
पानी,भीगती धरा गाती मधुर कहानी। “बरखा की बूंदें गिरती रही हैं, मेरे दिल की गहराइयों में।प्रेम की यादें ताजा होती हैं, बरखा की रिमझिम में खो गई हैं।बरखा की आवाज़ सुनाई देती है, बदरा छाए हैं सारे आकाश मेंहरियाली बिछी है हर ओर। कोयल गाती मीठे सुर में, नाचते मोर खुले मन से। सोंधी मिट्टी की वो खुशबू,छूकर जाए दिल की गहराई से। छत पे गिरती बूँदें टप-टप गाए, बावरा मन भी झूमता जाए। बचपन फिर से याद दिलाए,बच्चें कागज़ की नावें तैराएं। झूमकर सावन लाया प्रेम बहारें,भीग भीग गईं सूनी सूखी दीवारें।मन के कोने कोने भीग चले हैं, रकुछ सपने फिर से सजने लगे हैं।भीगे तनमन में बहार छाने लगे हैं।रिमझिम रिमझिम बरसे पानी,भीगती धरा गाती मधुर कहानी।।- सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” बिलासपर ,छत्तीसगढ
