पूज्य पंचगणों,
सादर जय झूलेलाल..
जय माता हिंगलाज..
नशा सभ्य समाज और सभ्य मानव जीवन के लिए वास्तव में एक अभिशाप है। यह न केवल व्यक्तिगत जीवन को नष्ट करता है, वरन् समाज और परिवार को भी प्रभावित करता है।
रायपुर ;- नशा एक ऐसी सामाजिक बुराई है जो हमारे समूल जीवन को नष्ट कर देती है। नशे की लत से पीड़ित व्यक्ति परिवार के साथ-साथ समाज पर भी बोझ बन जाता है। आज के दौर में आधुनिक जीवनशैली के चलते युवा पीढ़ी सबसे ज्यादा नशे की लत से पीड़ित है। सरकार इन पीड़ितों को नशे के चुंगल से छुड़ाने के लिए नशा मुक्ति अभियान चलाती है, शराब और गुटखे पर रोक लगाने के प्रयास करती है। लेकिन आप हर कार्य के लिए सरकार पर निर्भर रह कर हाथ पर हाथ धरे बैठे नही रह सकते है। इसके लिए समाज को भी स्वयं आगे आकर प्रयास करने की जरुरत रहती है। इसी कड़ी में सिन्धी समाज द्वारा युवाओं को नशे की लत से बचाने जागरुकता अभियान की सराहनीय पहल की गई है। जिसमें समाज में कोढ़ की तरह फैलती जा रही कुरीतियों यथा पूल पार्टी एवं कॉकटेल पार्टी पर प्रतिबंध लगाया गया है। जिसके लिए सिन्धी समाज साधुवाद का पात्र है। लेकिन यह प्रयास तभी फलीभूत होगा जब हम आप सभी अपने-अपने स्तर पर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन की दिशा में निरंतर सकारात्मक प्रयास जारी रखेंगे। केवल निर्णय लेकर हमें बैठ नही जाना है वरन् इसे एक चुनौती के बतौर लेकर सदैव सक्रिय रहकर लोगों को जनजागरण के लिए प्रेरित करते रहना है, तथा समय-समय पर इसकी निगरानी और समीक्षा भी करनी होगी। पूल पार्टी के साथ-साथ प्री-वेडिंग शूटिंग पर भी सिन्धी समाज को संजीदगी के साथ निर्णय की दिशा में क़दम बढ़ाना होगा।
नशे के रुप में लोग शराब, गाँजा, जर्दा, सिगरेट इत्यादि मादक पदार्थों का प्रयोग करते हैं, जो स्वास्थ्य के साथ सामाजिक और आर्थिक दोनों दृष्टिकोंण से उचित नहीं है।
नशे के आदी व्यक्ति को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है । नशे करने वाले व्यक्ति की समाज एवं राष्ट्र के लिया उपादेयता शून्य हो जाती है । वह नशे से अपराध की ओर अग्रसर हो जाता है।
नशा न केवल स्वास्थ्य बल्कि समाज की शांति के लिए भी खतरनाक है नशा मुक्ति आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है नशा मुक्ति के लिए हम सभी को सामूहिक प्रयास करना चाहिए।
नशा परिवारों को बर्बाद करने का माध्यम है नशा देशों को भी बर्बाद करता है नशा एक सामाजिक बुराई है जो समाज के साथ साथ सेहत के भी खतरनाक है इस बुराई को हम जागरुकता से ही खत्म कर सकते है।
यह एक प्राचीन कहानी है जो आपने कभी सुनी अथवा पढ़ी होगी आज इसे आपके साथ साझा कर रहे है।
एक गांव में एक महिला का बेटा गुड़ बहुत अधिक खाता था महिला बेटे की इस आदत से तंग आकर उसे गांव में एक साधु के पास लेकर गई और उसने उस साधु से कहा, ‘महाराज, मेरा बेटा गुड़ बहुत अधिक खाता है। जरुरत से बहुत ज्यादा गुड़ खाने से इसके दांत खराब होने लगे है और भी कई प्रकार की समस्याएं उसे होने लगी हैं। कृपया करके इसका गुड़ खाना छुड़वा दो।’
साधु ने कुछ सोचा और कहा, ‘माई आज नहीं मैं कल इसका गुड़ खाना छुड़वाऊंगा।’
महिला ने अगले दिन फिर से साधु से वही बात दोहराई। साधु ने अगले दिन भी कहा कि कल छुड़वाऊंगा।
इस प्रकार तीन-चार दिन निकल गए। महिला साधु से अपने बेटे का गुड़ खाना छुड़वाने के लिए प्रार्थना करती रही। साधु उसे अगले दिन के लिए टालता रहा।
