“आयोलाल” “झूलेलाल”
भारत में सिन्धियों का कोई भी अपना भाषाई राज्य नही है। इसलिए सिन्धियों की न्यायोचित मांग को देखते हुए, 20 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार भारत सरकार ने सिन्धी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 10 अप्रैल 1967 को संविधान में मान्यता प्रदान की, साथ-साथ सिन्धी भाषा के लिए दोनों लिपियों अरबी-फारसी तथा देवनागरी लिपि को मंजूर किया। सिन्धी भाषा भारतीय संविधान की एक मात्र ऐसी भाषा है, जिसके उपयोग के लिए दो लिपियों को मान्यता प्रदान की गई है।
भारत में सिन्धी भाषा को देवनागरी और नस्तालिक (अरबी-फारसी लिपि) दोनों लिपियों में लिखा जाता है, जबकि पाकिस्तान में नस्तालिक लिपि (अरबी-फारसी लिपि) का प्रयोग किया जाता है।
सिन्धी अबाणी बोली
मिठणी अबाणी बोली
भारत के सिन्धी समुदाय के लिए 10 अप्रैल 1967 का दिन एक ऐतिहासिक दिन था जब इस दिन भारत के तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति महोदय जी ने सिन्धी भाषा को भारत के संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल किए जाने वाले संविधान संशोधन पर हस्ताक्षर किये थे। इसलिए इस दिन को सिन्धी समाज द्वारा सिन्धी भाषा दिवस के रुप में मनाया जाता है।
सन् 1947 में भारत के विभाजन के समय पंजाबियों को आधा पंजाब मिला, बंगालियों को आधा बंगाल मिला, लेकिन सिन्धियों को आधा सिन्ध तो छोड़िए एक टुकड़ा तक नसीब नही हुआ और पूरा का पूरा सिन्ध प्रांत सरहद के उस पार चला गया। अपनी मातृभूमि से बेदखल सिन्धियों को आजाद भारत में कोई भी ऐसा स्थान नही मिल सका जिसे वह अपना सिन्ध प्रांत कह सके। सिन्धी समाज को विभाजन में मिला तो केवल विस्थापन और शरणार्थी की पीड़ा।
26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ। जिसकी 8वीं अनुसूची में 14 भाषाओं को शामिल किया गया, लेकिन सिन्धी भाषा को इसमें शामिल नही किया गया था।
आजादी के लगभग 20 साल बाद 10 अप्रैल 1967 को 21वें संविधान संशोधन में संविधान की 8वीं अनुसूची में सिन्धी भाषा को 15वीं भाषा के रुप में शामिल किया गया।
7 अप्रैल 1967 को सिन्धी भाषा बिल लोकसभा में पारित होने के बाद 8 अप्रैल शनिवार एवं 9 अप्रैल रविवार अवकाश होने के कारण सभी शासकीय कार्यालय बंद थे। 10 अप्रैल 1967 को सिन्धी समाज के आराध्य देव भगवान झूलेलाल सांई जी का अवतरण दिवस सिन्धी समाज के सबसे बड़े पर्व चेट्रीचण्ड्र महोत्सव का दिन था ऐसे मौके पर जयरामदास दौलतराम जी के अथक प्रयासों से 10 अप्रैल 1967 को तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति महोदय जी ने बिल पर हस्ताक्षर किए और चेट्रीचण्ड्र महोत्सव के पावन अवसर पर सिन्धी समुदाय को यह तोहफा मिल सका।
“सभनिन सिन्धियूंन जी आशा”
“पहिंजी सिन्धी भाषा “

10 अप्रैल सिन्धी समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है और इसे सिन्धी समाज सिन्धी भाषा दिवस के रुप में मनाता है। इसे सिन्धियत दिवस भी कहते है। इस दिन सिन्धी भाषा और संस्कृति से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
सिन्धी आहियूं सिन्धी गाल्हाईयूं
सिन्धी बोलीय जी शान वधाईयूं
