मध्य पूर्व में विस्फोटक मोड़- ईरान पर अमेरिका- इजरायल के संयुक्त हमले,खामेनेई की मृत्यु और वैश्विक भू-राजनीति का नया संकट
पश्चिम एशिया में शक्ति-संतुलन अत्यंत नाजुक है,एक उच्च- प्रोफ़ाइल लक्षित कार्रवाई पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकती है, आने वाले सप्ताह निर्णायक होंगे -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर रविवार 1 मार्च 2026 को मध्य- पूर्व और विश्व राजनीति में जिस खबर ने भू-राजनीतिक हलचल मचा दी, वह थी अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर संयुक्त हवाई हमले, जिन्हें ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ (शेर की दहाड़) नाम दिया गया,उसने वैश्विक शक्ति संतुलन को झकझोर दिया। इन हमलों में ईरान के सैन्य अड्डों और रणनीतिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु की खबर ने पूरे विश्व को स्तब्ध कर दिया। यह परिदृश्य तथ्यात्मक रूप से स्थापित हों गया है,यह केवल एक सैन्य घटना नहीं बल्कि एक युगांतकारी राजनीतिक परिवर्तन होगा।इतिहास कभी-कभी ऐसे मोड़ों पर आकर ठहर जाता है जहाँ घटनाएँ केवल क्षेत्रीय नहीं रहतीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता की दिशा बदलने की क्षमता रखती हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि आधिकारिक पुष्टि, प्रतिपुष्टि और दावों- प्रतिदावों के बीच यह घटना केवल एक व्यक्ति के निधन का प्रश्न नहीं है;यह पश्चिम एशिया की शक्ति-संतुलन संरचना, इस्लामी जगत की राजनीति,ऊर्जा बाज़ार, समुद्री व्यापार मार्गों,परमाणु प्रसार और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव डालने वाली संभावित भू-राजनीतिक भूकंप रेखा है। ईरान के सर्वोच्च नेता की भूमिका केवल धार्मिक या प्रतीकात्मक नहीं,बल्कि राज्य की सामरिक- राजनीतिक दिशा, क्षेत्रीय नेटवर्क और सुरक्षा सिद्धांत के केंद्र में रही है। इसलिए इस घटना के प्रभावों का आकलन बहु-स्तरीय दृष्टिकोण से करना आवश्यक है।सबसे पहले, पश्चिम एशिया के सामरिक परिदृश्य को समझना होगा। इज़रायल और संयुक्त राज्य अमेरिका लंबे समय से ईरान की क्षेत्रीय नीति,विशेषकर लेबनान, सीरिया, इराक और यमन में उसके प्रभाव को अपनी सुरक्षा के लिए चुनौती मानते रहे हैं। यदि कथित ऑपरेशन वास्तव में हुआ और उसके परिणामस्वरूप ईरान के सर्वोच्च नेता की मृत्यु हुई,तो यह केवल टारगेटेड स्ट्राइक नहीं बल्कि प्रतिरोध-धुरी के वैचारिक और संगठनात्मक केंद्र पर सीधा प्रहार माना जाएगा। इसका तत्काल प्रभाव ईरान के भीतर राजनीतिक स्थिरता और सत्ता-हस्तांतरण प्रक्रिया पर पड़ेगा। ईरान की संवैधानिक व्यवस्था के तहत विशेषज्ञों की परिषद नए सर्वोच्च नेता का चयन करती है, परंतु संक्रमण काल में अस्थिरता शक्ति-संघर्ष और सुरक्षा बलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है।

