
रोगियों के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम भी उत्पन्न कर सकते हैंजनहित,विज्ञान और स्वास्थ्य सुरक्षा के समन्वय का यह उदाहरण आने वाले वर्षों में भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय,सुरक्षित और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्रगोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत सरकार के केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 20 जून 2026 को जनस्वास्थ्य सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय लिया। मंत्रालय ने औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम,1940 की धारा 26ए के अंतर्गत अधिसूचना जारी कर 16 फिक्स्ड डोज़ कॉम्बिनेशन (एफडीसी) दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया। यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि भारत की वैज्ञानिक, उत्तरदायी और साक्ष्य-आधारित औषधि नीति का स्पष्ट संकेत भी है। ऐसे समय में जब पूरी दुनिया दवा सुरक्षा,एंटीबायोटिक प्रतिरोध, तर्कसंगत औषधि उपयोग और रोगी सुरक्षा जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है, तब भारत का यह कदम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।फिक्स्ड डोज़ कॉम्बिनेशन अर्थात ऐसी दवाएं जिनमें दो या दो से अधिक सक्रिय औषधीय तत्वों को एक निश्चित अनुपात में मिलाकर एक ही दवा के रूप में तैयार किया जाताहै चिकित्सा विज्ञान में एफडीसी का सिद्धांत नया नहीं है। यदि दो या अधिक दवाओं का संयोजन रोगी के लिए अधिक प्रभावी, सुरक्षित, सुविधाजनक और उपचार अनुपालन को बेहतर बनाने वाला हो तो ऐसे संयोजन अत्यंत उपयोगी सिद्ध होते हैं।

क्षय रोग, एचआईवी, उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी अनेक बीमारियों के उपचार में वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित एफडीसी दवाओं कासफल उपयोग किया जाता है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि समस्या तब उत्पन्न होती है जब पर्याप्त वैज्ञानिक अध्ययन क्लिनिकल परीक्षण और चिकित्सीय औचित्य के बिना अनेक दवा संयोजन बाजार में उपलब्ध हो जाते हैं। ऐसे संयोजन न केवल अपेक्षित लाभ देने में विफल रहते हैं, बल्कि कई बार रोगियों के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम भी उत्पन्न कर सकते हैं।स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार विशेषज्ञ समितियों, तकनीकी सलाहकार समूहों और वैज्ञानिक मूल्यांकन के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि संबंधित 16 एफडीसी दवाओं का पर्याप्त चिकित्सीय औचित्य उपलब्ध नहीं है।उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर यह पाया गया कि इन दवाओं के उपयोग से होने वाले संभावित जोखिम इनके संभावित लाभों की तुलना में अधिक हैं।इसलिए जनहित और रोगी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इन पर प्रतिबंध लगाना आवश्यक समझा गया। साथियों, इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह भारत में तर्कसंगत औषधि उपयोग की दिशा में एक बड़ा कदम है। चिकित्सा विज्ञान का मूल सिद्धांत है कि प्रत्येक दवा का उपयोग केवल तभी किया जाए जब उसका लाभ उसके जोखिम से अधिक हो। यदि किसी दवा या दवा संयोजन के प्रभावी और सुरक्षित होने के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध न हों, तो उसका बाजार में बने रहना उचित नहीं माना जा सकता। यही सिद्धांत इस निर्णय की आधारशिला है।प्रतिबंधित 16 एफडीसी दवाओं में विभिन्न श्रेणियों के संयोजन शामिल हैं। इनमें एंटीबायोटिक संयोजन, दर्द निवारक दवाएं, त्वचा रोग उपचार संबंधी क्रीम और लोशन, मधुमेह उपचार के कुछ बहु-घटक संयोजन, एंटीफंगल- स्टेरॉयड-एंटीबायोटिक क्रीम तथा अन्य बहु-घटक दवा संयोजन शामिल हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रतिबंधित संयोजनों में निम्न प्रकार के प्रमुख संयोजन शामिल हैं-निश्चित खुराक संयोजन दवाओं की प्रतिबंधित सूची एमोक्सिसिलिन + सेराटियोपेप्टिडेज़ + लैक्टोबैसिलस स्पोरोजेन्स, एमोक्सिसिलिन + सेराटियोपेप्टिडेज़ एमोक्सिसिलिन + क्लोक्सासिलिन + लैक्टिक एसिड बैसिलस + सेराटियोपेप्टिडेज़,सेफ्यूरोक्सिम + सेराटियोपेप्टिडेज़, सेफैड्रोक्सिल + प्रोबेनेसिड, डाइसाइक्लोमाइन + पैरासिटामोल + क्लिडिनियम ब्रोमाइड + क्लोर्डियाज़ेपॉक्साइड,डाइसाइक्लोमाइन +पैरासिटामोल + क्लिडिनियम ब्रोमाइड,एलोवेरा का अर्क + एलेंटोइन + अल्फाटोकोफेरोल एसीटेट + डी-पैन्थेनॉल + विटामिन ए,एलोवेरा का अर्क + विटामिन ई + डाइमेथिकोन + ग्लिसरीन, एलोवेरा + जोजोबा ऑयल + विटामिन ई,एलोवेरा + संतरे का तेल, एलोवेरा + विटामिन ई + हर्बल,पैरासिटामोल + लिग्नोकेन ग्लिक्लाजाइड + क्रोमियम पिकोलीनेट समिति द्वारा समीक्षा की गई दो अतिरिक्त निश्चित खुराक वाली दवाओं के संयोजन को भी पर्याप्त चिकित्सीय समर्थन के अभाव में प्रतिबंधित कर दिया गया।अन्य वैज्ञानिक आधारहीन बहु-घटक एफडीसी उत्पाद।साथियों, उल्लेखनीय है कि अंतिम आधिकारिक अधिसूचना में प्रत्येक उत्पाद का विस्तृत रासायनिक नाम, शक्ति तथा संरचना का विवरण उपलब्ध होता है, जिसके आधार पर संबंधित उत्पादों की पहचान की जाती है।इन प्रतिबंधित दवाओं में एंटीबायोटिक संयोजनों को लेकर विशेष चिंता व्यक्त की गई है।आज पूरी दुनिया एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस अर्थात एंटीबायोटिक प्रतिरोध की गंभीर समस्या से जूझ रही है। जब एंटीबायोटिक दवाओं का अनावश्यक या अनुचित उपयोग किया जाता है, तो जीवाणु धीरे-धीरे उन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं। परिणामस्वरूप सामान्य संक्रमणों का उपचार कठिन हो जाता है और मृत्यु दर बढ़ने लगती है। विश्व स्वास्थ्य समुदाय कई वर्षों से चेतावनी दे रहा है कि यदि एंटीबायोटिक प्रतिरोध को नियंत्रित नहीं किया गया तो भविष्य में सामान्य संक्रमण भी घातक सिद्ध हो सकते हैं। ऐसे में वैज्ञानिक आधार के बिना तैयार किए गए एंटीबायोटिक संयोजन सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सटीकता से गंभीर खतरा बन सकते हैं। साथियों, भारत विश्व के सबसे बड़े दवा उत्पादक देशों में से एक है। वैश्विक स्तर पर जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका है। एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका तथा अनेक विकसित देशों में भारतीय दवाओं का व्यापक उपयोग होता है। इसलिए भारत की औषधि नियामक प्रणाली द्वारा लिया गया प्रत्येक निर्णय वैश्विक औषधि बाजार और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी प्रभाव डालता है। जब भारत किसी दवा या दवा संयोजन को वैज्ञानिक आधार पर प्रतिबंधित करता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी एक स्पष्ट संदेश देता है कि रोगी सुरक्षा और वैज्ञानिक प्रमाण सर्वोच्च प्राथमिकता हैं।इस निर्णय का कानूनी आधार औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 26ए है। यह धारा केंद्र सरकार को यह अधिकार प्रदान करती है कि यदि किसी दवा के उपयोग से मानव स्वास्थ्य को जोखिम हो सकता है अथवा उसके सुरक्षित एवं प्रभावी होने के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध न हों, तो सरकार उसके निर्माण, बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगा सकती है।यह प्रावधान भारतीय औषधि नियामक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण सुरक्षा तंत्र है,

जिसका उद्देश्य नागरिकों को संभावित रूप से हानिकारक दवाओं से बचाना है।भारत सरकार इससे पहले भी कई अवसरों पर इसी धारा का उपयोग कर चुकी है। पिछले वर्षों में सैकड़ों फिक्स्ड डोज़ कॉम्बिनेशन दवाओं पर प्रतिबंध लगाया गया था। उन निर्णयों का उद्देश्य भी यही था कि बाजार में केवल वही दवाएं उपलब्ध रहें जिनकी प्रभावशीलता और सुरक्षा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो।वर्तमान निर्णय उसी प्रक्रिया की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।दवा उद्योग के दृष्टिकोण से भी यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण है।