संस्मरण

– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” बिलासपुर, छत्तीसगढ़ “कुछ रंग चेहरे से उतर जाते हैं, लेकिन कुछ रंग जीवन भर स्मृतियों में बसे रहते हैं। मेरी जिंदगी की रंग पंचमी भी कुछ ऐसी ही है, जो आज चार दशक बाद भी याद आते ही होंठों पर मुस्कान और मन में अनगिनत ठहाके बिखेर देती है। “यह संस्मरण मात्र एक कहानी नहीं, बल्कि 1985 की उस ‘शैतान मंडली’ की जन्मकुंडली है, जिसे आज मैं आप सबके सामने बिना किसी पर्दा-पोशी के खोल रहा हूँ। यह घटना वर्ष 1985 की है। हम सबने अभी-अभी मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी और कॉलेज जीवन की नई दहलीज़ पर कदम रखा था। युवावस्था का जोश, मित्रता की मिठास और जीवन के प्रति बेफिक्र उत्साह ,सब कुछ चरम पर था। होली तो पाँच दिन पहले पूरे उत्साह से खेली जा चुकी थी। हमें तनिक भी आभास नहीं था कि असली धमाल अभी बाकी है। सुबह के लगभग छह बजे होंगे। मैं गहरी नींद में था कि तभी मेरे बचपन के सबसे प्रिय मित्र संजू शुक्ल ने आकर मुझे झकझोर कर उठा दिया। उठते ही उसने मेरे चेहरे पर गुलाल मल दिया और जोर से बोला “अरे उठ! आज रंग पंचमी है!” बस, वही एक क्षण था और फिर पूरा दिन जैसे रंगों की नदी बनकर बह निकला। सुबह की दिनचर्या पूरी करते-करते हम मोहल्ले में निकल पड़े। रास्ते में एक-एक कर मित्र जुड़ते गए। देखते ही देखते हमारी टोली में मैं, संजू शुक्ला, सुभाष साहु, संतोष साहू, गुड्डू गुप्ता, मनोज ताम्रकार, पप्पू अग्रहरि, रमेश सारथी, मिठाई वाला गुड्डू, संतोष गुप्ता, प्रदीप और कई अन्य पचीस – तीस साथी शामिल हो चुके थे। सबके चेहरे रंगों से ऐसे रंग चुके थे कि पहचानना भी कठिन हो गया था। हमारा पहला पड़ाव था जूना बिलासपुर का उदई चौक। उन दिनों उदई चौक की रंग पंचमी पूरे शहर में प्रसिद्ध… बल्कि यूँ कहूँ कि थोड़ी-सी कुख्यात भी थी। लोग कहते थे – “यदि रंग पंचमी का असली रंग यानी मजा और सजा दोनों देखना हो तो उदई चौक जाओ।” वहाँ का वातावरण ही निराला होता था। परिचित हों या अपरिचित सब एक-दूसरे को रंग लगाते, गले मिलते और हँसी-मजाक में त्योहार मनाते। कोई किसी से बैर नहीं रखता था। उदई चौक जहाँ रंग ही नहीं, ‘सब कुछ’ बरसता था। हमारा अड्डा था – जूना बिलासपुर का उदई चौक। कहने को यह होली की पंचमी थी, लेकिन हकीकत में यह उस दौर की ‘कुख्यात’ रंग पंचमी थी। यहाँ का नियम बड़ा साफ़ था: रंग-गुलाल तो बस दिखावे के लिए थे, असली ‘हथियार’ तो धूल, गोबर, राख और अंडों की खेप थी। अजीब विडंबना थी—एक तरफ गोबर की बाल्टियाँ सिर पर उड़ेली जा रही थीं और दूसरी तरफ लोग गले लगकर प्रेम से ‘होली है!’ कह रहे थे। उस दौर की सामाजिकता का यही आलम था कि कोई किसी से बुरा नहीं मानता था। राहगीर डर के मारे कान पकड़ लेते थे कि “भैया, इस रास्ते से तो दोबारा नहीं गुजरेंगे”, लेकिन अंत में वे भी हंसी-मजाक में शामिल होकर अपनी नाराजगी भूल जाते थे। हाँ, शरारतें भी खूब होती थीं। रंग और गुलाल के साथ धूल, राख, कीचड़ जैसी चीजें भी लोग एक-दूसरे पर डाल देते थे। आज के समय में यह सब उचित नहीं माना जाएगा, पर उस दौर में लोग इसे त्योहार की मस्ती समझकर हँसते हुए सह भी लेते थे।