तीनों देशों के हित और प्राथमिकताएं अलग- अलग- पाकिस्तान के लिए अवसर- अमेरिका के लिए रणनीतिक संतुलन और ईरान के लिए अस्तित्व और सम्मान का सवाल
ईरान की शर्तें स्पष्ट हैं पूर्ण युद्धविराम,अनफ्रीज एसेट्स नुकसान की भरपाई और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही, यदि ये शर्तें पूरी नहीं होतीं,तो वार्ता के टूटने की संभावना बनी रहेगी -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर पश्चिम एशिया में हालिया 14 दिन के युद्धविराम के बाद दुनियाँ की नजरें अब पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पर टिक गई हैं, जहां ईरान और अमेरिका के बीच 11 अप्रैल 2026 पर टिक गई है जहाँ उच्च स्तरीय वार्ता चल रही है। यह वार्ता केवल एक कूटनीतिक प्रक्रिया नहीं,बल्कि वैश्विक शक्ति- संतुलन,ऊर्जा सुरक्षा,क्षेत्रीय स्थिरता और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुकी है।खास बात यह है कि पाकिस्तान इस पूरी प्रक्रिया में एक मध्यस्थ और मेजबान की भूमिका निभा रहा है,जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक संकेत है। यह वार्ता फिलहाल द्विपक्षीय (बाइलेटरल) स्तरपर चल रही है,लेकिन संभावनाएं इस बात की हैं कि यह आगे चलकर त्रिपक्षीय (ट्राइलेटरल) रूप ले सकती है, जो वैश्विक कूटनीति में एक नया अध्याय जोड़ सकता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि इस वार्ता की मेजबानी कर रहे शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर की उपस्थिति यह दर्शाती है कि पाकिस्तान इस अवसर को अपनी कूटनीतिक साख बढ़ाने के रूप में देख रहा है। विदेश मंत्री इशाक डार और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोहम्मद असीम मलिक भी इस वार्ता में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। पाकिस्तान की कोशिश है कि वह खुद को एक जिम्मेदार मध्यस्थ के रूप में स्थापित करे,जैसा कि अतीत में कतर या नॉर्वे ने किया था,हालांकि यह भूमिका जोखिम से खाली नहीं है, क्योंकि किसी भी विफलता का असर उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि पर पड़ सकता है।

साथियों बात अगर हम वार्ता का प्रारूप: बाइलेटरल से ट्राइलेटरल की ओर? इसको समझने की करें तो फिलहाल बातचीत अलग-अलग चैनलों के जरिए हो रही है, पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के साथ अलग-अलग संवाद कर रहा है।यह शटल डिप्लोमेसी का एक क्लासिक उदाहरण है।अगर दोनों पक्षों की प्रमुख मांगें पूरी हो जाती हैं, तो यह वार्ता त्रिपक्षीय रूप ले सकती है। लेकिन यह प्रक्रिया बेहद जटिल है, क्योंकि तीनों देशों के हित और प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।पाकिस्तान के लिए यह अवसर है,अमेरिका के लिए रणनीतिक संतुलन और ईरान के लिए अस्तित्व और सम्मान का सवाल।
साथियों बात अगर हम ईरान की प्रमुख मांगें: आर्थिक राहत और सुरक्षा गारंटी को समझने की करें तो ईरान की सबसे बड़ी मांग उसके फ्रीज किए गए एसेट्स को अनफ्रीज करना है। यह मुद्दा केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक भी है। ईरान का मानना है कि उस पर लगाए गए प्रतिबंध अन्यायपूर्ण हैं और उन्हें हटाया जाना चाहिए। हालांकि, व्हाइट हाउस ने इस पर स्पष्ट संकेत दिया है कि फिलहाल ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया गया है।इसके अलावा ईरान ने लेबनान में सीजफायर को भी वार्ता का हिस्सा बताया है, जो इस बात का संकेत है कि वह इस बातचीत को क्षेत्रीय संदर्भ में देख रहा है, न कि केवल द्विपक्षीय मुद्दे के रूप में हैं