सिन्धी भाषा एक समृद्ध साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत है। सिन्धी भाषा दिवस हजारों वर्षों पुरानी प्राचीन सिन्धी संस्कृति के महत्व को याद करते हुए उसे सुरक्षित एवं संरक्षित करने के उद्द़ेश्य से मनाया जाता है। सिन्धी भाषा दिवस सिर्फ एक उत्सव भर नही है, बल्कि हमारी संस्कृति, हमारे रीति-रिवाजों और हमारे मूल्यों का संगम है। यह हमारे पूर्वजों की परंपराओं को जीवंत बनाए रखने का एक खूबसूरत जरिया है।
दुनियां जी सभई जुबानूं।
बेशक रखो अखिंंयूनि ते।
सीने सां पर लगायो।
पैहिंजी जुबान सिन्धीअ खे।
संस्कृत के शब्द सिन्धु से सिन्धी शब्द की उत्पत्ति हुई है। जिसका अर्थ होता है नदी और समुद्र। सिन्ध के मूल निवासियों को सिन्धी कहते है। सिन्धी भाषा और सिन्धी लोगों का नाम सिन्धु नदी के नाम पर रखा गया है, क्योंकि सिन्धु नदी के तटवर्ती इलाकों एवं सिन्ध प्रांत के निवासी आपसी बातचीत और बोल-चाल में जिस बोली का प्रयोग करते थे वह सिन्ध नदी के नाम पर सिन्धी कहलाती है।
सिन्ध की लोक संस्कृति में लोक साहित्य का अपरिमित भंडार छुपा हुआ है यहां दरिया-ए-सिन्ध के किनारे पर जब कोई सिन्धी जुबान में तान छेड़ संतों की वाणी को आवाज देता है, तो ऐसा लगता है मानो पूरा वातावरण एकाकार रसवंत होकर अपने वेदों की जननी को याद कर रहा हो।
सिन्धी भाषा दरिया-ए-सिन्ध के संग संग चली है, यह भाषा युगों-युगों तक लाखों धड़कनों और सांसों की सहचरी और सहभागी बनी रही है। सिन्धी भाषा ने लाखों लोगों के भावों को अभिव्यक्त़ि दी है। लेकिन जब भारत का विभाजन हुआ तो नक्शे के साथ-साथ सिन्धी भाषा भी आहत हुई।
जेको सचीअ दिलि सां।
बोलीअ खे प्यार करे थो।
झूलण जी दुआ खटे।
समाज जो भलो करे थो।
सिन्धी भाषा बहुत ही समृद्ध है, सिन्धी भाषा एक गूढ़ रहस्यवादी भाषा भी है जिसका महत्व व्यापार जगत से जुड़े लोग भली-भांति जानते व समझते है।
वैसे तो सिन्ध में सिन्धी बोली हजारों सालों से बोली जाती रही है। 1853 से पहले सिन्ध में चार सिन्धी लिपि प्रचालन में थी।

- सिन्धी पंडित सिन्धी देवनागरी लिपि में लिखते थे।
- सिन्धी धार्मिक ग्रंथों का प्रकाशन गुरुमुखी लिपि में होता था।
- व्यापार व्यवसाय का हिसाब किताब हटवारकी जिसे खुदाबादी भी बोलते है, उसमें किया जाता था।
- सरकारी लिखा-पढ़ी अर्थात शासकीय कार्य अरबी लिपि में लिपिबद्ध किया जाता था।
इन चारों लिपियों में से कोई भी लिपि मानकीकृत नही थी, क्योंकि उस वक्त़ इन लिपियों के लिए कोई भी मानक तय नही थे, अर्थात एक के लिखे हुए को दूसरों को पढ़ने में कोई ना कोई तकलीफ़ हो सकती थी।
और देखा जाए तो शायद इसी कारण 1853 के पहले कोई खास सिन्धी साहित्य भी नही लिखा गया।
जब 1851 में हेनरी बार्टले फ्रेरे को सिन्ध का कमिश्ऩर बनाकर भेजा गया था। कमिश्ऩर फ्रेरे को अलग-अलग सिन्धी लिपियों में कार्य ठीक नही लगा। 1853 के न्यायालय के एक आदेश के मुताबिक फ्रेरे ने अपने असिस्टेंट कमिश्ऩर बी.एच.एलिस की मदद से 8 विशेषज्ञों की एक समिति का गठन किया, जिसका काम था सिन्धी बोली का मानकीकरण कर उसे आसान बनाना ताकि सिन्धी बोली को सिन्ध में सभी आम जनता के लिए अनिवार्य किया जा सके। कमेटी में बहुत ही विचार-विमर्श पश्च़ात आखिरकार 52 अक्षरों वाली सिन्धी लिपि का जन्म हुआ। सिन्धी लिखने के लिए प्रयुक्त अरबी-फारसी लिपि में 52 अक्षर होते हैं। इसमें सभी शब्दों उच्चारणों को बराबर शामिल किया गया था। वह सभी उच्चारण शब्द जो हमें दुनिया की सभी बोलियों में श्रेष्ठ बनाते है। जैसे कि ब_ दह_ ग_ ज_ इत्यादि।