साथियों बात अगर हम अरब देशों और खाड़ी क्षेत्र की प्रतिक्रिया को समझने की करें तो स्वाभाविक रूप से सतर्क और संतुलित रही है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और क़तर जैसे देश पिछले कुछ वर्षों में ईरान के साथ संवाद और तनाव-प्रबंधन की दिशा में कदम बढ़ा रहे थे। वे प्रत्यक्ष युद्ध या व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष से बचना चाहते हैं क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था ऊर्जा निर्यात, वैश्विक निवेश और स्थिरता पर निर्भर है। यदि ईरान में सत्ता- संतुलन अस्थिर होता है या प्रतिशोधी हमलों की श्रृंखला शुरू होती है,तो खाड़ी के तेल-गैस प्रतिष्ठान, समुद्री मार्ग और ड्रोन/मिसाइल हमलों के खतरे में आ सकते हैं। 2019 में सऊदी तेल प्रतिष्ठानों पर हमलों की स्मृति अभी ताज़ा है; इसलिए खाड़ी देश खुली प्रतिक्रिया देने के बजाय बैक-चैनल कूटनीति को प्राथमिकता देंगे।इस्लामी जगत की व्यापक प्रतिक्रिया भी बहुस्तरीय होगी। इस्लामी सहयोग संगठन के सदस्य देशों के बीच ईरान को लेकर मतभेद हैं,कुछ देश उसे शिया नेतृत्व के रूप में देखते हैं,कुछ क्षेत्रीय शक्ति- प्रतिस्पर्धी के रूप में। फिर भी किसी संप्रभु देश के सर्वोच्च नेता की लक्षित हत्या का आरोप अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के प्रश्न उठाता है। ओआईसी के मंच पर कड़ी शब्दावली के प्रस्ताव आ सकते हैं,परंतु सामूहिक सैन्यप्रतिक्रिया की संभावना कम है। अधिक संभावना यह है कि सदस्य देश शांति-आह्वान, संयम और संयुक्त राष्ट्र में बहस की दिशा में आगे बढ़ें।
साथियों बात अगर हम भारत के लिए इस स्थिति को समझने की करें तो,यह संकट केवलआर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक और मानवीय आयाम भी रखता है। खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं।संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ओमान और सऊदी अरब में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं।यही कारण है कि भारत सरकार ने अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी कर सतर्कता बरतने और अनावश्यक यात्रा से बचने की सलाह दी है। यह कदम बताता है कि स्थिति केवल सैन्य नहीं बल्कि नागरिक सुरक्षा का भी प्रश्न बन चुकी है। यदि संघर्ष बढ़ता है, तो भारत को ऑपरेशन राहत जैसे निकासी अभियानों क़ी पुनरावृत्ति करनी पड़ सकती है।

तो वहीं शिक्षा क्षेत्र पर भी इस संकट का प्रभाव दिखाई दे रहा है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) द्वारा मध्य पूर्व के कई देशों में 10वीं और 12वीं की परीक्षाएँ स्थगित करने का निर्णय इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय अस्थिरता अब नागरिक जीवन के मूल ढांचे को प्रभावित कर रही है। यूएई, कतर और ओमान में हजारों भारतीय छात्र सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों में पढ़ते हैं। परीक्षा स्थगन केवल शैक्षणिक निर्णय नहीं, बल्कि सुरक्षा प्राथमिकता का संकेत है। यह बताता है कि संघर्ष का प्रभाव सीमाओं से परेसामाजिक ताने-बाने तक पहुँच चुका है। यह ऊर्जा-आयातक भी हैं और पश्चिम एशिया में बड़े प्रवासी समुदाय रखते हैं, संतुलित कूटनीति आवश्यक होगी। भारत पारंपरिक रूप से सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने की नीति अपनाता रहा है। तेल- आपूर्ति, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा प्राथमिकता होगी। एशियाई शक्तियाँ व्यापक युद्ध से बचाव चाहेंगी क्योंकि उनकी आर्थिक वृद्धि वैश्विक स्थिरता पर निर्भर है।
