के नाम से WP(C) 270/2025 दर्ज होने का रिकॉर्ड उपलब्ध है।इस प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान अंतिम आदेश और मामले की मौजूदा स्थिति आधिकारिक रूप से स्पष्ट किए जाने की आवश्यकता है।अभिषेक भारद्वाज पर पहले भी आर्म्स एक्ट की कार्रवाईइस पूरे विवाद में सामने आए अभिषेक भारद्वाज का नाम भी पूर्व में सरकंडा थाना क्षेत्र की पुलिस कार्रवाई में आ चुका है।7 जुलाई 2022 की प्रकाशित पुलिस कार्रवाई की जानकारी के अनुसार, राजकिशोर नगर पानी टंकी गार्डन के पास एक कार की जांच के दौरान अभिषेक भारद्वाज के कब्जे से पिस्टल बरामद होने का उल्लेख किया गया था। इस मामले में पुलिस ने आर्म्स एक्ट की धारा 25 और 27 के तहत कार्रवाई की थी। उसी कार्रवाई में एक अन्य युवक के कब्जे से भी हथियार और कारतूस के खोखे मिलने की जानकारी दी गई थी।यह पुराना पुलिस मामला अब जन्मदिन समारोह के दौरान हुए नए विवाद के संदर्भ में फिर चर्चा में है। हालांकि, पुराने मामले में न्यायालय का अंतिम निर्णय क्या हुआ, इसकी जानकारी अलग से सत्यापित किया जाना जरूरी है।जन्मदिन समारोह में विवाद, दोनों पक्षों की FIRराजकिशोर नगर में 1 नवंबर की रात अभय बरुआ के घर जन्मदिन समारोह आयोजित किया गया था। उनके मित्र विनय वेद सहित अन्य लोग मौजूद थे। समारोह के दौरान पटाखे जलाने और शोर-शराबे को लेकर विवाद होने की बात सामने आई है।अभय बरुआ पक्ष का आरोप है कि प्रफुल्ल सोनवानी, उनकी पत्नी आकांक्षा सोनवानी और अभिषेक भारद्वाज मौके पर पहुंचे और गाली-गलौज करते हुए जान से मारने की धमकी दी। वहीं न्यायाधीश पक्ष की शिकायत में जन्मदिन समारोह के शोर का विरोध करने पर उनके और परिवार के साथ मारपीट किए जाने का आरोप लगाया गया है।पुलिस ने दोनों पक्षों की शिकायतों पर FIR दर्ज की है। मामले में अभय बरुआ और उनके साथियों के विरुद्ध तथा दूसरी ओर प्रफुल्ल सोनवानी, आकांक्षा सोनवानी और अभिषेक भारद्वाज के विरुद्ध कार्रवाई की गई है।न्यायिक पद और निजी विवाद के बीच निष्पक्ष जांच जरूरीइस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब एक पक्ष न्यायिक अधिकारी के परिवार से जुड़ा है और दूसरे पक्ष में तहसीलदार के पति सहित अन्य लोग शामिल हैं, तब पुलिस जांच कितनी निष्पक्ष और पारदर्शी रहती है।क्या घटना के समय न्यायिक पद का प्रभाव दिखाया गया? क्या वास्तव में मारपीट और धमकी हुई? क्या दोनों पक्षों के आरोपों की पुष्टि CCTV फुटेज और स्वतंत्र गवाहों से हो सकती है? इन सभी बिंदुओं पर पुलिस को तथ्यात्मक जांच करनी होगी।साथ ही न्यायिक सेवा से जुड़े पुराने प्रकरणों और पूर्व पुलिस कार्रवाई को लेकर भी संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।फिलहाल दोनों पक्षों के आरोप जांच के अधीन हैं। किसी भी पक्ष को दोषी ठहराने का निर्णय पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही हो सकता है। न्यायिक एवं प्रशासनिक पदों से जुड़े परिवारों के इस विवाद में अब पुलिस की निष्पक्ष कार्रवाई और उपलब्ध साक्ष्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
