इतिहास गवाह है कि कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब सही नीतिगत निर्णय किसी राष्ट्र की दिशा बदल देते हैं
कृत्रिम बुद्धिमत्ता,डिजिटल गवर्नेंस डेटा- आधारित निर्णय प्रणाली, ऑटोमेशन,रोबोटिक्स, इंडस्ट्री 4.0 में अब वही राष्ट्र भविष्य की आर्थिक शक्ति बनेंगे, जो परिवर्तन को तीव्र गति से संस्थागत रूप देंगे -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया- वैश्विक स्तरपर इक्कीसवीं सदी का तीसरा दशक वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए केवल तकनीकी परिवर्तन का दौर नहीं,बल्कि शासन, व्यापार और विकास की अवधारणाओं के पुनर्निर्माण का काल बन चुका है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता,डिजिटल गवर्नेंस, डेटा-आधारित निर्णय प्रणाली, ऑटोमेशन,रोबोटिक्स, इंडस्ट्री 4.0 और ग्लोबल सप्लाई चेन के पुनर्गठन ने दुनिया के सामने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब वही राष्ट्र भविष्य की आर्थिक शक्ति बनेंगे, जो परिवर्तन को केवल स्वीकार नहीं करेंगे,बल्कि उसे तीव्र गति से संस्थागत रूप देंगे। आज वैश्विक प्रतिस्पर्धा केवल प्राकृतिक संसाधनों या पारंपरिक औद्योगिक उत्पादन पर आधारित नहीं रही, बल्कि यह उस क्षमता पर निर्भर हो गई है जिसके माध्यम से कोई देश अपने प्रशासनिक ढांचे, नियामकीय प्रणाली और नवाचार संस्कृति को तेजी से आधुनिक बना सके। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि यही कारण है कि अमेरिका,चीन,दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, जापान और यूरोपीय अर्थव्यवस्थाएं लगातार अपने प्रशासनिक मॉडल को फैसिलिटेटर स्टेट में परिवर्तित कर रही हैं, जहाँ सरकार नियंत्रणकर्ता कम और सक्षम बनाने वाली संस्था अधिक बनती जा रही है। इसी वैश्विक पृष्ठभूमि में भारत भी एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है,जहाँ वह लाइसेंस राज की पुरानी मानसिकता से बाहर निकलकर विश्वास आधारित शासन की नई अवधारणा को संस्थागत रूप देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। 11 से 12 मई 2026 को आयोजित सीआईआई वार्षिक व्यापार शिखर सम्मेलन में नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा द्वारा दिया गया वक्तव्य केवल एक प्रशासनिक सुधार की घोषणा नहीं था, बल्कि यह भारत की भविष्य की आर्थिक दर्शनशास्त्र का संकेत भी था। इंस्टीट्यूशनलाइजिंग रिफॉर्म, बिल्डिंग द स्ट्रक्चरल फाउंडेशन फॉर इंडिया’ फ्यूचर इकॉनमी विषय पर बोलते हुए उन्होंने जिस परमिटेड अनलेस प्रोहिबिटेड मॉडल की चर्चा की, वह वस्तुतःभारत कीनियामकीय मानसिकता में क्रांतिकारी परिवर्तन का प्रतीक है। दशकों तक भारत की आर्थिक प्रणाली प्रोहिबिटेड अनलेस परमिटेड सिद्धांत पर चलती रही, अर्थात किसी भी व्यापारिक गतिविधि, उद्योग, सेवा या निवेश को प्रारंभ करने से पहले सरकारी अनुमति लेना आवश्यक माना जाता था। इससे उद्यमिता, नवाचार और उत्पादन क्षमता पर भारी दबाव बना रहता था। अब पहली बार भारत का नीति-निर्माण तंत्र यह स्वीकार करता दिखाई दे रहा है कि हर गतिविधि को पहले संदेह की दृष्टि से देखने के बजाय उसे स्वाभाविक रूप से अनुमति प्राप्त मानना चाहिए, जब तक कि वह स्पष्ट रूप से कानून द्वारा प्रतिबंधित न हो। यह परिवर्तन केवल भाषाई नहीं, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक सोच के पुनर्जन्म का संकेत है।

