वर्तमान परिदृश्य में,जब वैश्विक स्तरपर अनिश्चितता का वातावरण है, भारतीय बाज़ार में अपेक्षा से अधिक उतार चढ़ाव देखा जा रहा है।
आज के दौर में पूंजी बाजार संभावतःकेवल मौलिक आर्थिक संकेतकों,जीडीपी वृद्धि, मुद्रास्फीति या ब्याज दर से संचालित नहीं होते, बल्कि वे सूचना-आधारित अपेक्षाओं पर अधिक निर्भर हैं -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक वित्तीय परिवेश में आज सूचना,अनुमान और तकनीकी घोषणाएँ कितनी तीव्रता से पूंजी बाजारों को प्रभावित करती हैं।इसका सटीक उदाहरण 24 फरवरी 2026 को भारतीय शेयर बाजार में दर्ज की गई गिरावट से देखने को मिला। संभवतः एक बार फिर यह साबित हों गया, दोपहर के सत्र में जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता कंपनी एथ्रोंपिक ने अपने एआई मॉडल क्लाउडे कोट के लिए एक नया टूल प्रस्तुत करने की घोषणा की, जिसका उद्देश्य आधुनिक प्रणालियों में रूपांतरित करना बताया गया,पुराने कोबोल कोड को मॉडर्न बनाने में मदद करेगा।इससे माना जा रहा है कि सॉफ्टवेयर सर्विसेज की मांग कम हो सकती है।तो कुछ ही घंटों में भारतीय आईटी शेयरों में भारी बिकवाली देखने को मिली।दिन के दौरान निफ्टी आईटी सूचकांक लगभग 4.74 प्रतिशत तक गिर गया और प्रमुख सूचकांक बीएसई सेंसेक्स 1,068 अंकों से अधिक टूटकर 82,225.92 पर तथा निफ़्टी 50 288 अंकों सेअधिक गिरकर 25,424.65 पर बंद हुआ।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि, अब प्रश्न यह उठता है कि क्या केवल एक तकनीकी घोषणा इतनी बड़ी गिरावट का कारण बन सकती है,या यह गिरावट पहले से मौजूद आशंकाओं की परिणति थी?वैश्विक वित्तीय बाजारों की संरचना को समझे बिना इस घटना का विश्लेषण अधूरा रहेगा। आज के दौर में पूंजी बाजार केवल मौलिक आर्थिक संकेतकों जैसे जीडीपी वृद्धि, मुद्रास्फीति या ब्याज दर से संचालित नहीं होते, बल्कि वे सूचना-आधारित अपेक्षाओं पर अधिक निर्भर हैं।व्यवहारिक अर्थशास्त्र बताता है कि निवेशकों का निर्णय तर्कसंगत गणनाओं के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक संकेतों से भी प्रभावित होता है।जब कोई अग्रणी तकनीकी कंपनी यह संकेत देती है कि वह ऐसे उपकरण विकसित कर रही है जो पारंपरिक सॉफ्टवेयर सेवाओं की आवश्यकता को कम कर सकते हैं, तो निवेशक तुरंत यह अनुमान लगाने लगते हैं कि आईटी सेवा कंपनियों के राजस्व मॉडल पर इसका दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। परिणामस्वरूप, जोखिम से बचने की प्रवृत्ति सक्रिय हो जाती है।

साथियों बात अगर हम भारतीय आईटी उद्योग पिछले तीन दशकों में वैश्विक आउटसोर्सिंग मॉडल का प्रमुख स्तंभ रहा है इसको समझने की करें तो, बैंकिंग, बीमा, दूरसंचार और सरकारी प्रणालियों में दशकों से उपयोग हो रहे कोबोल जैसे पुराने प्रोग्रामिंग ढाँचों के रखरखाव और आधुनिकीकरण से भारतीय कंपनियों को निरंतर आय प्राप्त होती रही है।यदि एआई आधारित उपकरण स्वचालित रूप से इन कोडों को आधुनिक भाषाओं में रूपांतरित कर दें, तो निवेशकों को यह भय हो सकता है कि परंपरागत मैनपावर- आधारित सेवाओं की मांग घटेगी। हालांकि यह केवल एक संभावित परिदृश्य है, लेकिन बाजार तत्काल संभावनाओं को कीमतों में समाहित कर लेता है। यही कारण है कि एआई संबंधी घोषणाएँ अक्सर तकनीकी शेयरों में असामान्य उतार-चढ़ाव उत्पन्न करती हैं।