– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
भारी बारिश के बाद जब नदियां उफान पर होती हैं, तब उनका शांत और सुंदर स्वरूप देखते ही देखते भयावह हो जाता है। तेज बहाव, ऊंची उठती लहरें और पानी का अनियंत्रित वेग इंसान ही नहीं, वन्यजीवों के लिए भी जिंदगी और मौत के बीच की परीक्षा बन जाता है। ऐसे ही कठिन और भयावह हालात में नदी के तेज बहाव में बहते एक नन्हे हाथी के शावक को बचाने के लिए कुछ मछुआरों ने जिस साहस, संवेदनशीलता और मानवीय करुणा का परिचय दिया, वह केवल एक जीव को बचाने की घटना नहीं, बल्कि इंसानियत की एक जीवंत तस्वीर है।पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में गाजोलडोबा तीस्ता नदी बैराज और अपलचंद जंगल के पास यह हृदय विदारक और “अंत भला तो सब भला” उक्ति को चरितार्थ करती हुई इंसानियत की ऐसी मिसाल पेश की गई जो अन्यत्र दुर्लभ है। घटना तब घटी जब हाथियों का एक झुंड तीस्ता नदी पार कर रहा था, तभी बैराज से पानी छोड़े जाने के कारण तेज बहाव में महज 4 दिन का एक नवजात हाथी का बच्चा अपने झुंड से बिछड़कर करीब 3 से 4 किलोमीटर तक बह गया। यह देखकर स्थानीय मछुआरों (नॉर्थ बंगाल फिशरमैन फोरम के सदस्यों) ने अपनी जान जोखिम में डालकर नाव से उसका पीछा किया और उसे सुरक्षित बाहर निकाला। इसके बाद वन विभाग की मदद से उसे उसकी मां से सफलतापूर्वक मिला दिया गया।
बताया गया कि भारी बारिश के कारण नदी का जलस्तर अचानक बढ़ गया था। तेज धारा में हाथियों का एक शावक बह गया और देखते ही देखते वह मुख्य धारा से दूर निकलता चला गया। नन्हा शावक पानी के वेग से संघर्ष कर रहा था। उसके लिए यह केवल नदी पार करने की चुनौती नहीं थी, बल्कि हर गुजरता पल उसके जीवन के लिए खतरा बन रहा था।
ऐसे समय में सामान्यतः कोई भी व्यक्ति अपनी जान जोखिम में डालने से पहले कई बार सोचता। आखिर उफनती नदी में उतरना अपने आप में मौत को चुनौती देने जैसा था। लेकिन वहां मौजूद मछुआरों ने उस नन्हे जीव की बेबसी को देखा और शायद उस क्षण उनके भीतर का इंसान उनके भीतर के डर से बड़ा हो गया। पांच मछुआरे अपनी जान की परवाह किए बिना तेज बहाव में उतर पड़े। उनका उद्देश्य केवल एक था, किसी भी तरह उस मासूम हाथी के बच्चे को सुरक्षित बचाना।
बताया गया कि शावक नदी की धारा में करीब चार किलोमीटर तक बह गया था। उसके बचाव के लिए मछुआरों ने लगातार प्रयास किया। करीब दो घंटे से अधिक चले प्रयासों के बाद वन विभाग और स्थानीय लोगों की मदद से आखिरकार उस नन्हे हाथी को सुरक्षित उसकी मां तक पहुंचा दिया गया। यह क्षण निश्चित रूप से उन सभी के लिए भावुक कर देने वाला रहा होगा- एक मां अपने बच्चे से मिल रही थी और कुछ इंसान बिना किसी स्वार्थ के उस मिलन के साक्षी बन रहे थे।
यह घटना हमें एक बहुत बड़ा सवाल भी देती है – क्या इंसानियत की सीमा केवल इंसानों तक है? नहीं। सच्ची करुणा वह है, जिसमें सामने वाले की भाषा, जाति, प्रजाति या पहचान नहीं देखी जाती। सामने केवल एक जीवन दिखाई देता है और उसे बचाने की इच्छा जागती है। नदी में बहता वह हाथी का शावक बोल नहीं सकता था। वह अपनी पीड़ा शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता था। वह किसी से मदद की गुहार नहीं लगा सकता था। लेकिन उसकी आंखों और संघर्ष को देखकर मछुआरों ने उसकी पीड़ा को समझ लिया।
