(छत्तीसगढ़ी हास्य नाटक)
“
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(पर्दा खुलथे। एक पात्र मंच में माचिस के तीली ल जरा के आवत दिखथे। अउ ए जगह पंडित के हवेली के दुआर हवय जिहां के दृश्य हेवय )
पंडित (प्रवेश करथे):
कइसन रे, का खोजत हस?
कमिया:-नौकरी खोजत हंव।
पंडित:-.अरे बालक! अइसनहे माचिस धरके नौकरी मिलही का रे?
कमिया:- हमर गांव के मन कहिथें। “चिराग ले खोजे जाही त नौकरी मिलथे। तेखर ले मंहु घलो खोजत हंव।
पंडित:-अच्छा, ये बता—कुछु पढ़े-लिखे हस?
कमिया:- पढ़े-लिखे तो नई हंव, फेर छेरिया-बोकरी चराय सकत हंव।
पंडित:-ठीक हे, ठीक हे। मोर इहां काम करबे?
कमिया:-काबर नई करहूं मालिक!
पंडित:-त ठीक हे। बस…काम इमानदारी के करबे। मंय घर के मालिक हंव। अब ये घर तोर जिम्मा मं हवय—अच्छा ले रखवाली करबे। ठीक हे…?
(थोड़ा रुक के)
अऊ सुन—कोनो कुछु मांगे बर आही, त झन देबे! हमर पड़ोस मं तेली रहिथे, रोज कुछु न कुछु मांगत रहिथे। वो आही त कुछु झन देबे।आज ओकर घर छुट्टी हवय, खटिया मांगे आही त कहि देबे—ओकर खुरापाटी चरमरा के टूट गे हवय।समझे? अब मंय जात हंव।
(पंडित निकल जाथे)
(तेली प्रवेश करथे)
तेली:-पंडित! ए पंडित!
कमिया:- कइसन बात हे? का काम हवय?
तेली:-पहिली ये बता—तंय कोन हस?
कमिया:-मंय पंडित के नवा नोकर हंव। जल्दी बता, मोला बहुत काम हवय।
तेली:-मंय दरी मांगे बर आए हंव। पंडित ला बता देबे, दरी दे देही।
कमिया:-ओकर खुरापाटी त टूट गे हवय ग!
तेली:-का कहत हस रे? दरी के खुरापाटी?
कमिया:- हव, वोहर चरमरा के टूट गे हवय।
तेली:- अरे अड़हा हस का रे! दरी के घलो खुरापाटी होथे का?
( अउ दरी उठाके ले जाथे)
कमिया ( ऐलान देखके घबरा जाथे ):-अब मंय पंडित ला का कहंव!
(पंडित वापस आथे)
पंडित:-का होइस रे? कोनो आय रहिस का?
कमिया:- हाँ महराज, तेली आय रहिस। दरी ला जबरदस्ती लेगे।
पंडित (गुस्सा मं):-अरे अड़हा! तंय कहे काबर नई के दरी ह फटके गोदरी हो गे हवय! धत रे बपरा….अब सुन—फेर कुछु मांगे आही, त झन देबे! तेकर दाई..नई त तोला नौकरी ले निकाल देहूं जाने !
(पंडित खेत तरफ रेंग देथे..)
(फेर दूबारा तेली आ जाथे )
तेली:- पंडित! ए पंडित!
कमिया:-पंडित नई हे। तंय जा.. पंडित हरे तोला कुछु देहे बर मना किए हवय।
तेली:अरे सुन तौ.. मंय हर ए दारी कंडिल मांगे बर आए हंवव।
कमियां- (तेली के ये गोठ ल सुन के बोलते)- वो हर तौ चिराफोरा के गोदरी हो गए हवय।
तेली- (कमियां के ये बात ल सुनके बोलथे) -अरे जोजवा ..कभू कंडील ह चिराफोरा के गोदरी होथे बईहा..!( फेर चमक के कइथे ) वो दे तौ राखे हावय कंडील गदहा। तोला नई दिखत हावय..? ( अईसन कइके कंडिल ल उठा के ले जाथे )
कमियां- (येला देखके माथा ल पकड़ के कहिथे ) ले अब तो गइस मोर नौकरी हर..।
( ए दारी अब पंडित घलो वापस आथे)
पंडित: (अपन घर में घुसत घुसत कमियां ला बोलथे )-कइसे रे कमियां.. तोर मुं हर काहे लटके हवय रे…? फेर कुछु ले गय हावय का रे तेली हर ?