यह भी ध्यान देने योग्य है कि वैश्विक स्तर पर एआई कंपनियों के उदय ने निवेश परिदृश्य को पुनर्परिभाषित कर दिया है। ओपन एआई ,गूगल , माइक्रोसॉफ्ट और नवीडिया जैसी कंपनियों ने पिछले वर्षों में एआई आधारित उत्पादों और चिप्स के माध्यम से बाजार पूंजीकरण में भारी वृद्धि दर्ज की है। निवेशकों की दृष्टि में एआई अब केवल एक तकनीकी प्रवृत्ति नहीं, बल्कि औद्योगिक क्रांति 4.0 का प्रमुख इंजन है। ऐसे वातावरण में जब कोई नई एआई क्षमता प्रस्तुत होती है, तो बाजार उसे पारंपरिक उद्योगों के लिए संभावित विघटन के रूप में देखता है।24 फरवरी की गिरावट को केवल एक कंपनी के बयान से जोड़ना सरलीकरण होगा। उस समय वैश्विक स्तर पर पहले से ही कई अनिश्चितताएँ मौजूद थीं, अमेरिका में संभावित ब्याज दर नीतियों को लेकर असमंजस, यूरोप में विकास दर की मंदी, और एशियाई बाजारों में निर्यात मांग को लेकर चिंताएँ। जब बाजार पहले से ही अस्थिर मनोदशा में हो, तब कोई भी नकारात्मक संकेत बिकवाली को तेज कर सकता है। इसे ट्रिगर इवेंट कहा जाता है,जहाँ मूल कारण गहरे होते हैं, लेकिन एक छोटा समाचार तत्काल प्रतिक्रिया को सटीक रूप से जन्म देता है।

साथियों बात अगर हम व्यवहारिक वित्त के सिद्धांत हर्ड बिहेवियर इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है इसको समझने की करें तो, जब कुछ बड़े संस्थागत निवेशक किसी क्षेत्र में बिकवाली शुरू करते हैं,तो एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग सिस्टम और खुदरा निवेशक भी उसी दिशा में कदम बढ़ाते हैं। परिणामस्वरूप, गिरावट अपनी गति स्वयं निर्मित करती है।आईटी क्षेत्र में 4.74 प्रतिशत की गिरावट यह संकेत देती है कि बाजार ने इसे केवल अल्पकालिक समाचार नहीं, बल्कि संभावित संरचनात्मक परिवर्तन के संकेत के रूप में देखा।हालांकि, तकनीकी दृष्टि से यह भी विचारणीय है कि एआई उपकरण पारंपरिक सॉफ्टवेयर सेवाओं का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकते।कोड आधुनिकीकरण केवल एक चरण है;उसके बाद परीक्षण, एकीकरण, साइबर सुरक्षा और रखरखाव जैसी सेवाएँ आवश्यक रहेंगी। भारतीय आईटी कंपनियाँ पहले ही एआई को अपनी सेवाओं में समाहित करने की दिशा में अग्रसर हैं। इसलिए दीर्घकाल में यह परिवर्तन उनके लिए अवसर भी सिद्ध हो सकता है। इतिहास बताता है कि तकनीकी क्रांतियाँ रोजगार और सेवाओं को समाप्त करने के साथ-साथ नए क्षेत्रों का सृजन भी करती हैं।
साथियों बात अगर हम दीर्घकालिक निवेशकों के लिए ऐसे उतार-चढ़ाव अवसर भी प्रदान करते हैं, इसको समझने की करें तो,जब किसी क्षेत्र में भय के कारण मूल्य गिरते हैं, तो मजबूत बुनियादी कंपनियों में निवेश का अवसर उत्पन्न होता है। किंतु अल्पकालिक ट्रेडिंग करने वाले निवेशकों के लिए यह जोखिमपूर्ण समय होता है। इसलिए पोर्टफोलियो विविधीकरण और जोखिम प्रबंधन की रणनीतियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
साथियों बात अगर हम इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से समझने की करें तो 2000 के डॉट-कॉम बुलबुले के समय भी तकनीकी घोषणाओं ने बाजार में तीव्र उतार-चढ़ाव उत्पन्न किए थे। उस समय इंटरनेट कंपनियों के मूल्यांकन में अत्यधिक आशावाद देखा गया, जो बाद में यथार्थ से टकराकर ध्वस्त हुआ। वर्तमान एआई उछाल की तुलना भी कई विश्लेषक उसी दौर से करते हैं, हालांकि इस बार तकनीकी आधार कहीं अधिक ठोस है। फिर भी, मूल्यांकन और वास्तविक आय के बीच संतुलन महत्वपूर्ण है।