बिलासपुर :- पहले एक समय में लोग दिल से सेवा करते थे और सेवा ही परमोधर्मः की राह पर चलते थे की सेवा से बड़ा और कोई धर्म नहीं है।हमारे बड़े बुजुर्गों ने भी हमें यही सिखाया है पर धीरे-धीरे समय बदलता गया पैसा कम था किसी के पास नहीं भी था पर सेवा के लिए समय बहुत था, और सच्चे मन से नीस्वार्थ सेवा करते थे पर आज पैसा बहुत मिल रहा है पर सेवा के नाम पर दिखावा और ढोंग हो रहा है?
इतनी सारी संस्थाएं समितियां बन गई है मुश्किल से बहुत कम ऐसे समितियां संस्था हैं जो सच्चे मन से और सेवा भावना से कार्य करती हैं। बाकी का तो भगवान मालिक है।
हाल ही में चेटीचंद्र महोत्सव वैसे तो 20 तारीख को है पर अलग-अलग शहरों में कार्यक्रम अभी से शुरू हो गए हैं जिसमें छत्तीसगढ़ के रायपुर और बिलासपुर दो शहर ऐसे हैं जहां पर बड़े-बड़े आयोजन होते रहते हैं।इसी कड़ी में रायपुर में 14 और 15 मार्च को पूज्य सिंधी छत्तीसगढ़ पंचायत के द्वारा सिंधियत जो मेलों का आयोजन किया जा रहा है बहुत अच्छी बात है और अन्य पंचायत और संस्थाएं भी अपने-अपने स्तर पर कई सारे कार्यक्रम कर रही हैं पर जीसमे सबकी नजर है और चर्चा है वह इसी कार्यक्रम की है। जैसा कि हमें जानकारी मिली है पंचायत के द्वारा इस आयोजन के कार्यक्रम में कोई भी शुल्क नहीं रखा गया है बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ वासियों के लिए यह बिल्कुल निशुल्क रखा गया है ताकि हर शहर से सभी वर्ग के समाज के लोग आकर इस कार्यक्रम में शामिल हो सके एवं कार्यक्रम का आनंद ले सके।सहपरिवार पहुंचकर साथ में खाने की व्यवस्था है अन्य संस्थाएं भी जो कार्यक्रम आयोजित कर रही है वो भी निशुल्क है कोई शुल्क नहीं रखा गया है।समाज हित को सर्वोपरि रखा गया है।अब आते हैं हम बिलासपुर में यहां की सबसे पुरानी जिसे लगभग 50 साल हो रहे संस्था को भारतीय सिंधु सभा जो कि 👉 राष्ट्रीय संस्था है कहा जाता है जब इसका गठन हुआ तो छत्तीसगढ़ में बिलासपुर पहला शहर था भारतीय सिंधु सभा की पहली शाखा खुली,
वैसे भी भारतीय सिंधु सभा अपने सेवा कार्यों में हमेशा आगे रहि है और उसकी पहचान भी सेवा कार्यों से ही होती है और उसके गीत में भी लिखा है “समाज के लिए जिएंगे धर्म के लिए कार्य करेंगे देश के लिए कार्य करेंगे”?
पर कुछ समय से देखा जा रहा है अब उस संस्था पर भी काली छाया 🌚 पढ़ गई है और अब वह अपने राह से भटकती हुई नजर आ रही है?
विगत वर्ष उन्होंने सिंध के मेले का आयोजन किया था साइंस कॉलेज बिलासपुर में जिसमें लगभग जो सूत्रों से जानकारी मिल रही है 24 से 25 लख रुपए खर्च किया गया था और जिसका शुल्क एंट्री फीस ₹1000 रखा गया था,और खाने का पैसा अलग था जिसका बहुत विरोध हुआ था?
उससे पहले भी उन्होंने इसी तरह कुंनद पेलेस में आयोजन किया था और शुल्क रखा था।इस बार यह तीसरा या चौथा वर्ष है लगभग यह आयोजन बिलासपुर में हो रहा है
ओर बार भी 15 मार्च को है और स्थान है कुंदन पैलेस इस बार खर्च की सीमा 10 से 12 लाख रुपए रखी गई है अनुमानित,लेकिन पिछली बार इन्होंने कहा था दबी जुबान से कि हम अब शुल्क नहीं लेगे निशुल्क करेंगे?
जब समय आया तो फिर से वही इनको अपना बिजनेस धंधा याद आ गया और इस बार ₹600 रुपए शुल्क रखा गया है एंट्री फीस पास कि खाने पीने के लिए स्टाल अलग रहेंगे उसका चार्ज अलग लगेगा जबकि इसकी सहयोगी संस्थाएं हैं पूज्य सिंधी सेंट्रल पंचायत महिला विंग युवा विंग, झूलेलाल सेवा समिति सभी संस्थाएं हैं?