1853 में ब्रिटिश शासन के तहत आधुनिक सिन्धी को बढ़ावा दिया गया। 1853 के बाद सिन्धी बोली का सुनहरा दौर या कहा जाये कि स्वर्णिम काल शुरु होता है और बहुत सारी किताबें, मैगजीन, अखबार एक ही लिपि में अर्थात सिन्धी लिपि में लिखा गया।
मध्यकालीन युग में सिन्धी साहित्य का विकास हुआ, जिसमें शाह अब्दुल लतीफ भिट्टाई, सचल सरमस्त तथा समी की कविताएं प्रसिद्ध है।
यह मानव सभ्यता के उदय के समय सिन्धु नदी के तट पर उत्पन्ऩ सिन्धी भाषा की बहुमुखी प्रतिभा का ही प्रभाव हो सकता है कि शाह अब्दुल लतीफ भिट्टाई (1669-1752) और अब्दुल वहाब फारुकी (सचल सरमस्त) (1739-1829) जैसे गैर सिन्धी लोग और समी चैन राय बछोमल (1743-1850) सिन्धी साहित्य की सबसे प्रभावशाली तिकड़ी शाह, सचल और समी के रुप में प्रसिद्ध हुए और अंततः वह स्थान हासिल किया जिसे ईश्व़र के तुल्य माना गया।
हालांकि यह सच है कि शाह साहब और सचल सरमस्त मुस्लिम परिवारों में पैदा हुए थे, लेकिन फिर भी सिन्धी साहित्य में उनका योगदान अतुलनीय अद्वितीय और बेमिसाल रहा है। बल्कि हम यह कह सकते है कि यह योगदान इतना उच्च कोटि का है, कि किसी भी अन्य साहित्यिक योगदानकर्ता की इन तीनों से तुलना करना ही बेमानी लगता है।
भारत देश 1947 को आजाद हुआ। हम सिन्धी समाज के लोग 1947 में देश का विभाजन होने पर हमारे प्यारे वतन “सिन्ध” हमारी मिट्टी, हमारे ख़ेत-खलियान, हमारी ज़मीन-ज़ायदाद, हमारे व्यापार-व्यवसाय, मकान-दुकान, कल-कारखाना इत्यादि सभी को छोड़कर हिन्दुस्तान सहित दुनिया के अन्य देशों में विस्थापित जीवन जीने को मज़बूर हो गये थे।
देखा जाये तो आज़ादी की सबसे बड़ी कुर्बानी अगर किसी समाज ने दी थी तो वह सिन्धी समाज ने ही दी थी।
मातृ भूमि से बिछड़ने की वेदना को सिन्धी समाज से ज्यादा अच्छा भला और कौन समझ सकता है।
वर्षों तक विभाजन की पीड़ा एवँ कष्टों के बीच सिन्धी समाज ने कड़ी मेहनत, लगन तथा ईमानदारी से देश-विदेश और समाज में अपना एक अलग मुकाम हासिल किया है।
अपनी मातृभाषा, सभ्यता, संस्कृति एवँ पुरुषार्थ से कड़ी मेहनत और लगन से छोटे से छोटे कार्य व मेहनत, मज़दूरी कर समाज में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है।
मातृभूमि छूटी लेकिन मातृभाषा को पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजने का कार्य सिन्धी समाज को करना होगा। आज हमारे पास भले ही सिन्ध नही है, लेकिन सिन्धी बोली तो है।
सिन्धी समाज आज हर क्षेत्र में अग्रणी भूमिका में है। हमने समृद्धि की ओर कदम तो बढ़ाया लेकिन संघर्ष अभी ख़त्म नही हुआ है, आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ सांस्कृतिक समृद्धि को भी विस्तार देना आवश्यक है। शाब्दिक जमा खर्च के बजाय इसे जीवन में भी उतारना अति आवश्यक है।
लेकिन कहीं-न-कहीं ऐसा प्रतीत होता है कि धीरे-धीरे हमारी सिन्धी बोली विलुप्त प्राय सी होती जा रही है…? शनै: शनै: पाश्च़ात्य जीवन शैली कहीं ना कहीं हमारी संस्कृति को लील रही है, और हमारी संस्कृति का अंत आधुनिकतावाद कर रही है।
समाज में फैली हर सामाजिक और सांस्कृतिक और अनुशासन से संबंधित जितनी भी समस्याएं हैं, उसका मूल कारण कहीं हमारा उच्च शिक्षित होना तो नही है..?
