रायपुर:- जब धरती पर हरियाली हो तब समझिए, सिन्धी समाज में उत्सवों का मौसम आ चुका है। जब बारिश की बूंदें धरती की प्यास बुझाती हैं और खेतों में हरियाली फूटने लगती है। तब सिन्धी समाज में ट्रीजड़ी का पर्व जीवन की नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।
ट्रीजड़ी मतलब सिन्धी समाज का महापर्व एक ऐसा विशेष दिवस जिस दिन सुहागिन स्त्री एवं विवाह योग्य कन्याएं चंद्रमा जी के दर्शन करने तक निर्जल व्रत रखकर मां जगदम्बा की प्रकृति के रुप में पूजा अर्चना करती है। प्रकृति माता जैसे कि आप सभी लोगों को विदित होगा कि ट्रीजड़ी पोखते है अर्थात जवारे के रुप में बोया जाता है। मतलब हम प्रकृति की ही पूजा करते है।
आज के आधुनिकीकरण के दौर में जब तकनीकी विकास सामाजिक परंपराओं को लील रहा है, तब ट्रीजड़ी जैसे पर्व स्मरण कराते हैं कि सिन्धी समाज की असली पहचान उसकी संस्कृति और उसके रीति-रिवाजों में आज़ भी सुरक्षित है।
सिन्धु संस्कृति का पर्व ‘ट्रीजड़ी’ का शाब्दिक अर्थ है तीज़। ट्रीजड़ी एक पारंपरिक सिन्धी त्योहार है, यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति और परंपरा का मिलन बिंदु है। जिसमें अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु के लिए सिन्धी समाज की महिलाओं द्वारा उपवास रखा जाता है। यह त्योहार सिन्धी समाज में बहुत महत्वपूर्ण है और इसे बड़े उत्साह, श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
सिन्धी समुदाय का ट्रीजड़ी (तीजड़ी) पर्व भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। अमूमन यह त्योहार रक्षाबंधन के तीन दिन बाद मनाया जाता है। इस दिन सिन्धी समाज की महिलाएं पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं।
ट्रीजड़ी के दिन सिन्धी समाज की महिलाएं व्रत रखती हैं और ट्रीजड़ी माता की पूजा करती हैं। वे अपने पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए प्रार्थना करती हैं और भगवान से आशीर्वाद मांगती हैं।
दिनांक 12 अगस्त 2025 को सिन्धी समाज का ट्रीजड़ी (तीजड़ी) पर्व मनाया जायेगा दिनांक 11 अगस्त 2025 को परंपरा के अनुसार इस पर्व की पूर्व संध्या पर सिन्धी समाज की माताएं, बहनें एवं बेटियां हाथों में मेंहदी लगायेंगी और दिनांक 12 अगस्त को सूर्योदय के पूर्व प्रात: काल 4 बजे पौ फटने के पूर्व प्रभात काल के समय उठकर स्वल्पाहार करके असुर मनाकर व्रत प्रारम्भ करती है। सूर्योदय पश्च़ात महिलाओं द्वारा ट्रीजड़ी माता को झूला झूलाकर जल अर्पित किया जाता है एवं संध्याकाल में नये वस्त्र धारण कर ट्रीजड़ी माता की कथा सुनी जाती है। माता ट्रीजड़ी की कथा सुनकर अपने सुहाग की रक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है। रात्रि में चन्द्रमा जी के दर्शनों उपरांत अर्ग देकर व्रत पूरा किया जाता है। अपने सुहाग एवं परिवार की रक्षा के लिए मातृशक्त़ि की कलयुग में यह विशेष तपस्या है।
असुर जो थी उत्थां मा ट्रीजड़ी थी रखां
अर्थात पौ फटने के पूर्व प्रभात काल में मैं ऊठ रही हूं और ट्रीजड़ी का व्रत रख रही हूं।
यह सिन्धी समाज का एक महत्वपूर्ण लोकगीत है, जिसमें इस पर्व की महिमा का वर्णन हमें दिखलाई देता है।
सिन्धी समाज की महिलाएं अपने धार्मिक पर्व परंपरा के अनुसार पति की दीर्घायु के लिए ट्रीजड़ी (तीजड़ी) पर्व में व्रत रखती है। अविवाहित युवतियां भी अच्छा वर मिलने की कामना के साथ उपवास रखती है।
यह पर्व करवा चौथ की तरह ही मनाया जाता है। सिन्धी समाज की महिलाएं सूर्योदय के पूर्व प्रात: काल तड़़के चार बजे उठकर स्वल्पाहार करती है और इस प्रकार से व्रत की शुरुआत की जाती है।
ट्रीजड़ी (तीजड़ी) पर्व भाद्र माह के कृष्णपक्ष की तृतीया को मनाया जाता है।
सिन्धी समाज की महिलाएं इस उपवास को रखकर और चंद्रमा को देखकर व्रत का परायण करती है। व्रत रखने वाली महिलाएं रात को हाथों में मेंहदी लगाती है। सूर्योदय से पूर्व प्रात: काल भोर सुबह में चार बजे उठकर महिलाएं इस व्रत का आरंभ करती है और इसके बाद रात में चांद देखकर अर्ध्य (अर्ग) देकर व्रत पूरा करती है।
