( सिंधी फिल्म वरदान 3 ने दिया संदेश अपनी संस्कृति को बचाए
और अपने बड़ों के बताए हुए मार्ग पर चलकर ही सुख की प्राप्ति हो सकती है)
बिलासपुर के सम्माननीय मनसुखानी परिवार के द्वारा समाजिक प्रेरणादाई फिल्म”वरदान”1, “वरदान 2” की अपार सफलता के बाद उसी कड़ी में समाजिक नयी फिल्म “वरदान 3” के प्रदर्शन शहर के 36 मॉल में किया गया जिसका प्रथम शो, को दर्शकों ने बहुत ही पसंद किया और फिल्म की बहुत तारीफ की कार्यक्रम की शुरुआत भगवान झूलेलाल और गुरु नानक देव जी के फोटो पर पुष्प अर्पित कर दीप प्रज्वलित करके आरती करके की गई

इस अवसर पर आज के कार्यक्रम के
अतिविशिष्ट सम्माननीय व्यक्तियों में सर्वप्रथम धन गुरुनानक दरबार साहिब के सेवा प्रमुख श्री मूलचंद नारवानी जी एवं धन गुरुनानक दरबार साहिब उल्हासनगर से आये भाई साहेब यंगमेन के द्वारा प्रार्थना अरदास पश्चात पूज्य सिंधी सेन्ट्रल पंचायत के पूर्व अध्यक्ष श्री प्रकाश ग्वालानी जी अध्यक्ष महोदय श्री विनोद मेघानी जी एवं मर्चेंट एसोसिएशन व्यापार विहार के अध्यक्ष महोदय श्री नानकराम खटूजा जी समाज सेवी कैलाश मलघानी जी समाज सेवीका, श्रीमती रेखा आहुजा एवं उपस्थित समाज के सम्माननीय जनों एवं समाज की गणमान्य मातृशक्ति की गरिमामयी उपस्थिति में समाजिक प्रेरणादायक फिल्म “वरदान 3” 36 माल में आज दिनांक 04 अप्रैल दिन शनिवार को शाम 07:00 बजे प्रदर्शित की गयी


आए हुए अतिथियों का मनसुखानी परिवार के द्वारा पुष्प 🌸🌺🌻🌹🌷🌼💐 देकर स्वागत किया गया भाई साहब मुलचंद नारवानी जी एवं अन्य तिथियों को छाल पहनाकर सम्मान किया गया मंच संचालन भाई साहब जगदीश जज्ञयाशी ने किया वह फिल्म के बारे में जानकारी दि
फिल्म का फर्स्ट भाग समाज में जिस तरह अपनी भाषा को भूलते जा रहे हैं और अंग्रेजी की ओर और विदेशी संस्कृति की ओर आकर्षित हो रहे हैं उसके बारे में ध्यान आकर्षित कराया गया सिंधी स्कूल बंद हो चुके हैं हमारे बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं इससे अपनी मातृभाषा को भूलते जा रहे हैं आप सारी भाषाएं हर स्कूल में आपको पढ़ने को मिल जाएगी पर अपनी मातृभाषा आपको अपने घर में ही पढ़ने को मिलेगी सीखने को मिलेगी बोलने को मिलेगी इस बात की और जोर दिया गया की बचपन में ही बच्चों को संस्कार दिया जाए और अपनी मातृभाषा में ही उनसे बात की जाए माता पिता के बताए हुए मार्ग पर चलकर ही आप सुखी रह सकते हैं फिल्म के सेकंड भाग बहुत ही इमोशनल रहा और इस सेकंड भाग ने कहानी ने दर्शकों को बांधे रखा और उसका सार यही था कि जो संतान अपने माता-पिता को भूल गई और उसे संस्कारों को याद नहीं रखा, उसे त्याग दिया ऐसी संतान कभी भी सुखी नहीं रह सकती है और उसका अंतिम समय बहुत ही दुखदाई होता है और उसकी होने वाली संतान भी वैसे ही कार्य करती है


एक कहावत पुरानी है बोया बाबुल तो आम कहां से पाए और अंत में यह बताया गया कि बेटा और बेटी में कोई फर्क नहीं है बेटी भी वह सारे कार्य कर सकती है जो एक पुत्र करता है किस तरह उसने अपने बड़े पिता के अंतिम संस्कार की कार्य विधि में शामिल होकर अंतिम संस्कार किया और बेटे का फर्ज निभाया कहानी बहुत ही लाजवाब है फिल्म में कॉमेडी भी है जो लोगों को बीच-बीच में हंसाते रहती है गाने भक्ति वाले भी हैं और बचपन में जो हमने खेल खेले हैं उसके ऊपर भी आधारित है संगीत ठीक है कहानी अच्छी है और सभी कलाकारों ने अपने-अपने किरदार का भरपुर और ईमानदारी से न्याय किया और अपने किरदार को जीवित कर दिया समाज को हम भी संदेश देना चाहेंगे कि ऐसी फिल्मों को सह परिवार जाकर देखें ताकि इस फिल्म में सभी के लिए कुछ ना कुछ संदेश है

बच्चों के लिए भी बड़ों के लिए भी और युवाओं के लिए भी लड़कों के लिए भी लड़कियों के लिए भी इसलिए इस फिल्म को सह परिवार जाकर देखें और जो संदेश है उस संदेश को ग्रहण करके अपने जीवन में अमल करें तभी इस फिल्म को देखने का मतलब सार्थक निकलेगा आज के इस पूरी फिल्म को हमर संगवारी के संपादक विजय दुसेजा ने देखा वह दर्शकों से चर्चा की सभी ने इस फिल्म को बहुत पसंद किया और फिल्म की तारीफ की