साथियों बात अगर हम वैश्विक स्तरपर प्रश्न उठने को समझने की करें तो क्या यह घटना राज्य-प्रायोजित लक्षित हत्या की नई मिसाल बनेगी? यदि यह सिद्ध होता है कि अमेरिका- इज़रायल ने संयुक्त अभियान में ऐसा किया, तो अंतरराष्ट्रीय मानदंडों, संयुक्त राष्ट्र चार्टर और क्षेत्रीय स्थिरता के सिद्धांतों पर व्यापक बहस होगी। यूरोपीय शक्तियाँ जैसे फ्रांस,जर्मनी और यूनाइटेड किंगडम संयम और कूटनीतिक समाधान पर ज़ोर देंगी। रूस और चीन इस घटना को अमेरिकी-पश्चिमी हस्तक्षेप वाद के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं और ईरान के साथ सामरिक-आर्थिक सहयोग बढ़ाने का अवसर देख सकते हैं। इससे वैश्विक शक्ति-ध्रुवीकरण और तेज हो सकता है।
साथियों बात अगर हम ऊर्जा बाज़ार पर प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण होगा इसको समझने की करें तो, ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जहाँ से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यदि प्रतिशोध में ईरान या उससे संबद्ध समूह इस समुद्री मार्ग को बाधित करने की कोशिश करते हैं, तो तेल की कीमतों में तीव्र उछाल संभव है। इससे वैश्विक मुद्रास्फीति, विकास दर और आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होगी। भारत, चीन, यूरोप और अन्य आयातक देश ऊर्जा-सुरक्षा की वैकल्पिक रणनीतियाँ सक्रिय करेंगे। समुद्री बीमा प्रीमियम बढ़ सकते हैं, नौसैनिक तैनाती बढ़ सकती है और व्यापारिक जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है।सुरक्षा दृष्टि से सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या संघर्ष सीमित रहेगा या व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है। ईरान के पास पारंपरिक सैन्य क्षमताओं के साथ-साथ ड्रोन, मिसाइल और क्षेत्रीय सहयोगी नेटवर्क हैं। लेबनान में, सीरिया में, इराक में और यमन में सक्रिय समूह संभावित प्रतिशोधी कार्रवाई कर सकते हैं। इज़रायल पहले से ही बहु- मोर्चीय सुरक्षा चुनौतियों का सामना करता रहा है; ऐसे में उत्तरी, दक्षिणी और साइबर मोर्चों पर तनाव बढ़ सकता है। अमेरिका की क्षेत्रीय सैन्य उपस्थिति विशेषकर खाड़ी में नौसैनिक ठिकाने,उच्च सतर्कता पर रहेंगे। यदि प्रत्यक्ष अमेरिकी- ईरानी मुठभेड़ होती है, तो यह 2020 में जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद के संकट से कहीं अधिक व्यापक हो सकती है।
साथियों बात अगर हम यह संघर्ष कब तक चलेगा?इसको समझने की करें तो इस प्रश्न का उत्तर कई कारकों पर निर्भर है। पहला,ईरान के भीतर सत्ता- हस्तांतरण कितना सुचारु होता है। यदि नया नेतृत्व त्वरित और संगठित रूप से उभरता है, तो वह रणनीतिक धैर्य दिखाते हुए सीमित प्रतिशोध याप्रतीकात्मक प्रतिक्रिया के बाद कूटनीतिक मार्ग चुन सकता है।दूसरा, अमेरिका- इज़रायल की रणनीति क्या है?,क्या यह एकबारगी ऑपरेशन था या व्यापक अभियान का हिस्सा? तीसरा, मध्यस्थता की संभावनाएँ, क्या क्षेत्रीय शक्तियाँ या संयुक्त राष्ट्र सक्रिय भूमिका निभाते हैं? चौथा, घरेलू राजनीति—अमेरिका, इज़रायल और ईरान में जनमत और चुनावी गणनाएँ निर्णयों को प्रभावित करेंगी?