विजय की ✒ कलम
संपादकीय — विजय दुसेजा
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में सेवा के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर देशभर में कार्यक्रम आयोजित किए गए। कार्यकर्ताओं ने इसे उत्सव के रूप में मनाया और जनता को भी इन आयोजनों से जोड़ने का प्रयास किया गया। इसे “सेवा के 25 साल” का नाम दिया गया।
लेकिन इसी के साथ एक सवाल भी खड़ा होता है—सेवा आखिर किसे कहते हैं?
अगर सेवा बिना किसी पद, सत्ता या स्वार्थ के की गई हो, तो निश्चित रूप से वह प्रशंसा के योग्य है। लेकिन यदि सेवा पद और सत्ता में रहते हुए की गई है, तो क्या उसमें जनसेवा के साथ राजनीतिक जिम्मेदारी और जवाबदेही भी शामिल नहीं होनी चाहिए?
अक्सर कहा जाता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने एक दिन की भी छुट्टी नहीं ली और लगातार 16-18 घंटे काम किया। यदि यह बात सही है तो निश्चित रूप से मेहनत और सक्रियता का विषय है। लेकिन जनता यह भी पूछ सकती है कि देश में महंगाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतें, खराब सड़कें, भ्रष्टाचार के आरोप और सरकारी व्यवस्थाओं की कमियां आखिर किस दिशा की ओर इशारा करती हैं?
बारिश ने कई स्थानों पर सड़कों और निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल खड़े किए हैं। अरबों रुपये की लागत से बने या सुधारे गए रास्तों के क्षतिग्रस्त होने की खबरें सामने आती हैं तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है—क्या विकास केवल कागज और विज्ञापनों में दिखाई देना चाहिए या उसकी गुणवत्ता जमीन पर भी नजर आनी चाहिए?
“न खाऊंगा, न खाने दूंगा” जैसे नारों के बीच जब भ्रष्टाचार के आरोप सामने आते हैं तो जवाबदेही का सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। आरोप सही हैं या गलत, इसका फैसला जांच और संबंधित संस्थाओं को करना चाहिए, लेकिन जनता को यह जानने का अधिकार जरूर है कि उसके पैसे का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है।
जनता दीपक जलाए या अपने सवाल पूछे?
त्योहार और उत्सव खुशी के प्रतीक होते हैं। जनता से घरों के बाहर दीपक जलाने की अपील भी की गई। लेकिन दूसरी तरफ वही जनता महंगाई, बारिश, पेट्रोल-डीजल के दाम, खाद्य वस्तुओं की कीमतों और रोजमर्रा की परेशानियों से जूझ रही हो तो उसके मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या केवल दीपक जलाने से खुशहाली आ जाएगी?
हर प्रदेश में लाखों दीपक जलाए गए। यह खुशी के दीपक थे या राजनीतिक उत्साह का हिस्सा—इसका फैसला जनता स्वयं करे। लेकिन एक बात तय है कि दीपक में डाला गया तेल किसी न किसी की मेहनत की कमाई से आता है।
जनता को केवल उत्सव नहीं चाहिए। उसे सस्ती रोटी, सस्ता और सुरक्षित मकान, बेहतर शिक्षा, अच्छे अस्पताल, रोजगार और स्वच्छ वातावरण चाहिए।
विज्ञापनों में यदि ये सुविधाएं दिखाई देती हैं, तो सवाल यह है कि क्या वही सुविधाएं आम आदमी को धरातल पर भी उपलब्ध हैं?
नेताओं के लिए भी वही व्यवस्था क्यों नहीं?
एक और सवाल जनता के बीच लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है—कितने बड़े नेता, विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री स्वयं सरकारी स्कूलों में पढ़े हैं या उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं? कितने जनप्रतिनिधि सरकारी अस्पतालों में अपने परिवार का इलाज करवाते हैं?
अगर सरकारी स्कूल और सरकारी अस्पताल वास्तव में इतने अच्छे हैं, तो फिर समाज के प्रभावशाली वर्ग का भरोसा भी उन पर उसी स्तर का क्यों नहीं दिखाई देता?
गरीब और आदिवासी परिवारों के घर जाकर भोजन करना अच्छी बात हो सकती है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या उस परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी भी बदली? फोटो खिंचवाने से ज्यादा जरूरी है कि उस घर में रोज दो वक्त का भोजन, बच्चों को अच्छी शिक्षा और परिवार को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिले।
बाढ़, जंगल और विकास की असली परीक्षा
हर वर्ष देश के कई हिस्सों में बाढ़ और जलभराव से भारी परेशानी होती है। वर्षों से नदी जोड़ो परियोजनाओं और जल प्रबंधन की बातें होती रही हैं, लेकिन आज भी अनेक क्षेत्रों में बारिश आते ही वही समस्याएं सामने आ जाती हैं।
दूसरी तरफ विकास के नाम पर पहाड़ों की कटाई, जंगलों का नुकसान और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध इस्तेमाल पर भी सवाल उठते रहे हैं।
विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास किस काम का जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति और पर्यावरण का संकट बढ़ा दे?
लोकतंत्र केवल दिखावे का विषय नहीं
लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव और उत्सव नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है—सवाल पूछने की आजादी, असहमति का सम्मान, जवाबदेही और व्यवस्था में पारदर्शिता।
यदि जनता सरकार से सवाल पूछती है तो उसे विरोध नहीं, लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। और अगर देश में लोकतंत्र मजबूत है, तो क्या राजनीतिक दलों के भीतर भी उतना ही लोकतांत्रिक संवाद और असहमति के लिए जगह होनी चाहिए?
सवाल पूछना किसी व्यक्ति या पार्टी का विरोध करना नहीं है। सवाल पूछना जनता का अधिकार है।
सच्चा दीपक तब जलेगा…
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को जन्मदिन और सेवा के वर्षों के लिए शुभकामनाएं। ईश्वर उन्हें दीर्घायु प्रदान करे और देश की सेवा करने की शक्ति दे।
लेकिन देश की असली खुशी तब होगी जब गरीब के घर में चूल्हा बिना चिंता के जलेगा, जब महंगाई उसकी कमर नहीं तोड़ेगी, जब बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलेगी, जब सरकारी अस्पतालों पर आम आदमी का भरोसा बढ़ेगा, जब भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यवस्था प्रभावी होगी और जब विकास का लाभ आखिरी व्यक्ति तक पहुंचेगा।
सच्चा दीपक उस दिन जलेगा, जब गरीब के चेहरे पर मजबूरी नहीं, संतोष की मुस्कान होगी।
दिखावे की खुशी और हजारों-लाखों दीपक जलाने से देश की तरक्की का प्रमाण नहीं मिलता। तरक्की तब मानी जाएगी जब आम आदमी की जिंदगी वास्तव में बेहतर होगी।
सेवा के 25 वर्ष का सबसे बड़ा प्रमाण भी यही होगा कि सत्ता और पद से आगे बढ़कर जनता के जीवन में कितना वास्तविक बदलाव आया।
क्योंकि सच्चा सेवक वही है जो जनता के सवालों को सुने, जवाबदेही स्वीकार करे और जिस व्यवस्था के नियम दूसरों के लिए बनाए जाते हैं, उन नियमों का पालन स्वयं भी करने का प्रयास करे।
तभी सेवा का अर्थ वास्तविक होगा,
तभी लोकतंत्र मजबूत होगा,
तभी महंगाई के बीच भी जनता के घर में सच्ची खुशी का दीपक जलेगा।