इन सब को फंड की कोई कमी नहीं है फिर भी यह न जाने क्यों इतना समझाने के बाद भी हर बार कमाने की सोच में धंधा करने की सोच में पास कि एंट्री फीस रख लेते हैं क्रिकेट में देखो धंधा करना है ? डांडिया में देखो धंधा करना है? सिंध के मेले में देखो धंधा करना है? जब धंधा ही करना है तो फिर यह संस्थाएं क्यों बनाई क्यों संस्थाओं का नाम खराब करने के लिए? सीधा-सीधा एक नई संस्था बना दो और उसका नाम चंदा और धंधा करने वाली संस्था रख दो। जब से मठाधीश की⚫काली 🌚छाया पड़ी है तानाशाह की तब से समाज का और संस्थाओं का हाल बद से बदतर होते जा रहा है?
क्योंकि इन संस्थानों में पंचायतो में बड़े-बड़े धन्ना सेठ
बैठे हैं तो उनकी सोच वही है “पैसा,” पैसा किधर से भी आए मगर पैसा आए इनकी यही सोच है। आयोजन का नाम समाज का लेते हैं और करते अपने लिए हैं क्योंकि इन्हें समाज के निर्म वर्ग मध्यम वर्ग से कोई मतलब नहीं है इनका। तानाशाह कहता भी है कि इतना बड़ा समाज का भवन है तो निम्न वर्ग के लोग क्यों शादी करेंगे यहां उनके लिए ये भवन थोड़ी बना है? यह तो धंधा करने के लिए बना है?” ये सब गंदा है पर धंधा है? ये”यह सोच कूट-कूट कर अब सबके दिमाग में भरी हुई है कि यह जो आयोजन होते हैं निम्न वर्ग के लिए नहीं होते हैं हमारे लिए होते हैं पर लोगों को मूर्ख बनाने के लिए दिखाने के लिए नाम समाज का लेते हैं पेट अपना भरते हैं जैब अपनी भरते हैं?
और लोगों को उल्लू बनाते हैं?
बिलासपुर से ज्यादा कार्यक्रम रायपुर में हो रहे हैं ज्यादा खर्चा रायपुर में हो रहा है फिर भी वहां पर कोई शुल्क नहीं लिया जा रहा है और यहां पर सेवा के नाम पर मेवा खाया जा रहा है?
समझाते हैं तो उनको बुरा लग जाता है कुछ बोलते हैं तो तकलीफ हो जाती है लिखते हैं तो दुश्मन बन जाते हैं इनका कहना है कि तुम गांधी जी के 🙈बंदर बन जाओ या हमारा पालतू जानवर🐵🐔🐶🐷 … बन जाओ या हमारी चापलूसी करो जी हजूरी करो और जो यह सब नहीं करता है उसे यह लोग बदनाम करने में बॉयकॉट करने में लग जाते हैं, पर सत्य हमेशा सत्य ही रहेगा वह कभी नहीं बदलेगा और हमेशा हम एक ही बात कहते हैं न्याय नीति धर्म से कार्य करो और चलो और यह कुर्सी सेवा के लिए मिली है मेवा के लिए नहीं मिली है बार-बार हम समझाने के बाद भी रत्ती भर भी इनको समझ में नहीं आता है कान में इनके जू भी नहीं रेंगती है आखिर किस मिट्टी के बने हैं यह लोग इतना कुछ देखने के बाद भी इनको समझ में नहीं आ रहा है बड़े शर्म कि बात है। मरने के बाद कुछ लेकर नहीं जाएंगे अच्छे कर्म और अच्छे कार्य ही आपके साथ जाएंगे और आपके मरने के बाद लोग भी आपको याद करेंगे। कहते हैं ना विनाश काले विपरीत बुद्धि जीसका विनाश सामने होता है उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है जो रावण नहीं समझ सका,कंस नहीं समझ सका, अमेरिका चीन के राष्ट्रपति नहीं समझे तो यै कहां से समझेंगे? अहंकार और कुर्सी की अभिलाषा के कारण यह अंधे बन चुके हैं पैसे का घमंड सिर चढ़कर बोल रहा है,?
कई धन्ना सेठ चले गए दुनिया छोड़कर आज उनको याद करने वाला कोई नहीं रहा अभी भी वक्त है सुधर जाओ समझ जाओ और सेवा कार्यों में लग जाओ इसमें ही आपका भला है और समाज का भी भला है
बाकी आपकी मर्जी हम तो चौकीदार हैं जगाते रहेंगे सच दिखाते रहेंगे सच की राह पर चलते रहेंगे समाज हित के लिए सोचते थे कार्य करते थे आगे भी करते रहेंगे न्याय नीति धर्म की राह पर चलते रहेंगे
भगवान से यही प्रार्थना है इनको सद्बुद्धि मिले और समाज में एकता बनी रहे प्रेम बना रहे
संपादकीय