एनटीपीसी सीपत के डेम मे किस अधिकारी के संरक्षण मे चल रहा करोडो का घोटाला एक राखड़ वाहन मे अनेक नेम प्लेट और कट रहा फर्जी बिल्टी
“साहब! ये विकास है या विनाश? आदिवासियों की नौकरी पर डाका और सड़के बन गए है खंडहर
एनटीपीसी एजीएम का “बैंक अकाउंट” मोबाइल कॉल डिटेल और उनके चहेते का भी कराया जाए सीबीआई से जाँच करोडो अरबो के होंगे खुलासे
बिलासपुर-जिला मुख्यालय से महज 15 किमी कि दुरी पर स्थित महारत्न(NTPC) सीपत
जब न्याय की उम्मीद केवल कागजों और आश्वासनों तक सिमट जाती है, तो जन-आक्रोश का सड़कों पर उतरना तय हो जाता है। एनटीपीसी (NTPC) सीपत प्रबंधन द्वारा भू-विस्थापितों और जनप्रतिनिधियों एवं ग्रामीणों को लगातार ‘गुमराह’ करने और झूठे आश्वासन देने की नीति ने अब आग में घी डालने का काम किया है। कल, 1 मई को मजदूर दिवस है क्षेत्र के प्रभावित ग्रामीण और जनप्रतिनिधि एनटीपीसी के प्रभावित ग्राम सुखरीपाली के ठाकुर देव द्वार पर अपनी 24 सूत्रीय मांगों को लेकर जन आंदोलन करेंगे
एनटीपीसी के एजीएम वासने के सीबी आई करें जाँच हो जाएगा दूध का दूध और पानी का पानी
क्षेत्र के जनप्रतिनिधी नरेन्द्र वस्त्रकार और रेवा शंकर साहू का खुली चुनौती देते हुए कहा कि हमारे द्वारा अनंत वासने के भ्रष्टाचार को जिला प्रशासन से लगातार शिकायत किए जा रहे है,पर अभी तक किसी भी प्रकार कि कोई कार्यवाही नहीं हुई है, उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि एनटीपीसी एजीएम का “बैंक अकाउंट” मोबाइल कॉल डिटेल और उनके चहेते का भी सीबीआई से एसी जाँच कराए जाने पर करोडो अरबो के घोटाले का खुलासा होने का दावा किया है
धोखे के शिकार हुए जनप्रतिनिधि:
‘घुमाने’ की रणनीति बेनकाब
स्थानीय जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि पिछले दो महीनों से प्रबंधन ने चर्चाओं के नाम पर केवल समय बिताया है। 9 मार्च को प्रस्तावित आंदोलन को यह कहकर टाला गया था कि 1 मई तक मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई होगी। लेकिन जैसे-जैसे समय नजदीक आया, प्रबंधन के सुर बदल गए। अधिकारियों ने समाधान निकालने के बजाय किसानों, ग्रामीणों,जनप्रतिनिधियों को बैठकों के जाल में उलझाकर रखा, जिससे यह संदेश गया है कि प्रबंधन उनकी समस्याओं के प्रति गंभीर बिल्कुल नहीं है।
एनटीपीसी (NTPC) सीपत प्रबंधन और स्थानीय ग्रामीणों के बीच विवाद अब चरम पर पहुँच गया है। गतौरा, सुखरीपाली, और आसपास के प्रभावित गांवों के ग्रामीणों ने प्रबंधन पर वादाखिलाफी, भ्रष्टाचार और स्थानीय लोगों के शोषण का गंभीर आरोप लगाए है
भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग का गंभीर आरोप
ज्ञापन में सबसे चौंकाने वाला आरोप प्रबंधन के अधिकारियों पर लगाया गया है। ग्रामीणों ने फ्लाईऐश यूटिलाइजेशन विभाग के AGM अनंत वैष्णव पर भ्रष्टाचार में सीधे तौर पर संलिप्त होने का गंभीर आरोप लगाया है। साथ ही, आरोप है कि फर्जी ट्रांसपोर्टरों को संरक्षण दिया जा रहा है और टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है।जबकि रॉयल्टी पर्चियों में हेराफेरी कर शासन को करोड़ों का चूना लगाना ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम’ (Prevention of Corruption Act) के तहत दंडनीय अपराध है। प्रतिबंधित ‘सेनोस्फीयर’ की चोरी और फर्जी ट्रांसपोर्टरों को संरक्षण देना एक बड़े घोटाले की ओर इशारा करता है।
मुख्य मुद्दे जिन पर गरमाया है माहौल:
भर्ती और रोजगार में धांधली
ग्रामीणों का सबसे बड़ा आरोप नौकरियों को लेकर है। ज्ञापन के अनुसार, आदिवासियों के लिए आरक्षित 152 पदों पर भर्ती अब तक लंबित है। त्रिपक्षीय बैठक में तय 692 पदों की गिनती में हेराफेरी की जा रही है। आरोप है कि स्थानीय बेरोजगारों के बजाय बाहरियों को पैसे लेकर काम पर रखा जा रहा है और राख परिवहन की गाड़ियों में बिना हेल्पर के काम करवाकर जोखिम बढ़ाया जा रहा है।
किसानों का शोषण और कृषि की बर्बादी
एनटीपीसी के राख बांध (डाइक) से होने वाले पानी के रिसाव ने आसपास के खेतों को दलदल बना दिया है। किसानों की जमीन की उर्वरता खत्म हो रही है और सिंचाई नहरें राख से जाम हो चुकी हैं। ज्ञापन में कहा गया है कि पिछले 18 वर्षों से चारागाह की व्यवस्था नहीं की गई है, जिससे पशुपालन पर संकट खड़ा हो गया है।
