13 मई सूरदास जयंती पर विशेष
- सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
भारतीय भक्ति साहित्य के आकाश में यदि किसी कवि ने अपनी काव्य प्रतिभा, आध्यात्मिक अनुभूति और भावनात्मक गहराई से अमिट प्रकाश फैलाया है, तो उनमें सूरदास का नाम अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। वे केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि आत्मपरिवर्तन, भक्ति और मानवीय संवेदनाओं की उस विराट धारा के प्रवर्तक थे, जिसने भारतीय जनमानस को सदियों तक प्रभावित किया। सूरदास का जीवन इस सत्य का सशक्त उदाहरण है कि मनुष्य चाहे कितनी भी गहराइयों में भटक गया हो, यदि उसके भीतर जागृति का प्रकाश प्रकट हो जाए तो वही व्यक्ति अध्यात्म और भक्ति की सर्वोच्च ऊँचाइयों को भी प्राप्त कर सकता है। प्रारंभिक जीवन में सांसारिक आकर्षणों और विषय-वासनाओं में डूबे सूरदास ने जब आत्मबोध की दिशा में कदम बढ़ाया, तो उन्होंने अपने जीवन को पूर्णतः भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में समर्पित कर दिया। किंवदंतियों के अनुसार, सांसारिक मोह-माया से स्वयं को दूर करने के लिए उन्होंने अपनी आँखों का त्याग तक कर दिया। यह घटना केवल बाहरी दृष्टि खोने की नहीं, बल्कि अंतर्मन की दिव्य दृष्टि जागृत होने का प्रतीक है। इसके बाद उनका सम्पूर्ण जीवन श्रीकृष्ण की भक्ति, प्रेम और वात्सल्य रस की साधना में समर्पित हो गया। कहा जाता है कि उनकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उनकी सेवा हेतु उपस्थित होते थे। यह प्रसंग उनकी भक्ति की गहराई और ईश्वर के प्रति उनके पूर्ण समर्पण का अद्भुत प्रतीक है।भक्ति साहित्य में अनेक महापुरुषों की जीवनयात्रा इसी प्रकार आत्मपरिवर्तन की मिसाल रही है। गोस्वामी तुलसीदास, महर्षि वाल्मीकि, विश्वामित्र, अंगुलिमाल, सम्राट अशोक तथा आम्रपाली जैसे अनेक उदाहरण बताते हैं कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसके अतीत से नहीं, बल्कि उसके परिवर्तन और आत्मोन्नति से निर्धारित होता है।
साहित्य की दृष्टि से सूरदास हिन्दी के सर्वोच्च कोटि के कवियों में गिने जाते हैं। उनका काव्य केवल भक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि भाव, भाषा और कल्पना का अनुपम संगम है। विशेषतः उनका “भ्रमरगीत” हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर माना जाता है। इस कृति में श्रीकृष्ण के वियोग में व्याकुल गोपियों की विरह वेदना का अत्यंत मार्मिक और मौलिक चित्रण किया गया है। सूरदास ने गोपियों के प्रेम के माध्यम से सगुण भक्ति की श्रेष्ठता को स्थापित करते हुए उद्धव के ज्ञानमार्ग के अहंकार को अत्यंत प्रभावी ढंग से पराजित किया है।
यद्यपि बाद में अनेक कवियों ने भ्रमरगीत की रचना की, किंतु सूरदास का “भ्रमरगीत” आज भी अपनी भावप्रवणता और मौलिकता के कारण सर्वोच्च माना जाता है। यही कारण है कि हिन्दी साहित्य में भ्रमरगीत परंपरा के वास्तविक प्रवर्तक सूरदास ही माने जाते हैं।
