दिल्ली में दो महिला पत्रकारों के साथ थाने में मारपीट की घटना ने पत्रकारिता जगत को झकझोर दिया है। घटना को लेकर स्वतंत्र पत्रकारों में खासा आक्रोश देखा जा रहा है। सबसे गंभीर सवाल यही है कि यदि कोई पत्रकार अपना काम करते हुए सवाल पूछता है, सच सामने लाने की कोशिश करता है या किसी व्यवस्था की कमियों को उजागर करता है, तो क्या उसे प्रताड़ना का सामना करना पड़ेगा?
पत्रकार लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में समाज और सत्ता के बीच संवाद की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। उनकी भूमिका केवल खबर लिखने तक सीमित नहीं, बल्कि उन सवालों को सामने लाना भी है जिनका जवाब जनता जानना चाहती है। ऐसे में थाने जैसी जगह पर महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार और मारपीट का आरोप बेहद चिंताजनक है।
इस मामले को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया द्वारा संज्ञान में लिया जाना बताता है कि मामला केवल दो पत्रकारों तक सीमित नहीं, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़ा व्यापक प्रश्न है।
जरूरत इस बात की है कि घटना की निष्पक्ष जांच हो, दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई हो और पत्रकारों को भयमुक्त होकर काम करने का वातावरण मिले। सवाल पूछना अपराध नहीं, लोकतंत्र की पहचान है।