आखिर एक दिन साधु ने उस बच्चे को बुलाया और उसकी आंखों में आंखे डाल कर कहा, ‘बेटा गुड़ मत खाना।’
साधु की नसीहत का असर ऐसा हुआ कि बच्चे ने गुड़ खाना छोड़ दिया।
महिला ने साधु से पूछा, ‘महाराज, आपने जब सिर्फ ये ही कहना था कि बच्चे गुड़ खाना छोड़ दे। तो आपने पहले दिन ही इसे गुड़ खाने से मना क्यों नहीं किया। इतने दिन क्यों लगाए।’
साधु ने कहा, ‘माई, तब मैं खुद भी बहुत ज्यादा गुड़ खाता था और जो काम आप खुद करते हो, उसे छोडऩे की नसीहत किसी और को कैसे दे सकते हो। इन दिनों में मैने खुद गुड़ खाना छोड़ा है। तब बच्चे को नसीहत दे रहा हूं।’
नसीहत उसी बात की देनी चाहिए, जिस पर आप खुद अमल करते हो। तभी नसीहत का असर होता है।
मैं किसी दूसरे को सलाह दूँ और उसे मैं खुद स्वयं पर अमल ना करुं तो मैं असहज महसूस करता हूं।
(पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री जी)
मेरा व्यक्त़िगत सुझाव है कि जिस प्रकार भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री परम् आदरणीय माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी ने भ्रष्टाचार को खत्म करने की दिशा में एक नारा दिया था, न खाऊँगा, न खाने दूँगा कुछ इसी तर्ज पर ही समाज को नशा मुक्त़ करने की दिशा में प्रयास की आवश्यकता है और इसके लिए हम आप सभी को मिलकर संकल्प लेना होगा कि, न पियूँगा, न पिलाऊँगा बच्चे वही सिखते है जो वह अपने घर परिवार अथवा समाज के बड़े बुजुर्गो को करते हुए देखते है, इसलिए हमें अपने बच्चों को नशे की लत से दूर रखने के लिए स्वयं ही उदाहरण बनकर अपने आपको उनके समक्ष प्रस्तुत करना होगा।
सिन्धी समाज में घर परिवार में विवाह उत्सव इत्यादि के लिए विचार विमर्श एवँ अन्य कार्यों के बाबत् होने वाली परिवार के सदस्यों रिश्तेदारों मित्रों एवँ सामाजिक संस्थाओं के समाजसेवियों के साथ आयोजित बैठकों (मेड़ो) तथा विवाह समारोह के एक दिन पूर्व अथवा एक दिन पश्च़ात में आयोजित किया जाने वाला मजलिस (कॉकटेल) पार्टी में जो मदिरापान किया जाता है, उसे बंद करने का संकल्प लेना चाहिए और न खाऊँगा, न खाने दूँगा कि तर्ज़ पर न पियूँगा, न पिलाऊँगा का संकल्प लिया जाना चाहिए।
क्योंकि एकता में बल है और निश्च़ित रुप से यदि पूरा समाज मिलकर नशामुक्ति की दिशा में प्रयास करें तो इसके दूरगामी परिणाम बेहद ही सकारात्मक होंगे ऐसा मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है।
नशा सभ्य समाज और सभ्य मानव जीवन के लिए एक अभिशाप है। इसके कारण व्यक्तिगत, परिवारिक, आर्थिक, सामाजिक और मानसिक समस्याएं हो सकती हैं। नशे से बचाव के लिए जागरुकता, शिक्षा, परिवारिक समर्थन, सामाजिक समर्थन और व्यक्तिगत प्रयास आवश्यक हैं।
प्रगति का प्रण है
समर्पण का वचन है
नशे के खिलाफ महारण है
नशा मुक्त़ समाज का लेना संकल्प है
समाज में व्याप्त कुरीतियों एवँ सामाजिक बुराईयों के प्रति जागरुक करने की दिशा में सामाजिक दायित्वों के निर्वहन के तहत..मेरे इस आलेख को एक सुझाव के बतौर लिया जायेगा..इसी निवेदन के साथ नशामुक्त़ सिन्धी समाज की दिशा में कार्यरत सभी समाजसेवियों को दिल की गहराईयों से धन्यवाद साधुवाद एवँ सभी समाजसेवियों के उज्ज्वल भविष्य..उत्तम स्वास्थ्य एवँ सुदीर्घ जीवन की मंगल कामना सदा सर्वदा..!
✍️…इन्दू गोधवानी..रायपुर 9425514255
