बिलासपुर:- बाबा आनंदराम दरबार, चकरभाठा से पधारे आदरणीय श्री बलराम भैया जी के द्वारा, विनोबा नगर बिलासपुर में सत्संग कीर्तन की अमृत वर्षा की गई।
कार्यक्रम की शुरुआत दोपहर 12:00 बजे से हुई, जिसमें सर्वप्रथम भगवान श्री झूलेलाल जी की तस्वीर पर पुष्प अर्पण कर दीप प्रजवलित किया गया, तत्पश्चात श्री बलराम भैया जी ने अपनी मधुर वाणी में सत्संग कीर्तन कर संगत को भक्ति से सराबोर कर दिया। उन्होंने संगत को कई मंत्रमुग्ध कर देनी वाली भगवान जी की सुंदर कथाएं सुनाई, जिसमें एक कथा रामायण काल की थी, जब माता सीता विवाह करके अयोध्या आती हैं, तब के समय में नई दुल्हन घूंघट नीचे तक ढक कर रखती थीं, और मुंह दिखाई की रस्म अदा की जाती थी, जिसमें शगुन के तौर पर नई दुल्हन को कुछ दिया जाता था। तो सबसे पहले माता कैकेयी ने रस्म को निभाते हुए माता सीता से चेहरा दिखाने को कहा और शगुन में एक हज़ार सोने के रथ माता सीता को दिए, फिर माता सुमित्रा ने नई दुल्हन माता सीता जी से कहा कि अपना चेहरा दिखाओ तब सीता जी ने कहा कि माता मुंह दिखाई के रूप में कुछ दीजिए तो माता सुमित्रा ने 10000 सोने के सुंदर हार दिए। अब बारी माता कौशल्या जी की थी, तो माता सीता ने उनसे भी यही कहा कि कुछ मुंह दिखाई दीजिए, तो उन्होंने शगुन में 10000 दासियां जो स्वर्ण आभूषण धारण की हुई तुम्हारी सेवा करेंगी, तब माता सीता ने कहा यह तो मेरे पिता के घर में भी था, तो माता कौशल्या ने 20000 सोने की अंगूठियां शगुन में दी, तब माता सीता ने फिर कहा यह भी मेरे पिता के घर में था, जो भी माता कौशल्या मुंह दिखाई के रूप में देती तो माता सीता हर बार कहती कि यह तो मेरे पिता के घर में था, तब माता कौशल्या यह सब सुनकर असमंजस में पड़ गई, कि क्या करूं? अब सामने बैठे प्रभु श्रीराम जी मुस्कुराते हुए माता कौशल्या जी को कान में कुछ बातें कहीं, फिर माता कौशल्या ने कहा बेटी सीता घूंघट उठाओ चेहरा दिखाओ तो माता सीता ने कहा पहले माता जी हाथ में कुछ दीजिए तो उन्होंने प्रभु श्रीरामचंद्र जी का हाथ पकड़ कर माता सीता के हाथ में रख दिया और कहा मुंह दिखाई के रूप में मैं अपने पुत्र राम को तुम्हें सौंपती हूं, अभी तक मैं इसे संभालती थी, अब तुम इसकी देखभाल करोगी, अब यह तुम्हारी जिम्मेदारी होगी। अंत में माता कौशल्या एक बड़ा सुंदर सवाल पूछती है कि क्या यह भी तुम्हारे पिता के घर में था, तब माता सीता मुस्कुराते हुए कहती है कि नहीं माताजी अगर यह मेरे पिता के घर में होते तो मैं आपके यहां कैसे आती। इस कथा का बताने का अर्थ यह है कि हमारे जो रीति-रिवाज थे, पुराने संस्कार थे आज वह धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं जिसकी वजह से हम पतन की राह पर चलते जा रहे हैं, यही हमारे वह आभूषण थे, जो हमें अपने बड़ों से मिले थे, पर जैसे-जैसे समय बीत रहा है, नई पीढ़ी आ रही है नया युग आ रहा है, नई टेक्नोलॉजी आ रही है, वैसे वैसेलोग अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। पैसा तो खूब कमा रहे हैं मगर अपनी संस्कृति को पीछे छोड़ते जा रहे हैं, जिसके कारण आज कई ऐसी घटनाएं घट रही हैं और समाज में कई ऐसी कुरीतियाँ आ गई हैं जिसे दूर करना बहुत जरूरी है। अपनी अमृतवाणी में कई भक्ति भरे भजन गाए, जिसे सुनकर भक्तजन भाव विभोर हो गए। सत्संग के पश्चात आरती की गई, पल्लव पाया गया एवं अरदास की गई, अंत में प्रसाद वितरण किया गया एवं सारी संगत के लिए भंडारा प्रसाद का भी आयोजन किया गया था, जिसे सारी संगत ने ग्रहण कर प्रभु का प्रसाद स्वीकार किया l
आज के इस सत्संग कार्यक्रम को सफल बनाने में कृपलानी परिवार एवं बाबा आनंद राम सेवा समिति बिलासपुर के सभी सेवादारियों का विशेष सहयोग रहा।
भवदीय
विजय दुसेजा