साथियों बात अगर हम विश्व इकोनॉमी की करें तो आज का विश्व स्पीड इकॉनमी का विश्व बन चुका है। डिजिटल इन्नोवेशन पल-पल परिस्थितियों को बदल रहा है। जिस तकनीक को विकसित होने में पहले एक दशक लगता था, वह अब कुछ महीनों में वैश्विक बाजार का स्वरूप बदल देती है। ऐसे समय में यदि कोई देश अभी भी अनुमति, फाइल, क्लियरेंस और लाइसेंस की जटिल प्रक्रिया में उलझा रहेगा, तो वह वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट जाएगा। यही कारण है कि भारत अब अपनी नीतियों को कंट्रोल एंड रेगुलेशन से फैसिलिटेशन एंड ट्रस्ट की ओर ले जाने का प्रयास कर रहा है। राजीव गौबा ने रेगुलेटरी कोलेस्ट्रॉल शब्द का उपयोग करते हुए इस समस्या को बेहद प्रभावी ढंग से परिभाषित किया। जैसे शरीर में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल रक्त प्रवाह को बाधित कर देता है, वैसे ही अत्यधिक नियम, अनावश्यक लाइसेंस, बार-बार नवीनीकरण और निरीक्षण आर्थिक गतिविधियों की गति को रोक देते हैं। भारत लंबे समय तक इसी “नियामकीय कोलेस्ट्रॉल” से जूझता रहा। उद्योगों को व्यापार शुरू करने के लिए दर्जनों विभागों से अनुमति लेनी पड़ती थी। छोटे और मध्यम उद्योगों का बड़ा हिस्सा अनुपालन और लाइसेंसिंग के बोझ तले दबा रहता था। परिणामस्वरूप उद्यमिता की ऊर्जा उत्पादन या नवाचार में लगने के बजाय प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सटीकता से नष्ट हो जाती थी।
साथियों, नीति आयोग द्वारा प्रस्तुत नया दृष्टिकोण इस पूरी संरचना को बदलने का प्रयास है। सरकार अब यह मान रही है कि उद्यमी अपराधी नहीं होते, बल्कि आर्थिक विकास के साझेदार होते हैं। जन विश्वास की अवधारणा इसी सोच का विस्तार है। यह वह विचार है जिसमें शासन नागरिकों और उद्योगों को संदेह की दृष्टि से नहीं, बल्कि भागीदार की तरह देखता है। इसी दिशा में 42,000 से अधिक अनुपालनों को हटाया जाना और लगभग 3,700 प्रावधानों का अपराधमुक्त किया जाना ऐतिहासिक कदम माना जा सकता है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में इतने बड़े स्तर पर नियामकीय सरलीकरण केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि आर्थिक संस्कृति में परिवर्तन का प्रतीक है। इससे यह संदेश जाता है कि सरकार अब उद्यमिता को नियंत्रित करने के बजाय प्रोत्साहित करना चाहती है।
साथियों, यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है। दशकों तक भारतीय प्रशासनिक प्रणाली “स्टेट नोज बेस्ट” के सिद्धांत पर आधारित रही। सरकार तय करती थी कि कौन क्या उत्पादन करेगा, कितना उत्पादन करेगा और किन शर्तों पर करेगा। उदारीकरण के बाद कुछ बदलाव अवश्य आए, लेकिन लाइसेंसिंग संस्कृति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। अब पहली बार भारत एक ऐसे मॉडल की ओर बढ़ रहा है जहाँ नागरिक और उद्योग को अधिक स्वतंत्रता दी जा रही है। यह उसी प्रकार का परिवर्तन है जैसा 1980 और 1990 के दशक में दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और चीन ने किया था, जहाँ सरकारों ने उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए नियामकीय बाधाओं को कम किया और उत्पादन को वैश्विक बाजारों से जोड़ा।हालांकि केवल नियमों को सरल बना देना पर्याप्त नहीं होगा। राजीव गौबा ने जिस दूसरे महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया, वह है अनुसंधान एवं विकास यानी आऱ एंड डी में निवेश।भारत आज भी अपने जीडीपी का केवल लगभग 0.7 प्रतिशत ही अनुसंधान और विकास पर खर्च करता है, जबकि विकसित अर्थव्यवस्थाएं 2 से 4 प्रतिशत तक निवेश करती हैं। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि भारत में निजी क्षेत्र का योगदान केवल लगभग 36 प्रतिशत है। यदि भारत को वास्तव में वैश्विक इनोवेशन हब बनना है, तो उसे केवल मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि उसे तकनीकी नेतृत्व भी स्थापित करना होगा।सेमीकंडक्टर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, हरित ऊर्जा, बायोटेक्नोलॉजी और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में स्वदेशी तकनीक विकसित किए बिना कोई भी राष्ट्र दीर्घकालिक आर्थिक शक्ति कभी भी नहीं बन सकता।