आधुनिक फार्मास्युटिकल उद्योग में अनुसंधान, नवाचार और गुणवत्ता नियंत्रण की भूमिका लगातार बढ़ रही है। जब नियामक संस्थाएं वैज्ञानिक मानकों को कठोरता से लागू करती हैं,तो दवा कंपनियां भी अधिक शोध, बेहतर क्लिनिकल परीक्षण और अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के पालन के लिए प्रेरित होती हैं। इससे पूरे उद्योग की विश्वसनीयता बढ़ती है और रोगियों को सटीकता से सुरक्षित उपचार उपलब्ध होता है। साथियों, विशेषज्ञों का मानना है कि दवा बाजार में केवल उत्पादों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक लक्ष्य यह होना चाहिए कि उपलब्ध प्रत्येक दवा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित, प्रभावी और सुरक्षित हो। यही कारण है कि विश्व के विकसित देशों में दवाओं की स्वीकृति के लिए कठोर वैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक होते हैं। भारत भी इसी दिशा में, आगे बढ़ रहा है और वर्तमान निर्णय इस प्रतिबद्धता को मजबूत करता है।रोगियों के लिए भी यह निर्णय महत्वपूर्ण संदेश देता है। अनेक लोग बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाओं का उपयोग करते हैं या फार्मेसी से सीधे दवाएं खरीद लेते हैं। विशेष रूप से एंटीबायोटिक दवाओं का अनियंत्रित उपयोग लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार सलाह देते रहे हैं कि किसी भी दवा का उपयोग केवल योग्य चिकित्सक की सलाह पर ही किया जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति वर्तमान में प्रतिबंधित संयोजन वाली दवा का उपयोग कर रहा है, तो उसे घबराने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने चिकित्सक से परामर्श लेकर उपयुक्त वैकल्पिक उपचार अपनाना चाहिएस्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना का मूल सार यह है कि केंद्र सरकार ने उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों, विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों और सार्वजनिक स्वास्थ्य हितों को ध्यान में रखते हुए यह संतोष व्यक्त किया कि संबंधित 16 फिक्स्ड डोज़ कॉम्बिनेशन दवाओं का कोई पर्याप्त चिकित्सीय औचित्य नहीं है तथा उनका उपयोग मानव स्वास्थ्य के लिए जोखिम उत्पन्न कर सकता है। साथियों, जनहित में इनके निर्माण, बिक्री और वितरण पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाया जाता है। यही अधिसूचना इस निर्णय का आधिकारिक आधार है।यदि इस निर्णय को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह केवल 16 दवाओं पर प्रतिबंध का मामला नहीं है,बल्कि भारत की स्वास्थ्य नीति में गुणवत्ता, पारदर्शिता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह निर्णय दर्शाता है कि सरकार केवल दवाओं की उपलब्धता पर ही नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा और प्रभावशीलता पर भी समान रूप से ध्यान दे रही है। रोगी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना किसी भी आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की पहचान होती है।आज जब विश्व स्वास्थ्य संगठन, विभिन्न राष्ट्रीय नियामक संस्थाएं औरचिकित्सा वैज्ञानिक तर्कसंगत औषधि उपयोग तथा एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध की रोकथाम पर जोर दे रहे हैं, तब भारत का यह कदम वैश्विक स्वास्थ्य लक्ष्यों के अनुरूप दिखाई देता है। इससे न केवल भारतीय नागरिकों को सुरक्षित उपचार मिलेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय दवा उद्योग की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा भी मजबूत होगी।अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि कहा जा सकता है कि स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 16 फिक्स्ड डोज़ कॉम्बिनेशन (एफडीसी) दवाओं पर लगाया गया प्रतिबंध जनस्वास्थ्य सुरक्षा, वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति और जिम्मेदार औषधि नियमन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह निर्णय रोगियों की सुरक्षा को सुदृढ़ करेगा, एंटीबायोटिक प्रतिरोध जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने में योगदान देगा, दवा उद्योग में अनुसंधान एवंगुणवत्ता को प्रोत्साहित करेगा तथा भारत को साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य नीति अपनाने वाले अग्रणी देशों की श्रेणी में और अधिक मजबूत स्थानदिलाएगा। जनहित, विज्ञान और स्वास्थ्य सुरक्षा के समन्वय का यह उदाहरण आने वाले वर्षों में भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय, सुरक्षित और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।*-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318*
