रायपुर :- सिन्धी समाज में पूर्वजों के समय में जब परिवार के सदस्य व्यापार के लिए परदेस जाते थे, तब रास्ते में आने वाली नदी अथवा सिन्ध के निवासी होने के कारण सिन्धु नदी आने पर बच्चों की सलामती के लिए विभिन्न व्यंजन भगवान झूलेलाल को भोग लगाकर गौमाता को खिलाते थे। साथ ही नदी, तालाब या दरिया में पनपने वाले जलीय जीवों के भोजन के लिए भी व्यंजन अर्पित करते थे। इसी परंपरा का निर्वहन करने के लिए सिन्धी समाज की महिलाओं द्वारा ज्येष्ठ अमावस्या पर प्रातः जल्द स्नान कर घरों में विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर और भगवान झूलेलाल को भोग लगाकर पुत्रों एवं परिवार के सदस्यों की लम्बी आयु के लिए ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। सिन्धी समाज में हर साल ज्येष्ठ अमावस्या पर आज भी इसी परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है।
जेठ मास की अंतिम अमावस्या पर सिन्धी समाज में होता है खुम्भ या सेसा (प्रसाद)।
जेठ (ज्येष्ठ) की सेसा (प्रसाद) जेठ (ज्येष्ठ) मास की अमावस्या के दिन प्राचीन काल से मनाई जाती है।
सिन्धी एक व्यापारी क़ौम है। ऐसा कहा जाता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व सिन्ध प्रांत के सिन्धी समाज के लोग व्यापार करने के लिए बेड़े (बड़ी नांव) पर चढ़कर नदी और समुद्र पार कर देश विदेश जाते थे। ऐसा माना जाता है कि जेठ और आषाढ़ मास में समुद्री तूफानों का सामना करना पड़ता था इसलिए परिवार के सदस्य जेठ मास की अमावस्या के दिन पूजा करते थे। जिसे सेसा (प्रसाद) या खुम्भ कहा जाता है। व्यापार के लिए गये परिवार के सदस्य के लिए एक मिठाई अर्पण करने की रीति थी।
आज़ भी जेठ मास की अमावस्या के दिन जलदेवता वरुणावतार दरियाशाह (नदी, तालाब अथवा जल के स्तोत्र) की पूजा की जाती है। सेसा (प्रसाद) बनाया जाता है जिसमें पुड़ी, तला हुआ आलू, उबला छोला, (चना), पीला चावल, सेवंई, हलवा, काजू , मैसू पाक, गुलाब जामुन,मौसमी फल जैसे कि आम आलूबुखारा या केला रखा जाता है। एवं परिवार के हर सदस्य के लिए एक तयशुदा मिठाई रखी जाती है, जैसे कि मैसू पाक, गुलाब जामुन, बर्फ़ी, हलवा इत्यादि।
दरिया पर सेसा (प्रसाद) और दुर्वा घास (दूबी) लेकर जाते है और परिवार के सदस्यों की सलामती के लिए पूजा की जाती है।
आमड़ो लीमड़ो खाई भरियुसि’ पेटुड़ो जिन रखाया जेठिड़ा तोखे सैंयूँ खारायां, जमूँ खारायां, तोशा खारायां, पेड़ा खारायां जीअन् मुहिंजा पुट्रिड़ा पोट्रिडा, भायडा जिनि रखायो जेटिडो जिनि रखायो’ जेठिड़ो मां भी खावां, तूँ भी खा मां भी खावां, तूँ भी खा….।
दोनों हाथों में सेसा (प्रसाद) और दुर्वा (दूबी) घास लेकर जल का छंड़ा (छिड़काव) लगाकर पहले बायें हाथ में लेकर फिर दाहिने हाथ में लेकर कुल तीन बार उक्त़ मंत्रोच्चारण किया जाता है।
परिवार के सदस्यों एवं पुत्रों की लंबी आयु के लिए ज्येष्ठ अमावस्या पर सिंधी समाज पूर्वजों के समय की अनूठी परंपरा का निर्वहन करता है। समाज की महिलाओं द्वारा विभिन्न व्यंजन बना ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। साथ ही, भगवान झूलेलाल और गायों को भोग लगा पुत्रों एवं परिवार के सदस्यों की दीर्घायु की कामना की जाती है।
सिंधी समाज ज्येष्ठ अमावस्या को अपने पुत्रों एवं परिवार के सदस्यों की लम्बी आयु की कामना के लिए उनकी पसंदीदा मिठाई, सैवईया, पुलाव, पूड़ी पकोड़ी, गुलाब जामुन ओर काले जामुन इत्यादि बनाता है। समाज की बुजुर्ग महिलाएं बाजार से विभिन्न व्यंजन खरीद कर अपने नजदीकी हैंड पम्प या घर के बाहर ही नल पर पूजा कर भोग लगाती हैं। इस दौरान की जाने वाली पूजा में अपने परिजनों और बच्चों की लम्बी उम्र की कामना की जाती है। इसके बाद भोजन गाय को खिलाया जाता है। यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और दान किया जाता है। यह पूजन जिनके पुत्र हैं, वे माताएं ही करती है। मान्यता है कि जेठ के माह में परिवार की बहुएं मायके नहीं जाती है। वंश वृद्धि के लिए ज्येष्ठ अमावस्या के दिन इस पूजन का काफी महत्व माना गया हैं।
संकलन एवं साभार प्रस्तुति:-
इन्दू गोधवानी, रायपुर..✍️ 9425514255