– सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
भारत केवल मंदिरों का देश नहीं है, यह आस्था का देश है। यहां तीर्थयात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मिक शांति, विश्वास और ईश्वर के प्रति समर्पण की यात्रा मानी जाती है। देश के बड़े-बड़े मंदिरों में प्रतिदिन हजारों-लाखों श्रद्धालु इसी विश्वास के साथ पहुंचते हैं कि कुछ क्षण भगवान के सम्मुख खड़े होकर अपने जीवन की पीड़ा, प्रार्थना और कृतज्ञता अर्पित कर सकें।
लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि अनेक प्रसिद्ध तीर्थस्थलों पर भीड़ और लंबी कतारों के बीच एक ऐसा समानांतर तंत्र दिखाई देने लगा है, जिसमें कुछ लोग श्रद्धालुओं को यह कहकर आकर्षित करते हैं—‘लाइन में क्यों खड़े हैं, जल्दी दर्शन करा देंगे।’ इसके बाद शुरू होती है सौदेबाजी—‘1100 लगेंगे’, ‘900 में करा देंगे’, ‘800 दे दीजिए।’ सवाल यह है कि आखिर यह व्यवस्था किसकी अनुमति से चल रही है?
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हर मंदिर में अधिकृत शुल्क वाली शीघ्र या विशेष दर्शन व्यवस्था को अवैध कहना उचित नहीं होगा। समस्या उस समय पैदा होती है, जब मंदिर की निर्धारित व्यवस्था के बाहर कोई व्यक्ति या बिचौलिया नकद पैसे लेकर दर्शन कराने का दावा करे और श्रद्धालु को यह पता ही न हो कि वह अधिकृत सेवा ले रहा है या ठगी का शिकार हो रहा है।
आस्था और मजबूरी के बीच बिचौलियों का बाजार
*मैंने स्वयं ऐसे अनुभव देखे और झेले हैं। कई श्रद्धालुओं ने भी इस प्रकार की शिकायतें मेरे सामने रखी हैं। हाल ही में मेरे एक मित्र ,जो गुजरात के गांधीधाम में रहते हैं, मनु भाई ने अपना अनुभव बताते हुए कहा कि वे द्वारकाधीश मंदिर पहुंचे। लंबी कतार देखकर उनकी हिम्मत जवाब देने लगी। उम्र के इस पड़ाव पर घंटों खड़े रहना उनके लिए कठिन था। इसी बीच एक व्यक्ति ने उनसे जल्दी दर्शन कराने के नाम पर 1100 रुपये मांगे और अंततः 800 रुपये में सौदा तय हुआ।* यह अनुभव केवल एक व्यक्ति की परेशानी मानकर नजरअंदाज कर देना आसान है, लेकिन यदि ऐसी शिकायतें अलग-अलग तीर्थस्थलों से लगातार सामने आती हैं तो प्रशासन के लिए यह गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए।
दिसंबर 2024 में द्वारका क्षेत्र में वायरल वीडियो को लेकर ऐसी खबरें भी सामने आई थीं, जिनमें एजेंटों द्वारा पैसे लेकर ‘VIP दर्शन’ कराने के दावे किए गए थे। एक रिपोर्ट में 1100 रुपये मांगने और बाद में रकम कम करने की बातचीत का भी उल्लेख था।इससे यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि यदि किसी मंदिर में अधिकृत दर्शन व्यवस्था है तो उसके नाम पर अनधिकृत बिचौलिये कैसे सक्रिय हो जाते हैं?
अदालतों ने भी उठाया है सवाल
यह समस्या केवल श्रद्धालुओं की शिकायतों तक सीमित नहीं है। तमिलनाडु में मंदिरों से संबंधित मामलों में मद्रास उच्च न्यायालय को भी अवैध वसूली और बिचौलियों की भूमिका पर हस्तक्षेप करना पड़ा है।अगस्त 2025 में मद्रास उच्च न्यायालय ने तिरुचेंदूर सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर में श्रद्धालुओं से कम प्रतीक्षा समय में दर्शन कराने के नाम पर अनधिकृत व्यक्तियों द्वारा पैसे लेने के मामले में कार्रवाई के निर्देश दिए थे। अदालत ने पुलिस और मंदिर प्रशासन को ऐसे बिचौलियों के विरुद्ध कार्रवाई करने को कहा। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि तमिलनाडु के मंदिरों के संदर्भ में न्यायालय ने स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए कि मंदिरों में बिचौलियों द्वारा श्रद्धालुओं से धन वसूलने की अनुमति नहीं होनी चाहिए तथा मंदिर की सेवाओं के लिए भुगतान मंदिर प्रशासन के माध्यम से और उचित रसीद के साथ होना चाहिए। अर्थात समस्या काल्पनिक नहीं है। देश के कुछ मंदिरों में ऐसी अनियमितताओं को लेकर प्रशासन और न्यायपालिका को भी हस्तक्षेप करना पड़ा है।
‘कैश फॉर दर्शन’ पर कार्रवाई का उदाहरण
