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पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ हैं, लेकिन आज यह स्तंभ खुद ही दरारों से भरा हुआ है।
👉 कलम चलाने वाले जब खुद बंट जाएँ, तो सच्चाई की आवाज़ कौन उठाएगा?
👉 जब हर पत्रकार अपनी पहचान, TRP और ‘एक्सक्लूसिव’ की होड़ में फँसा हो, तो समाज की सामूहिक सच्चाई कहाँ बचेगी?
भारत में पत्रकार संगठनों की कमी नहीं है, कमी है एकजुटता की।
हर संगठन अपने-अपने झंडे तले लड़ रहा है — कोई व्यक्तिगत प्रचार का मंच बन चुका है, तो कोई पद और अहंकार की राजनीति में डूबा है।
नतीजा यह कि पत्रकारिता का असली मक़सद पीछे छूट गया है।
कुछ पत्रकार सरकारी लाभ और विज्ञापन की लालच में बंट जाते हैं।
कुछ कॉर्पोरेट मालिकों के हितों के बंधक बन जाते हैं।
कई पत्रकार डरते हैं — नौकरी जाने से, संपादक के दबाव से, प्रशासन के दमन से।
और गाँव-कस्बों के पत्रकार?
उनके पास न सुरक्षा है, न बीमा, न न्याय।
📌 भाषा, विचारधारा और क्षेत्रीयता ने पत्रकारिता को खाँचों में बाँट दिया है।
कोई वामपंथी है, कोई दक्षिणपंथी।
कोई हिंदी वाला है, कोई अंग्रेज़ी वाला।
पर सच्चाई का दुश्मन इन खाँचों को नहीं देखता, वह बस आज़ाद कलम को कुचलना जानता है।
यही कारण है कि जब एक पत्रकार पर हमला होता है, तो बाकी चुप रहते हैं।
और यह चुप्पी सत्ता को और बेरहम बना देती है।
सच तो यह है
जब कलमें बिखरी हों, तो सच्चाई की आवाज़ खो जाती है।

लेकिन जब पत्रकार एकजुट हों, तो सत्ता भी जवाब देने को मजबूर होती है।
- आज सबसे बड़ी ज़रूरत है:
- पत्रकारों के लिए मज़बूत राष्ट्रीय कानून।
- सुरक्षा, बीमा और सामाजिक सुरक्षा।
- संगठनों में वास्तविक एकजुटता, न कि पद और प्रचार की राजनीति।
- और सबसे अहम — आपसी भरोसा और नैतिक एकता।
पत्रकार और समाज दोनों को यह समझना होगा कि पत्रकार पर हमला केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला है।
✍️ अगर पत्रकार एकजुट हुए, तो सच बचेगा। और सच बचेगा, तो लोकतंत्र बचेगा।