ईरान इस वार्ता में पूरी तरह बिना भरोसे के प्रवेश कर रहा है। इसका कारण है अतीत में अमेरिका द्वारा किए गए वादों का टूटना,विशेषकर ईरान परमाणु समझौता 2015 से अमेरिका का बाहर निकलना। यह अविश्वास वार्ता को जटिल बनाता है, क्योंकि किसी भी समझौते के लिए विश्वास का होना अनिवार्य है। ईरान की शर्तें स्पष्ट हैं पूर्ण युद्धविराम,नुकसान की भरपाई और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही। यदि ये शर्तें पूरी नहीं होतीं, तो वार्ता के टूटने की संभावना बनी रहेगी।
साथियों बात अगर हमअमेरिका का दृष्टिकोण: रणनीतिक नियंत्रण और संतुलन को समझने की करें तोअमेरिका की प्राथमिकता है कि ईरान एक क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में उभर न सके। इसके लिए वह आर्थिक प्रतिबंध, कूटनीतिक दबाव और सैन्य उपस्थिति का उपयोग करता रहा है। जेडी वेंस की इस्लामाबाद यात्रा और उनकी चेतावनी इस बात का संकेत है कि अमेरिका इस वार्ता को केवल शांति प्रक्रिया नहीं, बल्कि रणनीतिक उपकरण के रूप में देख रहा है। अमेरिका के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि इज़राइल की सुरक्षा सुनिश्चित रहे, जो उसका प्रमुख सहयोगी है। इस्लामाबाद में हो रही बातचीत से इज़राइल लेबनान संघर्ष: वार्ता पर संकट छाने की उम्मीद बढ़ गई है, इस पूरे परिदृश्य में इज़राइल और लेबनान के बीच जारी संघर्ष एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। ईरान ने स्पष्ट किया है कि लेबनान में हमले रुकने चाहिए, जबकि इज़राइल ने अपने ऑपरेशन जारी रखे हैं।इस संघर्ष में एक ही दिन में सैकड़ों लोगों की मौत की खबरें आई हैं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाती हैं। यह संघर्ष न केवल मानवीय संकट पैदा कर रहा है, बल्कि शांति वार्ता को भी प्रभावित कर रहा है।

साथियों बात अगर हम दिनांक 11 अप्रैल 2026 को इस्लामाबाद में ईरान-अमेरिका संभावित स्थाई शांति संबंधी हो रही बैठक की करें तो आगे की बातचीत क़े लिए ट्रंप ने सस्पेंस बरकरार रखा है,उन्होंने पिछली अमेरिकी सरकारों पर निशाना साधते हुए कहा कि वे लोग 47 साल से सिर्फ बातें ही कर रहे थे,उन्होंने दो टूक लहजे में कहा कि कल की मीटिंग ही यह तय करेगी कि आगे क्या होगा. ट्रंप ने यह साफ नहीं किया कि यह आखिरी मुलाकात होगी या आगे भी दौर चलेगा, बस इतना कहा कि ‘हमें देखना होगा कि कल क्या नतीजा निकलता है, इस्लामाबाद वार्ता से ठीक पहले ईरान के उपराष्ट्रपति ने अमेरिका को बेहद सख्त और सीधा संदेश भेजा है. ईरान ने साफ कर दिया है कि अगर वे अमेरिका फर्स्ट के प्रतिनिधियों से बात कर रहे हैं, तो एक ऐसी डील मुमकिन है जो दोनों देशों और दुनियाँ के लिए फायदेमंद हो लेकिन,अगर अमेरिका इजरायल फर्स्ट की सोच के साथ मेज पर आता है,तो कोई समझौता नहीं होगा. ईरान ने चेतावनी दी है कि ऐसी स्थिति में वे पहले से कहीं ज्यादा मजबूती के साथ अपनी रक्षा जारी रखेंगे,जिसका खामियाजा पूरी दुनियाँ को भुगतना होगा पूरा विश्व उम्मीद कर रहा है कि इस्लामाबाद में हो रही ईरान अमेरिका की बैठक सफल हो ताकि पूरे विश्व के शेयर बाजारों और नागरिकों को वित्तीय क्राइसिस से सटिका से बचाए जा सके।
