“विघ्नहर्ता गणेशाय, भ्रष्टनाशाय ते नमः।
दुष्टतन्त्रं भञ्जयित्वा, सत्यधर्मं स्थापय॥
लोभमोहग्रस्तं सर्वं, छिन्धि छिन्धि गजानन।
न्यायस्य रक्षकं भूत्वा, भ्रष्टाचारं दह प्रभो॥”
हे विघ्नहर्ता गणेश, आपको नमन।
भ्रष्ट तंत्र का नाश करने वाले प्रभु, दुष्ट व्यवस्था को चूर-चूर कर सत्य और धर्म की स्थापना करो। लोभ और मोह में डूबे भ्रष्ट तंत्र को समाप्त करो गजानन। न्याय के रक्षक बनकर भ्रष्टाचार को जला दो प्रभु।
गणपति बप्पा मोरया!
कभी-कभी कोई तस्वीर महज तस्वीर नहीं होती। वह अपने भीतर एक पूरा इतिहास समेटे होती है। उसमें बीते हुए समय की यादें भी होती हैं, संघर्ष की कहानी भी और आने वाले समय के लिए एक सवाल भी।
बिलासपुर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष रहे स्वर्गीय शशिकांत के कार्यकाल के दौरान की यह तस्वीर भी कुछ ऐसी ही कहानी कहती है।
आज जब पत्रकारों की जमीन और उससे जुड़े अधिकारों को लेकर एक नया संकट खड़ा हुआ है, तब वर्षों पुरानी यह तस्वीर अचानक बहुत कुछ याद दिलाती है। याद दिलाती है उस दौर की, जब पत्रकारों के लिए सिर्फ बातें नहीं हुई थीं, बल्कि जमीन पर काम हुआ था।
स्वर्गीय शशिकांत के प्रयासों का ही परिणाम था कि डेढ़ सौ से अधिक पत्रकारों को 10 एकड़ से अधिक जमीन उपलब्ध हो सकी। यह जमीन केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं थी। इसके पीछे पत्रकारों के भविष्य का सपना था। अपने परिवार के लिए एक सुरक्षित आशियाने का सपना था। वर्षों तक कलम चलाने वाले उन पत्रकारों की उम्मीद थी, जिन्होंने समाज के हर वर्ग के अधिकारों और समस्याओं को अपनी खबरों के माध्यम से आवाज दी।
इसीलिए आज जब उस जमीन से जुड़ा कोई संकट सामने आता है तो स्वाभाविक रूप से उस शख्स की याद आती है, जिसने इस पूरी पहल को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भाऊ… आज आप हमारे बीच नहीं हैं।
लेकिन आपकी कोशिशों की निशानी आज भी मौजूद है।
आपने जिन पत्रकारों के लिए प्रयास किया, जिनके भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में कदम बढ़ाया, उनके सामने यदि आज कोई नई विघ्न-बाधा खड़ी होती है तो शायद इस गणेश चतुर्थी के अवसर पर आपसे यही कहा जा सकता है—
“भाऊ, आप नहीं हैं… लेकिन आपके प्रयास आज भी हमारे साथ हैं। अब अगर इस जमीन के रास्ते में कोई विघ्न आती है, तो आप ऊपर से देख लेना…”
यह सिर्फ भावुकता नहीं है। यह उन प्रयासों के प्रति सम्मान है, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता।
आज गणपति बप्पा के सामने प्रार्थना भी इसलिए कुछ अलग है। विघ्नहर्ता से सिर्फ व्यक्तिगत सुख-समृद्धि नहीं मांगी जा रही, बल्कि उस व्यवस्था के लिए न्याय की मांग है, जिसमें पत्रकारों को मिली जमीन का अधिकार सुरक्षित रहे।
विघ्नहर्ता से यही प्रार्थना है—
जहां कहीं लोभ हो, वहां विवेक पैदा हो।
जहां कहीं मोह हो, वहां सत्य की जीत हो।
जहां कहीं अन्याय हो, वहां न्याय का रास्ता खुले।
जहां कहीं व्यवस्था में खामी हो, वहां उसे सुधारने का साहस पैदा हो।
और यदि किसी ने पत्रकारों के अधिकारों के रास्ते में विघ्न खड़ा करने की कोशिश की है, तो हे गजानन, उस विघ्न को दूर करने की शक्ति दो।
क्योंकि यह सवाल केवल जमीन का नहीं है।
यह सवाल उन पत्रकारों के विश्वास का है, जिनके नाम पर यह पहल आगे बढ़ी।
यह सवाल उन परिवारों के भविष्य का है, जिन्होंने अपने आशियाने का सपना देखा।
यह सवाल उस संघर्ष की विरासत का है, जिसे स्वर्गीय शशिकांत जैसे लोगों ने आगे बढ़ाया।
10 एकड़ से अधिक जमीन और डेढ़ सौ से अधिक पत्रकारों का जुड़ाव अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। इसके पीछे वर्षों की मेहनत, प्रयास और उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। इसलिए इस विरासत को किसी भी परिस्थिति में हल्के में नहीं लिया जा सकता।
आज जरूरत है कि भावनाओं के साथ-साथ तथ्यों और अधिकारों की भी मजबूती से रक्षा हो। जो जमीन पत्रकारों के हित के लिए मिली, उससे जुड़े हर पहलू को पारदर्शिता के साथ सामने रखा जाए और यदि कोई कानूनी, प्रशासनिक या अन्य बाधा है तो उसका समाधान नियम और न्याय के रास्ते से निकाला जाए।
गणपति बप्पा विघ्नहर्ता हैं।
इसलिए इस बार उनकी आरती में एक प्रार्थना और जोड़ दीजिए—
“हे गजानन! पत्रकारों के हित में वर्षों पहले जो दीप जलाया गया था, उसकी लौ बुझने मत देना।
जिन्होंने प्रयास किया, उनकी मेहनत व्यर्थ मत जाने देना।
जिन्हें उम्मीद मिली, उनकी उम्मीद मत टूटने देना।
और यदि इस रास्ते में कोई विघ्न खड़ा हो तो उसे दूर कर देना।”
स्वर्गीय शशिकांत आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन किसी व्यक्ति की असली पहचान उसके जाने के बाद उसके कामों से होती है।
आप नहीं हैं भाऊ… मगर आपकी बनाई राह आज भी मौजूद है।
अब उस राह पर कोई विघ्न आए, तो शायद गणपति बप्पा से यही कहना होगा—
“बप्पा, इस बार विघ्न सिर्फ हरना नहीं है… न्याय भी करना है।”
गणपति बप्पा मोरया!
मंगल मूर्ति मोरया!