दोपहर के वेले में कुल ब्राम्हण के यहां मंदिर में अथवा सिन्धी धर्मशाला में ट्रीजड़ी (तीजड़ी) माता (सप्त अनाज की अंकुरित भोजली) को झूला झूलाया जाता है और झूला झूलाने की रस्म अदा की जाती है। शाम को मंदिर अथवा सिन्धी धर्मशाला में ही ट्रीजड़ी (तीजड़ी) माता की कथा सुनकर दीपक प्रज्जवलित किया जाता है। कथा सुनने के बाद चंद्रमा जी को अर्ध्य (अर्ग) देना आवश्यक है। अगर मानसून की बारिश अथवा खराब मौसम की वजह से यदि चंद्रमा जी बादलों में छुपे रहते है और यदि चंद्रमा नही निकलता है तो पत्नि, पति परमेश्व़र की पूजा के बावजूद भी व्रत नही खोलती है।
ट्रीजड़ी माता की कथा
लखमीचंद नाम का एक दानी एवं धर्मात्मा सेठ था। जिसे दो पुत्र एवं एक कन्या थी उसने अपनी कन्या का विवाह दूर देश में करवाया था। उसके दोनों सुपुत्र अभी छोटे थे। सेठ लखमीचंद को यज्ञ करवाने का विचार आया इसके लिए उसने ब्राम्हणों से शुभ मुहूर्त निकलवा कर अपने दोनों सुपुत्रों को अपनी कन्या को लाने के लिए भेजा। दोनों भाई अपनी बहन के घर रक्षाबंधन के दिन पहुंचे भाई-बहन आपस में मिलकर बहुत खुश हुए एवं एक-दूसरे का हाल-चाल जाना इस प्रकार से दो दिनों पश्च़ात जब तीसरे दिन ट्रीजड़ी का व्रत आया भोजन करते वक्त़ भाईयों ने अपनी बहन को साथ भोजन करने के लिए कहा लेकिन उनकी बहन ने ट्रीजड़ी का व्रत रखा हुआ था। लेकिन बच्चों को क्या पता कि व्रत क्या होता है उनको पता लगा कि चंद्रमा जी का दर्शन करने के बाद ही बहन भोजन करेगी। उन्हें ऐसा विचार आया कि हो सकता है कि बादलों के कारण चंद्रमा जी का दर्शन ना हो सके और हमारी बहन भूखी ही ना रह जाए, इसलिए उन्होंने एक तरकीब लगाई जैसे उनकी बहन भी उनके साथ भोजन करे। उन्होंने इस तरह से एक थाली जो आग के सहारे दूर से चंद्रमा जी जैसे नजर आ रही थी। और भाईयों ने बहन से कहा कि बहन देखो यह चंद्रमा है। बहन रुपवंती ने आग की थाली को चंद्रमा समझकर अर्ग देकर व्रत खोला और भोजन किया।
लेकिन व्रत टूट गया था और व्रत के टूटने के कारण रुपवंती का पति सूखकर कांटा हो गया। रुपवंती अपने पति को घुटनों पर सुलाकर पूरे साल भर अपने पति की सेवा करती रही। अगले वर्ष जब पुनः सावन का महीना आया तब तीज की तिथि पर ट्रीजड़ी का व्रत रखकर रात्रि में चन्द्रमा जी को कच्चे दूध में शक्कर डालकर अर्ग दिया। तथा बचे हुए दूध को पति के मुख पर रखकर प्रसाद रुप में दुग्धपान कराया। तो उनका पति जल्द ही स्वस्थ हो गया। ऐसी मान्यता है कि जो भी व्यक्त़ि सच्चे हृदय से ट्रीजड़ी का व्रत रखकर यह कथा प्रेम से पढ़ेगा, सुनेगा अथवा दूसरों को बतायेगा तो उनके सभी मनोरथ सिद्ध होंगे।
ट्रीजड़ी पर्व आस्था, विश्व़ास, परंपरा और समाजशास्त्र का एक अदभुत संगम है। सिन्धी समाज की सांस्कृतिक पहचान ट्रीजड़ी पर्व सिन्धु गौरव की आत्मा है।
करवा चौथ की तरह ही सिन्धी समाज में ट्रीजड़ी (तीजड़ी) व्रत रखा जाता है। पति की लंबी आयु की कामना के लिए महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं। जिन युवतियों की शादी तय हो जाती है वह भी इस व्रत को रखती है। अविवाहित युवतियां भी अच्छा वर मिलने की कामना के साथ निर्जला उपवास रखती है। शाम को मंदिर अथवा सिन्धी धर्मशाला में समाज की महिलाएँ एकत्रित होती है जहां कुल ब्राम्हण द्वारा ट्रीजड़ी (तीजड़ी) व्रत की कथा सुनाकर पर्व के महत्व को समझाया जाता है। पति की दीर्घायु एवं उत्तम स्वास्थ्य की कामना के लिए रखे व्रत को पूरा करने महिलाएं श्रृंगार कर चंद्रमा जी को अर्द्ध (अर्ग) देने के बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रत परायण करती है।
सिन्धी समाज की संस्कृति में प्रकृति, परंपरा और पूजा का जो त्रिवेणी संगम है वह इस पर्व में मुखरित होता है।
सिन्धी समाज की समस्त माताओं बहनों को उनके इस कठोर व्रत पर कोटि-कोटि वंदन..अभिनंदन.!
संकलन एवँ साभार प्रस्तुति:-
इन्दू गोधवानी, रायपुर..✍️ 9425514255