पर्यावरण विनाश और NGT के नियमों की अवहेलना
राख बांध (Fly Ash Dyke) से हो रहा रिसाव किसानों की उपजाऊ जमीन को दलदल में बदल रहा है। यह ‘पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986’ और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के उन निर्देशों का उल्लंघन है जो राख के 100% सुरक्षित निस्तारण की बात करते हैं। राख के कारण सिंचाई नहरें जाम होना और मवेशियों की मौत होना प्रबंधन की घोर लापरवाही को दर्शाता है।
भ्रष्टाचार और रॉयल्टी की चोरी
ज्ञापन में प्रबंधन के भीतर गहरे भ्रष्टाचार का खुलासा किया गया है। फ्लाई एश विभाग के AGM अनंत वाशने पर सीधे आरोप लगाते हुए कहा गया है कि प्रतिबंधित ‘सेनोस्फीयर’ की चोरी करवाई जा रही है। रॉक, कौड़िया और गतौरा क्षेत्र के खनिजों का अवैध उपयोग कर शासन को करोड़ों की रॉयल्टी का चूना लगाया गया है। साथ अपने ही चहेते ट्रांसपोर्टरों को फायदा पहुँचाने के लिए टेंडर नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं।

बुनियादी ढांचा और जन-सुविधाओं की अनदेखी
ग्रामीणों के अनुसार, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की सड़कें 60-70 टन के भारी ट्रकों के कारण बर्बाद हो गई हैं। जर्जर ‘घूमना पुल’ 4 साल से नहीं सुधरा है। सीएसआर (CSR) मद के तहत गाँवों में शिक्षा, बिजली और स्वास्थ्य पर कोई काम नहीं हुआ है, जिससे स्थानीय लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। “जबकि”कंपनी अधिनियम, 2013′ के तहत अनिवार्य 2% लाभ का हिस्सा (CSR) स्थानीय विकास पर खर्च नहीं किया जा रहा है। 14 टन क्षमता वाली सड़कों पर 70 टन के वाहन चलाना ‘मोटर वाहन अधिनियम’ का उल्लंघन है,
स्वास्थ्य का खतरा और पशुओं की मौत
उड़ती राख से गाँव में बीमारियां फैल रही हैं, लेकिन स्वास्थ्य जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति की जाती है। राख बांध में मवेशी फंसकर मर रहे हैं। कार्य के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में मुआवजा देने के मामले में प्रबंधन का रवैया बेहद संवेदनहीन है; यहाँ तक कि ईएसआई (ESI) नियमों का भी पालन नहीं हो रहा है।
श्रमिक शोषण और प्रशासनिक तानाशाही
मजदूरों को ₹541 के बजाय केवल ₹300-350 मजदूरी दी जा रही है। स्थानीय ट्रांसपोर्टरों का पेमेंट रोककर उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। सबसे गंभीर बात यह है कि हक मांगने पर ग्रामीणों को रासुका (NSA) लगाने की धमकी दी जा रही है, जिसे ज्ञापन में अलोकतांत्रिक बताया गया है।
जानकारों का कहना है
श्रम कानूनों की धज्जियां और आर्थिक शोषण
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948′ (Minimum Wages Act) का सीधा उल्लंघन है। साथ ही, कार्य के दौरान मृत्यु होने पर उचित मुआवजा न देना ‘कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम’ (ESI Act) के प्रावधानों को चुनौती देता है।
दमनकारी नीतियों का विरोध
प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे जनपद सदस्य रेवा शंकर साहू और स्थानीय सरपंचों ने कहा कि जब भी ग्रामीण अपने हक की बात करते हैं, तो उन्हें रासुका (NSA) लगाने की धमकी देकर चुप कराने की कोशिश की जाती है, जो पूरी तरह अलोकतांत्रिक है। ठेका मजदूरों को भी शासन द्वारा निर्धारित ₹541 के बजाय केवल ₹300-350 मजदूरी दी जा रही है।
“कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीणों द्वारा लगाए गए ये 24 आरोप केवल शिकायतें नहीं हैं, बल्कि ये न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, पर्यावरण संरक्षण नियमों और पेसा कानून के खुले उल्लंघन का प्रमाण हैं। यदि प्रशासन इन बिंदुओं पर निष्पक्ष जांच करता है, तो प्रबंधन के कई बड़े अधिकारियों पर कानूनी गाज गिरना तय है।”
जवाब देने के डर से एजीएम वाशने नहीं उठाए फोन
उक्त शिकायत के मामले मे जब एजीएम अनंत वासने जी को उनका पक्ष जानने कई बार फोन लगाया गया पर ओ जवाब देने के डर से फोन उठाना उचित नहीं समझा और फोन नहीं उठाए