यही संवेदना मनुष्य को मनुष्य बनाती है। आज जब दुनिया में विकास की दौड़ के बीच जंगल सिकुड़ रहे हैं, नदियां प्रदूषित हो रही हैं और वन्यजीव अपने प्राकृतिक आवास के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब ऐसी घटनाएं हमें प्रकृति के साथ अपने रिश्ते पर पुनर्विचार करने का अवसर देती हैं। वन्यजीव हमारे अस्तित्व से अलग कोई दुनिया नहीं हैं। वे उसी प्रकृति की कड़ी हैं, जिसका हिस्सा हम भी हैं। हाथी केवल जंगल का एक विशाल जीव नहीं है। वह जंगल के पारिस्थितिक संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जहां हाथियों के झुंड विचरण करते हैं, वहां वे बीजों के प्रसार से लेकर वनस्पतियों के प्राकृतिक चक्र तक अनेक भूमिकाएं निभाते हैं। इसलिए एक हाथी के शावक का बचना केवल एक जीव का बचना नहीं, बल्कि प्रकृति की एक महत्वपूर्ण कड़ी का सुरक्षित रहना भी है। लेकिन इस घटना का सबसे खूबसूरत पक्ष शायद यह है कि यहां किसी पुरस्कार, प्रशंसा या प्रचार की अपेक्षा नहीं थी। तेज बहाव में उतरने वाले मछुआरों के सामने उस समय कोई कैमरा नहीं, कोई मंच नहीं और कोई सम्मान नहीं था। उनके सामने केवल एक संकट में फंड़ी जिंदगी थी।
और उन्होंने जिंदगी को चुना। यही मानवता का सबसे सरल और सबसे सुंदर अर्थ है। हम अक्सर बड़ी-बड़ी इमारतों, तकनीक, आर्थिक विकास और आधुनिक सुविधाओं को सभ्यता की पहचान मानते हैं। लेकिन किसी असहाय जीव को संकट में देखकर उसके लिए अपनी सुरक्षा की चिंता किए बिना आगे बढ़ जाना सभ्यता का उससे कहीं अधिक गहरा परिचय है। नदी की तेज धार उस दिन केवल एक हाथी के शावक की परीक्षा नहीं ले रही थी। वह शायद हमारे भीतर की संवेदनशीलता की भी परीक्षा ले रही थी। मछुआरों ने उस परीक्षा में साहस और करुणा का परिचय दिया। आज जरूरत है कि इस घटना को केवल सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली एक तस्वीर या वीडियो के रूप में न देखा जाए। इसे प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी और जीव-जंतुओं के प्रति हमारी संवेदना के संदेश के रूप में देखा जाए।
क्योंकि जंगलों में रहने वाले पशु हमसे मदद मांगने हमारे दरवाजे तक नहीं आ सकते। नदी में बहता कोई शावक सहायता के लिए आवाज नहीं लगा सकता। घायल पक्षी अपनी पीड़ा लिख नहीं सकता। लेकिन उनकी खामोशी को समझना ही तो संवेदनशील समाज की पहचान है। उस दिन पांच मछुआरे नदी में उतरे थे, लेकिन बाहर निकलकर केवल एक हाथी का बच्चा ही नहीं आया – उसके साथ मानवता की एक खूबसूरत तस्वीर भी किनारे आई। उन साहसी मछुआरों को नमन, जिन्होंने यह साबित किया कि इंसानियत की कोई जाति, धर्म, भाषा या प्रजाति नहीं होती। जहां किसी जीवन को बचाने के लिए एक संवेदनशील हृदय धड़कता है, वहीं से सच्ची मानवता की शुरुआत होती है।
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
– वरिष्ठ पत्रकार /लेखक/अधिवक्ता