सूरदास की सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति “सूरसागर” है। इसमें श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, रास, वात्सल्य और प्रेम का अद्भुत एवं अत्यंत जीवंत चित्रण मिलता है। अनेक विद्वान इसे श्रीमद्भागवत महापुराण का भावानुवाद मानते हैं, किंतु यह कहना अधिक उचित होगा कि सूरदास ने भागवत के मूल भावों को अपनी मौलिक प्रतिभा से ऐसा नया स्वरूप दिया कि वह पूर्णतः नवीन और विशिष्ट बन गया।
उनकी भाषा ब्रजभाषा थी, जो अपनी कोमलता और माधुर्य के लिए प्रसिद्ध है। सूरदास ने अपनी प्रतिभा से ब्रजभाषा को ऐसा साहित्यिक सौष्ठव प्रदान किया कि वह भक्ति साहित्य की सर्वाधिक प्रभावशाली भाषा बन गई। उनकी पंक्तियों में सहजता, माधुर्य और भावप्रवणता अद्भुत रूप से दिखाई देती है—
“उधौ, मन न भए दस बीस,
एक हुतो सो गयो श्याम संग, को अवराधै ईस।”

सूरदास की भाषा में प्रसाद और माधुर्य गुणों की प्रधानता है। यही कारण है कि उनके पद आज भी जनमानस में उसी श्रद्धा और रस के साथ गाए जाते हैं।
हिन्दी साहित्य के महान आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सूरदास की प्रशंसा करते हुए कहा था—
“सूर की बड़ी भारी विशेषता है नवीन प्रसंगों की उद्भावना। ऐसी प्रतिभा तुलसीदास में भी नहीं मिलती।”
सूरदास का जन्म सन् 1478 ईस्वी में दिल्ली के समीप स्थित सीही ग्राम में माना जाता है। वे जन्म से नेत्रहीन थे। उनका जीवन श्रीकृष्ण भक्ति के पदों के गायन और साधना में व्यतीत हुआ। उनकी प्रमुख रचनाओं में “सूरसागर”, “सूरसारावली”, “साहित्य लहरी” आदि प्रमुख हैं। वात्सल्य रस के सम्राट कहे जाने वाले सूरदास ने कृष्ण की बाल लीलाओं को जिस जीवंतता से चित्रित किया है, वह हिन्दी साहित्य में अद्वितीय है।
सूरदास के जीवन से जुड़ी अनेक कथाएँ आज भी लोकमानस में प्रचलित हैं। उनमें से एक कथा मुगल सम्राट शाहजहाँ के पुत्रों दाराशिकोह और औरंगज़ेब से संबंधित भी कही जाती है, जिसमें पुनर्जन्म और आध्यात्मिक अनुभूति की चर्चा मिलती है। यद्यपि ऐसी कथाओं का ऐतिहासिक प्रमाण सीमित है, फिर भी वे जनश्रुति में सूरदास की आध्यात्मिक प्रतिष्ठा और लोकविश्वास का परिचायक हैं।
आज जब समाज भौतिकता, स्वार्थ और संवेदनहीनता के दौर से गुजर रहा है, तब सूरदास का जीवन और साहित्य हमें प्रेम, समर्पण, करुणा और आत्मशुद्धि का संदेश देता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भक्ति केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्मा की वह निर्मल अवस्था है, जिसमें मनुष्य ईश्वर से नहीं, सम्पूर्ण सृष्टि से प्रेम करना सीखता है।
सूरदास जयंती पर यह स्मरण केवल एक कवि को नमन भर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस महान परंपरा को प्रणाम है, जिसने मनुष्य को आत्मपरिष्कार, प्रेम और भक्ति का मार्ग दिखाया। सूरदास सचमुच हिन्दी साहित्य और कृष्णभक्ति की उस अमर धारा के महान शिल्पी हैं, जिनकी काव्यगंगा आने वाली पीढ़ियों को सदैव आलोकित करती रहेगी।
श्याम तुम्हारी बाँसुरी में ब्रज की साँस समाई है,
हर सुर में राधा की विरह-वेदना मुस्काई है।
सूर के नयनों का अंधियारा भी जगमग हो उठता है,
जब कान्हा चरणों में भक्तिभाव की दीपशिखा जल पाई है।
- सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