मई 2026 में तिरुचेंदूर मंदिर में निरीक्षण के दौरान एक पुजारी द्वारा दर्शन के लिए कथित रूप से 1,000 रुपये मांगने का मामला सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार उस समय मंदिर प्रशासन ने भीड़ के दौरान समान और निःशुल्क दर्शन सुनिश्चित करने के लिए भुगतान आधारित दर्शन व्यवस्था रोक रखी थी। मामले की जांच शुरू की गई। जुलाई 2026 में तमिलनाडु के हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के मंत्री ने भी मंदिरों में अवैध धन वसूली और अन्य अनियमितताओं की शिकायतें प्रमाण सहित देने की अपील की थी। इससे एक बात साफ होती है ,समस्या को नकारने के बजाय उसे स्वीकार कर उसके विरुद्ध पारदर्शी व्यवस्था बनाना ही समाधान है।
काशी में भी सामने आया कथित दर्शन ठगी का मामला
फरवरी 2026 में वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में कथित रूप से पुजारी बनकर श्रद्धालुओं को जल्दी दर्शन कराने के नाम पर पैसे लेने वाले आठ लोगों की गिरफ्तारी की खबर सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार श्रद्धालुओं की शिकायतों और CCTV के आधार पर पुलिस ने कार्रवाई की। यह उदाहरण बताता है कि जब मंदिरों में भीड़ बढ़ती है और श्रद्धालु जल्दी दर्शन की इच्छा में असहाय महसूस करता है, तब ठगी करने वालों के लिए एक पूरा अवसर पैदा हो जाता है।
असली प्रश्न ‘VIP’ का है
इस पूरे प्रकरण का दूसरा और शायद अधिक संवेदनशील पहलू है वीआईपी दर्शन। यदि कोई मंदिर प्रशासन अत्यधिक भीड़ को नियंत्रित करने के लिए विधिवत, पारदर्शी और सभी के लिए उपलब्ध विशेष दर्शन टिकट रखता है, तो उस व्यवस्था पर अलग से बहस हो सकती है। लेकिन प्रश्न तब उठता है जब किसी व्यक्ति की राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक हैसियत के कारण उसे सामान्य श्रद्धालुओं से अलग प्राथमिकता मिलती है। भगवान के सामने मनुष्य की पहचान उसका पद, पैसा या प्रभाव नहीं होनी चाहिए। जो व्यक्ति पांच घंटे कतार में खड़ा है और जिसके पीछे हजारों अन्य श्रद्धालु खड़े हैं, उसके सामने अचानक कोई प्रभावशाली व्यक्ति आता है और उसे कुछ ही मिनटों में दर्शन करा दिया जाता है, तो सामान्य श्रद्धालु के मन में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न पैदा होता है – क्या भगवान के दरबार में भी आदमी की कीमत उसके पद और पहुंच से तय होगी? हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय की ओर से वीआईपी दर्शन की व्यवस्था पर भी गंभीर टिप्पणी सामने आई और इसे भेदभावपूर्ण बताया गया। यह टिप्पणी केवल किसी एक मंदिर की व्यवस्था पर नहीं, बल्कि हमारी धार्मिक व्यवस्था के सामने खड़े एक बड़े नैतिक प्रश्न की ओर संकेत करती है।
मंदिर श्रद्धा का केंद्र है, सुविधा का बाजार नहीं
मंदिरों में व्यवस्थाओं के लिए शुल्क लिया जाना अपने आप में गलत नहीं है। मंदिरों का रखरखाव, सुरक्षा, स्वच्छता, प्रसाद, विशेष पूजा और अन्य व्यवस्थाएं धन मांगती हैं। लेकिन शुल्क और अवैध वसूली के बीच स्पष्ट सीमा होना जरूरी है।
यदि कोई सेवा अधिकृत है तो-
– उसका शुल्क मंदिर प्रशासन तय करे।
– शुल्क स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हो।
– ऑनलाइन अथवा अधिकृत काउंटर से टिकट मिले।
– श्रद्धालु को रसीद मिले।
– किसी पुजारी या निजी व्यक्ति को मनमाना पैसा लेने की अनुमति न हो।
– किसी भी प्रकार के ‘बिना रसीद दर्शन’ पर तत्काल कार्रवाई हो।
मंदिर परिसर के बाहर और भीतर स्पष्ट बोर्ड लगे हों – ‘किसी व्यक्ति को दर्शन कराने के नाम पर नकद राशि न दें। केवल अधिकृत काउंटर/वेबसाइट से ही सेवा प्राप्त करें।’ तमिलनाडु के संदर्भ में न्यायालय द्वारा भी मंदिर सेवाओं को प्रशासन के अधिकृत माध्यम से देने और बिचौलियों को रोकने पर जोर दिया जा चुका है। उम्रदराज और दिव्यांग श्रद्धालुओं के लिए अलग व्यवस्था हो।
इस समस्या का मानवीय समाधान भी संभव है।
हर मंदिर में बुजुर्गों, दिव्यांगों, गर्भवती महिलाओं और गंभीर रूप से अस्वस्थ श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क या अत्यंत नाममात्र शुल्क की सुव्यवस्थित दर्शन सुविधा होनी चाहिए। मेरे मित्र की समस्या का समाधान किसी बिचौलिए को 800 रुपये देना नहीं होना चाहिए था। समाधान यह होना चाहिए कि मंदिर प्रशासन स्वयं ऐसे श्रद्धालुओं के लिए सम्मानजनक और पारदर्शी व्यवस्था उपलब्ध कराए। भगवान के दर्शन किसी की मजबूरी का सौदा नहीं बन सकते।
जनप्रतिनिधि और प्रशासन की जिम्मेदारी
* सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि मंदिरों के आसपास बिचौलिये खुलेआम श्रद्धालुओं से पैसे मांगते हैं तो स्थानीय प्रशासन को इसकी जानकारी क्यों नहीं होती?