साथियों, आज दुनिया उस दौर में प्रवेश कर चुकी है जहाँ तकनीकी आत्मनिर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बन गई है। अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ऐसे समय में भारत के लिए केवल विदेशी तकनीक का उपभोक्ता बने रहना पर्याप्त नहीं होगा। उसे अपनी बौद्धिक संपदा, अपने पेटेंट, अपनी डिज़ाइन क्षमता और अपने अनुसंधान संस्थानों को वैश्विक स्तर तक ले जाना होगा। इसके लिए उद्योग और शिक्षा जगत के बीच गहरा सहयोग आवश्यक होगा। भारत की बड़ी समस्या यह रही है कि विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच समन्वय अपेक्षाकृत कमजोर रहा है। यदि भारत को वास्तव में “मैन्युफैक्चरिंग और इनोवेशन हब” बनना है, तो यह दूरी कम करनी होगी।इसी प्रकारस्किलिंग का प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इंडस्ट्री 4.0 केवल मशीनों का युग नहीं, बल्कि अत्यधिक कुशल मानव संसाधन का युग है। यदि निर्माण क्षेत्र के केवल 20 प्रतिशत और हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र के केवल 1 प्रतिशत श्रमिक ही औपचारिक रूप से प्रशिक्षित हैं, तो यह भारत की विकास यात्रा के सामने गंभीर चुनौती है। विश्व अर्थव्यवस्था तेजी से ऑटोमेशन, डिजिटल प्रोसेस और स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ रही है। ऐसे में बिना प्रशिक्षित कार्यबल के भारत अपनी जनसंख्या को जनशक्ति में परिवर्तित नहीं कर पाएगा। इसलिए उद्योग आधारित स्किलिंग मॉडल की आवश्यकता है, जिसमें प्रशिक्षण सीधे बाजार और तकनीकी जरूरतोंसटीकता से जुड़ा हो।

साथियों, भारत की वर्तमान स्थिति एक अवसर और चुनौती दोनों का मिश्रण है। अवसर इसलिए क्योंकि वैश्विक परिस्थितियां भारत के पक्ष में हैं। चुनौती इसलिए क्योंकि यदि यह अवसर चूक गया, तो आने वाले दशकों में प्रतिस्पर्धा और कठिन हो जाएगी। राजीव गौबा का यह कथन कि हर देश के पास मौके के पल होते हैं, और भारत आज उनमें से एक है वस्तुतः इसी वास्तविकता को दर्शाता है। इतिहास गवाह है कि कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब सही नीतिगत निर्णय किसी राष्ट्र की दिशा बदल देते हैं। 1991 का आर्थिक उदारीकरण भारत के लिए ऐसा ही क्षण था। अब 2026 में विश्वास आधारित नियामकीय व्यवस्था की ओर बढ़ना एक नए आर्थिक युग की शुरुआत साबित हो सकता है।यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत की विकास रणनीति अब केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं रह सकती। सरकार अकेले आर्थिक महाशक्ति नहीं बना सकती। इसके लिए उद्योग, स्टार्टअप, विश्वविद्यालय, शोध संस्थान और नागरिक समाज सभी को साझेदार बनना होगा। भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम पहले ही दुनिया में तीसरे स्थान पर पहुँच चुका है। डिजिटल भुगतान और फिनटेक क्रांति ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारतीय नवाचार वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकता है। अब आवश्यकता इस बात की है कि यही ऊर्जा मैन्युफैक्चरिंग, डीप टेक, हरित ऊर्जा और उन्नत अनुसंधान के क्षेत्रों में भी दिखाई दे।