भारतीय बाजार की संरचना में आईटी क्षेत्र का भार उल्लेखनीय है। जब आईटीसूचकांक गिरता है,तो समग्र सूचकांकों पर उसका प्रभाव स्वाभाविक है।1,068 अंकों की गिरावट केवल संख्यात्मक घटना नहीं, बल्कि निवेशकों की मनोदशा का प्रतिबिंब है। यह दर्शाता है कि तकनीकी क्षेत्र के प्रति संवेदनशीलता कितनी अधिक है। यदि एआई उपकरणों को लेकर आशंका बढ़ती है, तो विदेशी संस्थागत निवेशक भी अपने पोर्टफोलियो मेंसमायोजन कर सकते हैं, जिससे पूंजी प्रवाह प्रभावित होता है।यह भी समझना आवश्यक है कि बाजार समाचार पर नहीं, बल्कि समाचार की व्याख्या पर प्रतिक्रिया करता है। एथ्रोंपिक का कथन वस्तुतः एक तकनीकी उन्नयन की घोषणा थी, किंतु उसकी व्याख्या इस रूप में की गई कि इससे सॉफ्टवेयर सेवाओं की मांग घट सकती है। यही व्याख्या बिकवाली का आधार बनी। यदि वही घोषणा इस रूप में प्रस्तुत होती कि यह पारंपरिक आईटी कंपनियों के लिए नए अवसर सृजित करेगी, तो प्रतिक्रिया भिन्न हो सकती थी।
साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के दृष्टिकोण से देखकर समझने की करें तो वे राजनीतिक स्थिरता और नीति निरंतरता को महत्व देते हैं।जबव्यापार समझौते टूटते हैं या नए प्रतिबंध लगाए जाते हैं,तो जोखिम प्रीमियम बढ़ जाता है। इसका अर्थ है कि निवेशक अधिक प्रतिफल की मांग करते हैं या पूंजी सुरक्षित स्थानों पर ले जाते हैं।उभरते बाजारों में यह प्रभाव अधिक स्पष्ट दिखाई देता है क्योंकि वहाँ की अर्थव्यवस्थाएँ पूंजी प्रवाह पर निर्भर होती हैं। हालांकि यह भी सत्य है कि बाजार केवल नकारात्मक कारकों से संचालित नहीं होते। कई बार टैरिफ की घोषणा के बाद भी यदिकंपनियाँ अपेक्षा से बेहतर लाभ प्रस्तुत करती हैं, तो बाजार में तेजी आ सकती है। निवेशकों का ध्यान दीर्घकालिक विकास क्षमता पर भी रहता है। इसलिए हर उतार-चढ़ाव का कारण केवल ट्रंप या टैरिफ नहीं होता, बल्कि व्यापक आर्थिक संकेतक, तकनीकी नवाचार और उपभोक्ता मांग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।तकनीकी क्षेत्र में अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा ने भी बाजारों को प्रभावित किया है।सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और 5जी तकनीक में प्रतिस्पर्धा के कारण निर्यात प्रतिबंध लगाए गए। इससे संबंधित कंपनियों के शेयरों में अस्थिरता बढ़ी। निवेशकों को यह समझने में समय लगा कि कौन-सी कंपनियाँ नए नियमों के अनुकूल स्वयं को ढाल पाएंगी।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि 24 फरवरी 2026 की घटना यह स्पष्ट करती है कि आज के वैश्विकीकृत वित्तीय तंत्र में तकनीकी घोषणाएँ केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे समूचे पूंजी बाजार को प्रभावित कर सकती हैं। एआई की प्रगति निस्संदेह पारंपरिक उद्योगों के लिए चुनौती है, किंतु यह अवसरों का द्वार भी खोलती है। बाजार की तात्कालिक प्रतिक्रिया को दीर्घकालिक वास्तविकता मान लेना उचित नहीं होगा। इतिहास साक्षी है कि तकनीकी परिवर्तन प्रारंभ में अस्थिरता लाते हैं, परंतु अंततः वे आर्थिक संरचना को अधिक उत्पादक और दक्ष बनाते हैं। इसलिए आवश्यक है कि निवेशक भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के बजाय तथ्यों, दीर्घकालिक रुझानों और कंपनी की मूलभूत क्षमताओं के आधार पर निर्णय लें। यही संतुलित दृष्टिकोण वैश्विक वित्तीय अस्थिरताओं के बीच स्थिरता प्रदान कर सकता है।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425