हम भी उसी उमंग में बह चले। लगभग नौ बजे संजू न जाने कहाँ से एक रिक्शा ले आया। “चलो… सब बैठो… आज पूरे जूना बिलासपुर की सैर करेंगे।” हम सब रिक्शे पर सवार हो गए और संजू उसे खींचते हुए आगे बढ़ने लगा। रास्ते भर फाग, फिल्मी गीत, ठहाके, हँसी और रंगों की बरसात चलती रही। जिसे जानते थे उसे भी, जिसे नहीं जानते थे उसे भी रंग लगाकर रंग पंचमी की शुभकामनाएँ देते चलते। इसी बीच हम अपने मित्र प्रदीप राजगीर के घर पहुँचे। जनाब अभी तक गहरी नींद में थे। संजू की शरारती बुद्धि जाग उठी। उसने धीरे से उनके आधे चेहरे पर चटक पीला रंग और दूसरे हिस्से पर हरा गुलाल पोत दिया। कुछ क्षण बाद हमारी हँसी से उनकी नींद खुली। वे हैरान होकर बोले – “क्या हुआ…? तुम लोग हँस क्यों रहे हो?” किसी ने चुपचाप उनके सामने आईना रख दिया। आईने में अपना विचित्र एलियन जैसा चेहरा देखकर पहले तो वो स्वयं चौंक गया, फिर भागकर मुँह धोने लगा। थोड़ी-सी नाराज़गी भी जताई, लेकिन जब हमने गले लगाकर रंग पंचमी की शुभकामनाएँ दीं तो वो भी खिलखिलाकर हँस पड़ा। अब वो भी हमारी शैतानों की टोली का हिस्सा बन चुका था। यात्रा आगे बढ़ी। गाते-बजाते हम कर्बला मोहल्ले पहुँचे, जहाँ हमारे अन्य मित्र रहते थे। वहाँ भी रंग, गुलाल, हँसी और अपनापन खूब बिखरा। हमारी टोली का सबसे बड़ा आकर्षण था – संजू की शरारतें। कभी किसी मित्र के सिर पर मटर के छिलके डाल देता, कभी किसी को गले लगाकर रंगों से सराबोर कर देता। उसकी हरकतें हमें हँसाती भी थीं और कभी-कभी यह एहसास भी कराती थीं कि उत्साह में सीमा नहीं लाँघनी चाहिए। उस दिन उसकी कुछ शरारतें ऐसी भी हुईं जिन्हें आज याद करके लगता है कि वे अनुचित थीं। उस समय हम सब बचपने और उत्साह में हँसकर टाल गए, पर आज समझ आता है कि किसी की असुविधा या अपमान का कारण बनने वाली बात कभी नहीं करनी चाहिए। शायद उम्र का यही फर्क होता है – तब जो केवल शरारत लगती थी, आज वही सीख बन जाती है।अब हम सब आगे बढ़े कर्बला मोहल्ले से आगे की ओर। यहाँ संजू ने अपनी शरारत की सारी हदें पार कर दीं। उसने सड़क किनारे की नाली के अंदर हाथ डालकर उसके कीचड़ को ही निकाल लिया! वह दृश्य देखकर हम हंसे या रोएं, समझ नहीं आ रहा था। संजू ने वही कीचड़ राहगीरों के सिर पर फेर दिया। आज सोचता हूँ तो बदन सिहर उठता है, लेकिन उस अति-उत्साह में वह सब भी ‘मजा’ ही लगता था। बाद में हमने उसे डाँटा भी, पर वह तो अपनी ही धुन में था। इसके बाद हमारी टोली टिकरापारा, मामा-भांजा तालाब और आसपास के कई मोहल्लों तक पहुँच गई। जहाँ-जहाँ हमारे मित्र रहते थे, वहाँ-वहाँ जाकर उन्हें रंग लगाया, गले मिले और खूब हँसी-मजाक किया। पूरा दिन मानो रंगों का कारवाँ बन गया था। सड़कों पर गीत गूँज रहे थे। ठहाके गूँज रहे थे। और सबसे बड़ी बात – हर चेहरे पर मुस्कान थी। आज सोचता हूँ कि उस समय लोगों के दिल कितने विशाल थे। हमारी अनेक शरारतों को भी उन्होंने बच्चों की मस्ती समझकर क्षमा कर दिया। आज का समय बदल चुका है। परिस्थितियाँ बदल गई हैं। लोगों की संवेदनाएँ और सामाजिक मर्यादाएँ भी पहले से भिन्न हैं। इसलिए वैसी उन्मुक्त रंग पंचमी शायद अब देखने को न मिले। लेकिन मेरी स्मृतियों में वह दिन आज भी वैसा ही रंगीन है। आज जब कभी संजू से मुलाकात होती है या फोन पर बात होती है, तो रंग पंचमी का वह दिन अनायास ही बातचीत का हिस्सा बन जाता है। फिर हम दोनों एक-दूसरे को उन पुरानी शरारतों की याद दिलाते हैं और बरसों पुराने ठहाके आज भी वैसे ही गूँज उठते हैं। समय बहुत आगे निकल आया है…। चेहरे बदल गए…। मोहल्ले बदल गए… रिवाज़ भी बदल गए… लेकिन मित्रता के वे रंग आज भी नहीं फीके पड़े। शायद यही जीवन का सबसे सुंदर रंग है – स्मृतियों का रंग। और मेरी जिंदगी की रंग पंचमी… आज भी उसी रंग में भीगी हुई लबरेज है। – सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” बिलासपुर, छत्तीसगढ़