कमिया:- हाहोच्चे…महराज …. तेली हर कंडील ल ले गय हावय..!
पंडित: ए.. हे तैं हर जोजवा ओला रोके नइ..? अईसन मं मैं हर तौ भिखारी हो जाऊं रे.. तैं भाग तौ मोर घर ले.. अइसनहा म मैं तोला नइ रख सकवं..!
कमियां-( येला सुन के सकपका जाथे अउ बोलथे ) एक मउका अउ दे दे मालिक.. तोर पांव परथवं..!
पंडित:- अच्छा-अच्छा ठीक हवय। अरे बुद्धू ओ हर आए रहिस तौ कइते नइ के कंडिल के पेंदा ह फूट गय हवय… अउ ओमा ले टप-टप करके माटी तेल ह चुचवात हवय। अभी आखिरी बार तोला चेतात हांवव ठीक हेवय न..? अब मैं थोरकुन बेर मं आवत थंव। (ये कइके पंडित चले जाथे )
कमियां:-आ रे… तेली.. टोला तौ आज ठठावथंव।
तेली:- जावथवं पंडित मेरा…कथा कहवाय बर हावय तौ एखर बर पंडित ल चेता देथंव (क इके पंडित के घर कोती जाथे अउ चिल्लाथे )- पंडित.. ए.. पंडित कहां हावस गा..?
कमिया:-(तेली ल देख के) ए भइय्या…। तैं हर मोर आगु ले जा तौ.. नइ तो मैं हर आज तोला ठठा डारिहौं..!
तेली:-(कमियां के ये गोठ सुनके ) अरे सुन ले रे बइहा…? अभी मैं कुछु मांगे बर नइ आए हवंव जाने। मोला कथा कहवाए हावय तौ पंडित ल बुलाए आए हवंव ।
कमियां-:- (तेली के गोठ ल सुन के कमियां झुंझला जाथे..अउ बिना सोचे-समझे गुस्सा म कइथे — पंडित के पेंदा ह फुट गे हवय, अऊ ओमा ले टप-टप चुचवात हवय..!
तेली :- (कमियां के गोठ ल सुनके आश्चर्य मा ) का कहे रे… पंडित के पेंदा ह चुचवात हवय… जउंहर होंगे रे ददा….. (ए कइ के तेली ह चले जाथे)
तेली ल खाली हाथ वापस भेज के कमियां हर अब्बड़ खुश हो जाथे
पंडित:- (घर पहुंचथे अउ कमियां ले कइथे)- का बात हे रे आज तें हर अब्बड़ खुश हावस।आज तेली हरे… कुछु मांगे बर नइ आए रहिसे का रे…..!
कमियां:- (बहुत खुश होके पंडित ले बोलथे ) आए रहिस महराज.. ( बड़े ही गर्वित होके बोलथे) लेकिन आज ओला में हर खाली हाथ भगा दिए हावंव..
पंडित ( आश्चर्य ले ):- अच्छा…? ओहर ए दारी काय मांगे आए रहिस रे….?
कमियां:-( खुश होके बोलथे ) महराज वो तेली हर ए दारी… पंडित ले कथा कहवाय बर हेवय कहत रहीस…!
पंडित:- आंय…? तौ तैं ओला का बोले हस….?
कमियां:- ( खुशी खुशी बोलथे ) ओला में हर कइ दिएवं के पंडित के पेंदा हर फुट गे हवय….अउ ओमा ले टप-टप चुचवात हवय….
पंडित:- (कमियां के बाती ल सुन के) धत्त रे पगला अरे मोर दिमाग हो गय रहिस खराब !( दुनो हाथ ले सिर ल ठोंकथे… अउ मारे गुस्सा मं एक डंडा ल उठा लेथे) कहां के गदहा मोर पल्ला म आ गै हावय रे तंय त मोला बदनाम कर डारे! सारे निकल जा इहां ले!……
( कइके कमिया ला दौड़ाथे )
- समाप्त –