साथियों बात अगर हम आने वाले 14 दिन और इस्लामाबाद में 11 अप्रैल 2026 को हुई बैठक:निर्णायक मोड़ साबित होगी इसको समझनें की करें तो,सीज़फायर केवल 14 दिनों का है,और यही अवधि वैश्विक बाजारों की दिशा तय करेगी।(1)संभावित परिदृश्य:(अ)यदि शांति बनी रहती है,तेल कीमतें स्थिर रहेंगी,बाजार में और तेजी आएगी(ब)यदि तनाव फिर बढ़ता है: तेल कीमतों में उछाल, बाजार में गिरावट (2)मध्य मार्ग: अस्थिरता बनी रहेगी, निवेशक सतर्क रहेंगे,इसलिए संभवतः अनिश्चितता के बीच अवसर अप्रैल 2026 का यह सप्ताह यह दर्शाता है कि वैश्विक बाजार कितने संवेदनशील और गतिशील हैं। ईरान-अमेरिका सीज़फायर ने यह साबित किया कि एक सकारात्मक भू- राजनीतिक घटनाक्रम किस प्रकार पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।भारत के संदर्भ में, यह सप्ताह एक सकारात्मक संकेत लेकर आया है मजबूत घरेलू मांग, निवेशकों का बढ़ता विश्वास, और वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद स्थिरता की ओर बढ़ता बाजार।हालांकि, अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है। आने वाले 14 दिन न केवल पश्चिम एशिया की राजनीति, बल्कि वैश्विक आर्थिक दिशा भी तय करेंगे।
साथियों बातें कर हम ऊर्जा संकट और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर को समझने की करें तो स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में शिपिंग बाधित होने से वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है। यह मार्ग दुनियाँ के लगभग 20 प्रतिशत तेल व्यापार का केंद्र है। इसके बंद होने या बाधित होने से तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव आया है। पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में वृद्धि ने आम जनता और उद्योगों दोनों को प्रभावित किया है। जापान द्वारा अतिरिक्त तेल रिलीज करना इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है।इस वार्ता का असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है। रूस को तेल बाजार में छूट मिलने की संभावना, डोनाल्ड ट्रंप के बयान और इमैनुएल मैक्रों द्वारा जी 7 चर्चा का प्रस्ताव ये सभी संकेत हैं कि यह मुद्दा वैश्विक राजनीति के केंद्र में है।यह वार्ता एक ग्लोबल रीसेट’ की संभावना भी पैदा कर सकती है,जहां नई शक्ति संरचनाएं स्पष्ट रूप से उभर सकती हैं।
साथियों बात अगर हम ईरान का सख्त संदेश:अमेरिका फर्स्ट बनाम इज़राइल फर्स्ट इसको समझने की करें तो ईरान के उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा आरिफ ने स्पष्ट किया है कि अगर अमेरिका अमेरिका फर्स्ट दृष्टिकोण से आता है, तो समझौता संभव है, लेकिन इज़राइल फर्स्ट नीति के साथ कोई डील नहीं होगी। यह बयान इस बात का संकेत है कि ईरान अपनी संप्रभुता और रणनीतिक स्वतंत्रता से समझौता नहीं करेगा।ईरान के लिए हिज़्बुल्लाह हमास और हूती जैसे सहयोगी केवल सैन्य साधन नहीं,बल्कि उसकी क्षेत्रीय नीति का हिस्सा हैं।यदि वह इनका समर्थन छोड़ता है,तो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठेगा। वहीं इज़राइल के लिए यह अस्तित्व का प्रश्न है। यही वह ‘डेडलॉक’ है जो वार्ता को जटिल बनाता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि शांति, रणनीति और अनिश्चित भविष्य इस्लामाबाद में चल रही यह वार्ता एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। यह शांति की दिशा में एक बड़ा कदम भी हो सकती है और केवल एक रणनीतिक विराम भी। पाकिस्तान की मध्यस्थता, ईरान की शर्तें, अमेरिका की रणनीति और इज़राइल का रुख इन सभी के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह वार्ता स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त करती है या केवल एक अस्थायी राहत बनकर रह जाती है।यह कहना गलत नहीं होगा कि यह केवल तीन देशों की बातचीत नहीं, बल्कि 21वीं सदी के वैश्विक शक्ति-संतुलन की परीक्षा है, जहां हर निर्णय का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यम सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425
