
बिलासपुर। सिंधी समाज की महिला विंग द्वारा आयोजित होने वाले सावन उत्सव में निर्धारित सहभागिता शुल्क को लेकर समाज के भीतर चर्चा तेज हो गई है। कई समाज जन सवाल उठा रहे हैं कि क्या सामाजिक और सेवा भाव से होने वाले कार्यक्रमों में इतनी अधिक राशि लेना उचित है?
जानकारी के अनुसार कार्यक्रम में शामिल होने के लिए प्रति महिला ₹550 तथा प्रतिभागीयो के लिए अतिरिक्त ₹100 शुल्क निर्धारित किया गया है। इसे लेकर समाज के लोगों का कहना है कि एक महिला को कार्यक्रम में शामिल होने के लिए ₹650 तक खर्च करना पड़ रहा है। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यमवर्गीय परिवारों की महिलाएं कैसे जुड़ पाएंगी?
सबसे बड़ा सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि जब समाज का अपना विशाल मंगल भवन उपलब्ध है, तो कार्यक्रम होटल में आयोजित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? यदि समाज के भवन में आयोजन होता और केवल नाममात्र का शुल्क रखा जाता, तो अधिक से अधिक महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो सकती थी।
समाज के कुछ सदस्यों का कहना है कि सेवा और सामाजिक आयोजनों का उद्देश्य लोगों को जोड़ना होना चाहिए, न कि आर्थिक बोझ बढ़ाना। उनका मानना है कि समाज के कार्यक्रम समाज के प्रत्येक वर्ग की पहुंच में होने चाहिए।
वहीं, यह भी कहा जा रहा है कि होटल, भोजन, साउंड और अन्य व्यवस्थाओं के कारण आयोजन की लागत बढ़ती है, इसलिए शुल्क रखा गया है। हालांकि समाज के कई सदस्य इस तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं हैं और शुल्क व्यवस्था पर पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या समाज के आयोजनों में भागीदारी आर्थिक क्षमता के आधार पर तय होगी, या सेवा और सामाजिक समरसता को प्राथमिकता दी जाएगी?
हमर संगवारी का सवाल:
क्या समाज के अपने भवन में कम खर्च में ऐसा आयोजन नहीं हो सकता था, जिससे हर महिला बिना आर्थिक बोझ के इसमें शामिल हो सके?
रायपुर में भी छत्तीसगढ़ महिला विंग के द्वारा सावन उत्सव का कार्यक्रम आयोजन किया जा रहा है इससे पहले भी किया गया है जो की कोई भी शुल्क नहीं रखा गया था ताकी अधिक से अधिक समाज के लोग इसमें जुड़ सके और कार्यक्रमों का लाभ ले सके पर हर बर बिलासपुर में ही ऐसा क्यों हो रहा है लगातर देखा जा रहा है संस्थाओं के द्वारा के द्वारा युवा विंग ओरअन्य समितियों के द्वारा हो रहे आयोजन शुल्क रखा जा रहा है रायपुर में कार्यक्रम नीशुल्क को हो रहे हैं सेवा हो रही है और यहां पर सेवा के नाम पर मेवा खाया जा रहा है आखिर क्यों?
सेवा के नाम पर बिजनेस क्यों?
क्या तनाशाह का आदेश है किया? या उनका असर पड़ चुका है की जो भी कार्यक्रम करो वसूली करो चंदा करो धंधा करो बिजनेस करो ?
पहले भी महिला उनके कार्यक्रम होते थे संधी जन्म चला में तोड़वा में कितने सुंदर कार्यक्रम होते थे अधिक से अधिक महिलाऐं शामिल होती थी और नाम मात्र का शुल्क रखा जता था क्या ऐसी व्यवस्था अब कियो नहीं हो सक्ति है, और समाज का इतना बड़ा भवन होने के बाद भी होटल में प्रोग्राम क्यों?
ऐसे और कई सरे सवाल हैं जिसका जवाब समाज के सामने देना चाहिए और रखना चाहिए, कोई भी अयोध्या कार्यक्रम हो अगर समाज के नाम लिया जा रहा है तो समाज हित में होना चाहीए न की अपने हित में
