बिलासपुर :- मां भारती की आजादी की कीमत अदा करता अत्यंत उन्नत और समृद्ध सभ्यता वाला सिंधी समाज 1947 की एक काली रात को मातृ भूमि से बेदखल हो यत्र तत्र बिखर गया इस विषम परिस्थितियों में हुए बिखराव के बावजूद सिंधी समाज ने अपनी सभ्यता को बोली भाषा संस्कृति को संजोए रखा और व्रत तीज त्योहारों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को अवगत करने का क्रम बनाए रखा ताकि विकास और आधुनिकता की आई आंधी में युवा पीढ़ी अपनी मातृ भूमि सिंध और उसकी सभ्यता तथा पुरखों के किए संघर्ष से विमुख न हो जाए इसी तारतम्य में आज समाज की गृहणियों ने ज्येठ पर्व का पूजन किया ~ संतति विकास और संतान की लंबी आयु के लिए अमावस्या के दिन वर्षा ऋतु की फुहारों से जलमग्न हुए आस पास के पोखरों या तलाब अथवा नदी के तट पर हाथों में तृण के हरे भरे तिनके लिए प्रकृति की आराधना कर घर में बनाए हुए अनन्य प्रकार के व्यंजनों का भोग चढ़ा उसका एक हिस्सा जल में अर्पित कर दूसरा हिस्सा दान दे बाकी आपस में मिल बांट कर खाया जाता है इस पर्व को उत्साह पूर्वक मनाती गृहणियों रेशु जेठमलानी , राम्या लालवानी , नेहा आहुजा व अंशु पारवानी तथा पूजा जेठमलानी ने हर्षोल्लासित होते हुए बताया कि यह पर्व हम महिलाओं के परस्पर सामाजिक मेल जोल का पर्व है जिसमें आपस में विचारों का आदान प्रदान किया जाता है।