
छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों से समाज के प्रतिनिधि बिलासपुर पहुँचे थे, जहाँ मुखी सम्मेलन का निमंत्रण दिया गया था। यह बैठक सेंट्रल पंचायत द्वारा आयोजित की गई थी, जिसमें सभी पंचायतों को आमंत्रित किया गया था। तथापि, एक पंचायत ने इस बैठक का बहिष्कार किया और अपना कोई प्रतिनिधि भी नहीं भेजा।यह निर्णय अनेक लोगों के लिए एक स्पष्ट संदेश के रूप में देखा गया कि यदि किसी कार्यप्रणाली या दिशा से असहमति हो, तो उसे खुले रूप में व्यक्त किया जा सकता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की यही विशेषता है कि उसमें सत्य बोलने और अपने विचार निर्भीकता से रखने का साहस बना रहे।बैठक में लंबे-लंबे भाषण हुए, परस्पर सम्मान भी प्रदर्शित किया गया, किंतु समाज से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर अपेक्षित गंभीर चर्चा और आत्ममंथन कम दिखाई दिया। केवल औपचारिक सम्मान और भाषणों से समाज का वास्तविक विकास संभव नहीं है। समाज का हित तभी सुनिश्चित होगा, जब नेतृत्व सत्य, पारदर्शिता और निष्पक्षता के आधार पर कार्य करेगा।यदि कोई व्यक्ति या संस्था अपने हित, पद या कुर्सी की रक्षा के लिए सत्य कहने से बचती है, तो समाज को यह गंभीरता से विचार करना चाहिए कि ऐसे नेतृत्व से भविष्य में क्या अपेक्षा की जा सकती है।आज आवश्यकता है कि समाज का प्रत्येक वर्ग जागरूक बने, सही और गलत का विवेकपूर्ण मूल्यांकन करे तथा ऐसे नेतृत्व को आगे बढ़ाए, जो निर्भीक होकर सत्य का साथ दे और समाजहित को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखे।सत्य ही समाज की सबसे बड़ी शक्ति है, और सत्य के मार्ग पर चलने वाला ही वास्तविक नेतृत्व का अधिकारी होता है।