* क्या वहां CCTV नहीं हैं?
* क्या पुलिस और मंदिर सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी नहीं होती?
* क्या मंदिर प्रशासन को शिकायतें नहीं मिलतीं?
* क्या किसी भी व्यक्ति को मंदिर के नाम पर पैसा लेने का अधिकार है?
* और यदि नहीं है, तो ऐसे लोगों पर लगातार कार्रवाई क्यों नहीं होती?
जनप्रतिनिधियों की भी जिम्मेदारी है कि वे मंदिरों में जाकर केवल पूजा-अर्चना ही न करें, बल्कि आम श्रद्धालुओं की समस्याएं भी देखें। जिस व्यक्ति ने उन्हें जनप्रतिनिधि बनाया है, उसके लिए मंदिर की कतार में सम्मानजनक और समान दर्शन की व्यवस्था सुनिश्चित करना भी जनसेवा का हिस्सा है।
समाधान कठिन नहीं है
इस समस्या को समाप्त करने के लिए बड़े-बड़े भाषणों की नहीं, कुछ ठोस कदमों की आवश्यकता है।
पहला – प्रत्येक मंदिर में अधिकृत दर्शन शुल्क और सभी सेवाओं की सूची सार्वजनिक की जाए।
दूसरा – मंदिर परिसर में ‘नो टाउट जोन’ घोषित किया जाए।
तीसरा – बिचौलियों की पहचान के लिए CCTV निगरानी और सादे कपड़ों में निगरानी दल लगाए जाएं।
चौथा- दर्शन के नाम पर अवैध वसूली की शिकायत के लिए 24 घंटे हेल्पलाइन और ऑनलाइन शिकायत व्यवस्था हो।
पांचवां – शिकायत सिद्ध होने पर केवल बिचौलिए ही नहीं, बल्कि यदि किसी कर्मचारी या अधिकृत व्यक्ति की मिलीभगत मिले तो उसके विरुद्ध भी कठोर कार्रवाई हो।
छठा – वीआईपी अथवा विशेष दर्शन की व्यवस्था हो तो उसके स्पष्ट नियम सार्वजनिक किए जाएं और उसका दुरुपयोग रोकने के लिए रिकॉर्ड रखा जाए।
सातवां – बुजुर्ग, दिव्यांग और असहाय श्रद्धालुओं के लिए अलग मानवीय व्यवस्था बनाई जाए।
आठवां- मंदिरों की दर्शन व्यवस्था का समय-समय पर स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट कराया जाए।
आस्था को बाजार बनने से बचाना होगा
भारत के मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र हैं। यहां आने वाला श्रद्धालु केवल ग्राहक नहीं होता। वह अपनी श्रद्धा लेकर आता है। उसकी आंखों में भगवान के दर्शन की इच्छा होती है और हृदय में विश्वास। इस विश्वास को यदि कोई व्यक्ति भीड़, मजबूरी और आस्था का फायदा उठाकर पैसे में बदलता है तो यह केवल आर्थिक अनियमितता नहीं, बल्कि आस्था के साथ विश्वासघात है।
भगवान के दरबार में कोई गरीब इसलिए पीछे न रह जाए कि वह 1100 रुपये नहीं दे सकता और कोई प्रभावशाली व्यक्ति इसलिए आगे न निकल जाए कि उसके पास पहुंच है। यही एक आदर्श धार्मिक व्यवस्था की पहचान होनी चाहिए।मंदिरों में भीड़ होगी, कतारें होंगी, व्यवस्थागत कठिनाइयां भी होंगी। लेकिन समाधान ‘पैसे दो और लाइन से निकलो’ नहीं हो सकता।समाधान है – बेहतर प्रबंधन, पारदर्शिता, तकनीक, जवाबदेही और समानता।
अंततः प्रश्न केवल इतना है…?
क्या भगवान के घर में भी दर्शन का अधिकार जेब की क्षमता और व्यक्ति की पहुंच से तय होगा? यदि इसका उत्तर ‘नहीं’ है, तो फिर मंदिर प्रशासन, शासन, पुलिस और जनप्रतिनिधियों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि भगवान के दरबार में आम श्रद्धालु और खास श्रद्धालु के बीच आस्था की कोई दीवार न खड़ी हो।क्योंकि मंदिर में पहुंचने वाला हर व्यक्ति पहले भक्त है वीआइपी बाद में। और भगवान के सामने तो केवल भक्त होना ही पर्याप्त होना चाहिए।
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
