इंदौर :- जिस प्रकार मनुष्य की मृत्यु हो जाने पर भी उसकी आत्मा उसका प्राण जीवित अमर रहता है उसी प्रकार विज्ञान द्वारा निर्मित चलित तकनीकी में भी प्राण होते हैं। विज्ञान की विकसित तकनीकी हवाई जहाज में भी प्राण होता है। हवाई जहाज नष्ट हो जाने के पश्चात भी वह सही सलामत रहता है जिसे विज्ञान की भाषा में ब्लैक बॉक्स कहा जाता है। ब्लैक बॉक्स औपचारिक रूप से हवाई जहाज का फ्लाइट रिकॉर्डर होता है जो एक मजबूत डिवाइस होता है। विमान की उड़ान के दौरान ब्लैक बॉक्स महत्वपूर्ण जानकारी का संग्रहण करता है। ब्लैक बॉक्स का मुख्य उद्देश्य विमान हादसे की जांच करना होता है। ब्लैक बॉक्स का रंग चमकीला नारंगी होता है जिससे हादसे के बाद उसे आसानी से ढूंढा जा सकता है। ब्लैक बॉक्स में दो प्रमुख भाग होते हैं पहला भाग फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर(एफडीआर)जिसके द्वारा विमान की उड़ान के द्वारा उसके फंक्शंस और स्थिति की रिकॉर्डिंग होती है।एफडीआर एक हजार से भी ज्यादा चीजों को ट्रैक कर सकता है यह 6000 मीटर से भी ज्यादा गहराई के पानी के अंदर से भी सिग्नल भेज सकता है। दूसरा भाग कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (सीवीआर) होता है जो कॉकपिट में बैठे पायलेट्स की बातचीत और अन्य आवाजों की रिकॉर्डिंग का कार्य करता है। ब्लैक बॉक्स का पहला डिवाइस 1954 में विमान में लगाया गया था।इसका आविष्कार ऑस्ट्रेलिया के डॉ.डेविड वारेन ने किया था। यह डिवाइस उड़ान डेटा के साथ-साथ कॉकपिट की आवाजों को भी रिकॉर्ड करता था। ब्लैक बॉक्स विमान हादसे की जांच के लिए बहुत जरूरी माना जाता है क्योंकि यह उड़ान के हर पल की जानकारी देता है जिससे हादसे का कारण पता करने में सहायता मिलती है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने में मदद मिलती है। विमान हादसे के बाद ब्लैक बॉक्स को ढूंढकर इसकी मेमोरी मॉड्यूल से डेटा निकाल कर उसमें रिकॉर्ड हुई आवाजों और उड़ान के डाटा को जोड़ा जाता है। डेटा को रडार पर रिकॉर्ड हुई आवाजों और एटीसी डाटा के साथ सिंक करके मैच कराया जाता है। ब्लैक बॉक्स से गहन जांच पड़ताल की जाती है और विमान हादसे के कारण का पता लगाया जाता है।
डॉ. विजय पाटिल
शिक्षक सह साहित्यकार सेंधवा