
राजयोग ध्यान शिविर के दूसरे व तीसरे दिन आत्म-पहचान, मन-बुद्धि-संस्कार परिचय के साथ मेडिटेशन का कराया अभ्यास
बिलासपुर, राज किशोर नगर । सुख और शांति की तलाश में मनुष्य अक्सर बाहरी दुनिया में भटकता है, जबकि इनके मूल गुण आत्मा के भीतर ही हैं। स्वयं की पहचान और श्रेष्ठ संस्कारों को अपनाकर जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।
यह बात बीके गायत्री बहन ने ब्रह्माकुमारीज़ के सात दिवसीय राजयोग ध्यान शिविर के दूसरे व तीसरे दिन कही। उन्होंने साधकों को आत्मा के मूल गुणों की जानकारी देने के साथ मेडिटेशन का अभ्यास कराया।
आत्मा के पांच संस्कारों से समझाया व्यक्तित्व का आधार
राज किशोर नगर स्थित शिव-अनुराग भवन में बीके गायत्री बहन ने बताया कि व्यक्ति के स्वभाव और व्यवहार पर संस्कारों का प्रभाव पड़ता है। आत्मा के पांच प्रकार के संस्कारों में मूल, पूर्व जन्म, खानदानी, संग तथा दृढ़ता और इच्छाशक्ति से जुड़े संस्कार शामिल हैं। उन्होंने सुख, शांति, आनंद, प्रेम, पवित्रता, ज्ञान और शक्ति को आत्मा के सात मूल गुण बताते हुए श्रेष्ठ संगति, सकारात्मक चिंतन और दृढ़ संकल्प अपनाने की प्रेरणा दी।
कस्तूरी मृग की तरह बाहर न खोजें सुख-शांति
कस्तूरी मृग का उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार हिरण अपनी नाभि में मौजूद कस्तूरी की सुगंध बाहर खोजता है, उसी प्रकार मनुष्य भी सुख-शांति को बाहरी वस्तुओं में तलाशता रहता है। आत्मा के मूल गुणों को पहचानकर और राजयोग मेडिटेशन का नियमित अभ्यास करके आंतरिक शांति का अनुभव किया जा सकता है।
विपरीत परिस्थितियों में भी मन को स्थिर रखने का संदेश
मेडिटेशन के दौरान कांच की विशाल इमारत का दृष्टांत देकर समझाया गया कि बाहर आंधी-तूफान होने पर भी इमारत के भीतर बैठा व्यक्ति सुरक्षित रह सकता है। इसी तरह जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी मन को शांत और स्थिर रखा जा सकता है। साधकों को स्वयं को शांत स्वरूप आत्मा के रूप में अनुभव करने का अभ्यास कराया गया।
बीके गायत्री बहन ने सकारात्मक, नकारात्मक, आवश्यक और व्यर्थ विचारों के अंतर को समझाते हुए बताया कि नकारात्मक एवं व्यर्थ चिंतन से तनाव बढ़ सकता है। स्वामी विवेकानंद के शिकागो धर्म सम्मेलन के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने आत्मविश्वास, इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प का महत्व भी समझाया।