क्या यह और बढ़ेगा? जोखिम अवश्य है। यदि किसी भी पक्ष की प्रतिक्रिया में नागरिक हताहत बढ़ते हैं या पवित्र स्थलों/रणनीतिक प्रतिष्ठानों पर हमले होते हैं, तो जनभावनाएँ उग्र हो सकती हैं। सोशल मीडिया और सूचना-युद्ध भी तनाव को भड़का सकते हैं। साइबर हमले, वित्तीय प्रतिबंधों की तीव्रता, और प्रॉक्सी संघर्षों का विस्तार ये सभी ग्रे-ज़ोन युद्ध के तत्व हैं जो बिना औपचारिक युद्ध-घोषणा के लंबे समय तक चल सकते हैं। ऐसी स्थिति महीनों या वर्षों तक अस्थिरता बनाए रख सकती है, भले ही पूर्ण-स्तरीय युद्ध न हो।
साथियों बात अगर हम इस परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र और प्रमुख शक्तियों की भूमिका निर्णायक है इसको समझने की करें तो, सुरक्षा परिषद में आपात बैठकें, स्वतंत्र जांच की मांग, और युद्धविराम के प्रस्ताव सामने आ सकते हैं। परंतु वीटो- राजनीति के कारण ठोस कार्रवाई कठिन हो सकती है। क्षेत्रीय स्तर पर ओमान, क़तर या तुर्की जैसे देश मध्यस्थता की कोशिश कर सकते हैं। बैक- चैनल संवाद, कैदियों की अदला- बदली, और समुद्री सुरक्षा समझौते तनाव कम करने के सटीक उपकरण बन सकते हैं। वहीं वैचारिक और मनोवैज्ञानिक आयाम भी महत्वपूर्ण हैं। ईरान के भीतर यह घटना शहादत के आख्यान के रूप में प्रस्तुत की जा सकती है, जिससे राष्ट्रीय एकता और प्रतिरोध की भावना मजबूत हो। दूसरी ओर, यदि जनता आर्थिक दबावों और युद्ध-जोखिम से चिंतित है, तो वे स्थिरता और कूटनीति की मांग कर सकते हैं। इज़रायल और अमेरिका में भी सुरक्षा-आधारित तर्क और अंतरराष्ट्रीय कानून- आधारित आलोचना के बीच बहस तेज होगी। यह बहस वैश्विक स्तर पर लक्षित हत्याओं, ड्रोन-युद्ध और संप्रभुता के सिद्धांतों पर नए मानदंड तय कर सकती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि यह संकट हमें याद दिलाता है कि पश्चिम एशिया में शक्ति- संतुलन अत्यंत नाजुक है। एक उच्च-प्रोफ़ाइल लक्षित कार्रवाई पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकती है। आने वाले सप्ताह निर्णायक होंगे,क्या प्रतिक्रियाएँ सीमित और नियंत्रित रहेंगी, या प्रतिशोध-चक्र तेज होगा। यदि कूटनीति सक्रिय और समन्वित रही, तो यह संकट सीमित अवधि में नियंत्रित हो सकता है। यदि भावनाएँ और रणनीतिक गलत-आकलन हावी हुए, तो यह लंबा, बहु-स्तरीय और वैश्विक प्रभाव वाला संघर्ष बन सकता है।विश्व नेताओं की सतर्क प्रतिक्रियाएँ संकेत देती हैं कि सभी पक्ष जोखिमों से अवगत हैं। ऊर्जा-बाज़ार, समुद्री व्यापार, परमाणु प्रसार, और क्षेत्रीय प्रॉक्सी-नेटवर्क इन सबके कारण यह केवल क्षेत्रीय घटना नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा का प्रश्न है। इसलिए आने वाले दिनों में संयम, संवाद और बहुपक्षीय कूटनीति ही वह मार्ग है जो इस संभावित संकट को व्यापक युद्ध में बदलने से रोक सकता है। पश्चिम एशिया की स्थिरता केवल स्थानीय मुद्दा नहीं; यह वैश्विक शांति, आर्थिक संतुलन और अंतरराष्ट्रीय कानून की विश्वसनीयता की कसौटी भी है।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425