साथियों, वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारत का यह परिवर्तन उस समय हो रहा है जब दुनिया की सप्लाई चेन पुनर्गठित हो रही हैं। कोविड-19 महामारी, रूस-यूक्रेन संघर्ष, अमेरिका- चीन व्यापार युद्ध और भू- राजनीतिक तनावों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी उत्पादन रणनीति बदलने के लिए मजबूर किया है। कंपनियां अब चाइना प्लस वन रणनीति पर काम कर रही हैं और ऐसे देशों की तलाश कर रही हैं जहाँ राजनीतिक स्थिरता, विशाल बाजार, कुशल जनशक्ति और डिजिटल अवसंरचना उपलब्ध हो। भारत के पास ये सभी कारक मौजूद हैं। राजीव गौबा ने सही कहा कि भारत के पास डेमोग्राफिक शक्ति, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, मार्केट स्केल और राजनीतिक प्रतिबद्धता का अनूठा संयोजन है। दुनिया की सबसे युवा आबादी, तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग, यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस जैसी डिजिटल क्रांति, आधार आधारित पहचान प्रणाली, और विशाल उपभोक्ता बाजार भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहे हैं।किन्तु केवल संभावनाएं पर्याप्त नहीं होतीं। यदि प्रशासनिक ढांचा धीमा और जटिल रहेगा, तो निवेशक अन्य देशों की ओर चले जाएंगे। इसलिए परमिटेड अनलेस प्रोहिबिटेड मॉडल का वास्तविक उद्देश्य भारत को निवेश और नवाचार के लिए अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है। यह मॉडल उद्यमियों को परमिशन सीकिंग संस्कृति से बाहर निकालकर डूइंग बिजनेस संस्कृति की ओर ले जाता है। लंबे समय तक भारतीय उद्यमियों की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा सरकारी अनुमतियों, निरीक्षणों और रिन्यूअल में खर्च होता रहा। अब सरकार यह व्यवस्था बनाना चाहती है कि जहाँ तक संभव हो, उद्योग स्वयं-प्रमाणन और थर्ड-पार्टी निरीक्षण के आधार पर कार्य करें, जबकि सरकार केवल उन क्षेत्रों में हस्तक्षेप करे जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा, स्वास्थ्य या गंभीर पर्यावरणीय जोखिम जुड़े हों।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि परमिटेड अनलेस प्रोहिबिटेड केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि शासन दर्शन का परिवर्तन है। यह नागरिक और राज्य के संबंधों को पुनर्परिभाषित करता है। यह बताता है कि सरकार का कार्य हर गतिविधि को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें नवाचार, उद्यमिता और आर्थिक गतिविधियां स्वाभाविक रूप से विकसित हो सकें। यदि यह मॉडल प्रभावी ढंग से लागू होता है, तो भारत न केवल व्यापार सुगमता की रैंकिंग में आगे बढ़ेगा, बल्कि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक विश्वसनीय उत्पादन और नवाचार केंद्र के रूप में स्थापित हो सकेगा।2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का भारत का सपना केवल जीडीपी के आँकड़ों से पूरा नहीं होगा। इसके लिए प्रशासनिक मानसिकता, नियामकीय संस्कृति और आर्थिक सोच में गहरे बदलाव आवश्यक होंगे। आज भारत उसी परिवर्तन के द्वार पर खड़ा दिखाई देता है। डिजिटल युग की तेज़ रफ्तार दुनिया में अब वही राष्ट्र आगे बढ़ेंगे, जो अपने नागरिकों और उद्यमियों पर भरोसा करेंगे, नवाचार को स्वतंत्रता देंगे और शासन को बाधा नहीं बल्कि सहयोगी बनाएंगे। भारत यदि इस दिशा में निरंतरता बनाए रखता है, तो आने वाले वर्षों में वह केवल दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था का एक केंद्रीय स्तंभ भी बन सकता है।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