जैसे जैसे हम उच्च शिक्षित होते चले जा रहे है, वैसे वैसे हम अनुशासनहीन होते चले जा रहे है और हमें हमारी सिन्धी भाषा गौण लगने लगी है, और कहीं ना कहीं एक श्रेष्ठता का अहंकार हमारे अंदर पनपने लगा है।
जिस सिन्ध प्रांत से हम आए थे, वहां पर आम बोल-चाल की भाषा और व्यवहार पूर्ण रुपेण सिन्धी भाषा मे ही हुआ करता था तो वहां पर भाषा विलुप्त होने वाली जैसी कोई बात ही नहीं थी।
विभाजन पश्च़ात हमारे विस्थापित होने के बाद हमारे सामने सबसे बड़ा संकट हमारी भाषा और संस्कृति को बचाये रखने का ही था।
यहां स्थापित होने के बाद शुरुआत में कुछ समय तक हमने अपनी बोली और संस्कृति को बचाए रखा। क्योंकि तब हमारे बुजुर्ग ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हुआ करते थे और घरो में सिन्धी भाषा ही बोली जाती थी।
और सभी मान्यताओं परंपराओं तथा सामाजिक सांस्कृतिक सभ्यता का पालन पूर्व की भांति अनुसार ही किया जाता था।
हमारी भाषाई जरुरतों को ध्यान में रखते हुए, सरकारों ने भी सिन्धी प्राइमरी और मिडिल स्कूलों की व्यवस्था की थी जहां पर देवनागरी लिपि में सिन्धी भाषा पढ़ाई जाती थी।
भारत में राज्यों के गठन का आधार भाषाओं पर आधारित था। इसी आधार पर यदि विभाजन के पश्च़ात बतौर विस्थापन यदि भारत में हम सिन्धियों को भी अपना एक छोटा सा भी क्षेत्र “सिन्धु प्रदेश” के रुप में मिल जाता तो, हमें अपनी सिन्धी संस्कृति और अपनी सिन्धी भाषा को राज्य का सहारा मिल जाता और हमारी सिन्धी भाषा और संस्कृति को बचाए एवं बनाए रखने के लिए शाय़द इतनी जद्द़ोजहद उठानी नही पड़ती।
हमारे बड़े बुजुर्गों ने और गांव के ग्रामीणों ने बिना पढ़े लिखे हजारों साल तक अपनी बोली और संस्कृति को जिंदा रखा।
वर्तमान नई पीढ़ी के माता-पिता जो खुद अपनी मातृभाषा से कहीं ना कहीं महरुम है
क्या वे अपने बच्चों को इस बाबत प्रेरित कर पायेंगे..?
सिन्धी सभ्यता तो काफी हद तक हमने खोई है, इस अंधे आधुनिक दौर में यदि कम से कम सिन्धी बोली को भी हम जीवित रख पाते है, तो भी आने वाली पीढ़ियां हमारी शुक्रगुजार होंगी।
आप सभी को यह जानकर खुशी होगी कि दुनिया में सिन्धी समुदाय के लोग ऐसे है, कि जहां जाते है वहां अपना वर्चस्व बना लेते है। सिन्धियों की संपन्नता और प्रभुता बहुत मजबूत रहती है। सिन्धी सबसे ज्यादा होशियार और समझदार भी होते हैं, परंतु इस समय सिन्धी समाज के हर व्यक्त़ि को आत्म केंद्रित रहने की बजाय समाज केंद्रित होने की जरुरत है।
क्योंकि आज की वास्तविकता क्या है, राजनीतिक और प्रशासकीय हल्कों में हमारा क्या योगदान है.? शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में तुलनात्मक रुप से अन्य समाजों के बीच सिन्धी समाज की अहमियत कितनी है.? शायद हमें जरुरत है अपने स्वर्णिम और गौरवशाली इतिहास की ओर देखने की एवँ अपनी ताकत को पहचानने की..?
आप सिन्धी समाज के समस्त साथियों से करबद्ध निवेदन है कि अपने प्यारे सिन्ध की याद अपने एवँ अपने परिजनों के जेहन में बनाये रखें तथा अपने बच्चों तथा नई युवा पीढ़ी को “सिन्ध” के संस्मरण, इतिहास, संस्कृति, बोली, पहनावे, ख़ान-पान, रहन-सहन एवँ भाषा की जानकारी से अवश्य अवगत कराते रहें, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी भी सिन्ध एवँ सिन्धी संस्कृति से वाकिफ रहे..!
संकलन एवं साभार प्रस्तुति:-
इन्दू गोधवानी, रायपुर..✍️ 9425514255
जियें सिन्धी” “वधे सिन्धी”
