
हार्डीकला में 30 हजार से 96 हजार टन क्षमता विस्तार का प्रस्ताव, EIA-EMP रिपोर्ट, प्रदूषण नियंत्रण, भूजल और औद्योगिक कचरे के प्रबंधन पर उठे सवाल
अनिल शुक्ला की रिपोर्ट
बिलासपुर। जिले के हार्डीकला स्थित गीतांजलि इस्पात एंड पावर प्राइवेट लिमिटेड अपने स्पंज आयरन संयंत्र की उत्पादन क्षमता 30 हजार मीट्रिक टन सालाना से बढ़ाकर 96 हजार मीट्रिक टन करने की तैयारी में है। 29 मार्च 2026 को प्रकाशित परियोजना संबंधी जानकारी के अनुसार इस विस्तार से उत्पादन क्षमता में 220 प्रतिशत की वृद्धि प्रस्तावित है। परियोजना को उस समय पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया में विचाराधीन बताया गया था। ऐसे में कंपनी के प्रस्तावित विस्तार के साथ उसकी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट (EIA) और पर्यावरण प्रबंधन योजना (EMP) की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।
करीब दो दशक से संचालित इस औद्योगिक इकाई के प्रस्तावित विस्तार ने कई अहम सवाल खड़े किए हैं। कंपनी की मौजूदा उत्पादन क्षमता, पर्यावरणीय अनुपालन, चिमनी से निकलने वाले उत्सर्जन, औद्योगिक अपशिष्ट के निस्तारण और भूजल उपयोग की वास्तविक स्थिति क्या है? क्या पुराने संयंत्र के संचालन का स्वतंत्र पर्यावरणीय ऑडिट कराया गया है? क्या पहले से निर्धारित पर्यावरणीय शर्तों का नियमित पालन हुआ है? इन सवालों के जवाब सामने आए बिना विस्तार के संभावित प्रभावों का समुचित आकलन मुश्किल है।
EIA रिपोर्ट बताएगी विस्तार से पर्यावरण पर कितना पड़ेगा असर
EIA यानी पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट में यह अध्ययन किया जाता है कि किसी उद्योग की उत्पादन क्षमता बढ़ने से आसपास के पर्यावरण, आबादी, कृषि भूमि, जलस्रोत और जनस्वास्थ्य पर क्या संभावित प्रभाव पड़ सकते हैं। गीतांजलि इस्पात के प्रस्तावित विस्तार के संदर्भ में यह देखना जरूरी होगा कि उत्पादन 30 हजार से बढ़कर 96 हजार मीट्रिक टन सालाना होने पर कोयले और लौह अयस्क की खपत कितनी बढ़ेगी, चिमनियों से उत्सर्जन का अनुमान क्या है, पानी की अतिरिक्त जरूरत कितनी होगी और भारी वाहनों की आवाजाही में कितनी वृद्धि हो सकती है।
EIA रिपोर्ट में आसपास के क्षेत्र की मौजूदा वायु गुणवत्ता, जलस्रोतों की स्थिति, भूजल और मिट्टी की स्थिति का आधारभूत आकलन भी महत्वपूर्ण होता है। इसलिए यह जानना जरूरी है कि रिपोर्ट में हार्डीकला और आसपास के गांवों की पर्यावरणीय स्थिति को किस तरह दर्ज किया गया है और संभावित प्रभावों को लेकर क्या निष्कर्ष दिए गए हैं।
EMP में बताए गए उपायों का जमीन पर पालन कितना हुआ?
EMP यानी पर्यावरण प्रबंधन योजना में संभावित प्रदूषण और पर्यावरणीय नुकसान को रोकने या कम करने के उपायों का विवरण होता है। इसमें धूल और धुएं को नियंत्रित करने के उपकरण, औद्योगिक अपशिष्ट का सुरक्षित निस्तारण, जल संरक्षण, वृक्षारोपण, ग्रीन बेल्ट और प्रदूषण की नियमित निगरानी जैसी व्यवस्थाएं शामिल हो सकती हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि कंपनी ने अपने मौजूदा संयंत्र के संचालन के दौरान पर्यावरण प्रबंधन के लिए जो उपाय प्रस्तावित किए थे, उनका कितना पालन किया गया? प्रदूषण नियंत्रण उपकरण नियमित रूप से काम कर रहे हैं या नहीं? चिमनी उत्सर्जन और आसपास की वायु गुणवत्ता की जांच कितनी नियमित हुई? औद्योगिक कचरे के संग्रहण और निस्तारण का रिकॉर्ड क्या है? इन बिंदुओं की जांच के बिना केवल नई EMP में किए गए वादों के आधार पर विस्तार को पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित मान लेना उचित नहीं होगा।
बढ़ेगा उत्पादन तो प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी भी बढ़ेगी
उत्पादन क्षमता में तीन गुना से अधिक वृद्धि होने पर कच्चे माल, कोयले, पानी और परिवहन की जरूरत भी बढ़ सकती है। ऐसे में कंपनी की मौजूदा प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था की क्षमता और विस्तार के बाद प्रस्तावित अतिरिक्त व्यवस्था का आकलन जरूरी है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि नई उत्पादन क्षमता के अनुरूप प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों में क्या बदलाव किए जाएंगे और उनकी निगरानी किस एजेंसी द्वारा की जाएगी।
औद्योगिक कचरे के निस्तारण पर निगरानी जरूरी
स्पंज आयरन उत्पादन के दौरान निकलने वाली राख, डोलोचार, डस्ट और अन्य औद्योगिक अपशिष्ट के वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था कितनी प्रभावी है, इसकी जांच जरूरी है। कंपनी के पास इन अपशिष्टों की मात्रा, संग्रहण, परिवहन और अंतिम निस्तारण का अद्यतन रिकॉर्ड होना चाहिए। इसके साथ ही आसपास के भूजल, मिट्टी और वायु गुणवत्ता का स्वतंत्र परीक्षण कराकर रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग भी महत्वपूर्ण है।
भूजल और स्थानीय संसाधनों पर कितना बढ़ेगा दबाव?
उत्पादन बढ़ने के साथ पानी की खपत में संभावित वृद्धि को लेकर भी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। कंपनी प्रतिदिन कितना पानी इस्तेमाल कर रही है, उसका स्रोत क्या है और भूजल दोहन की अनुमति कितनी मात्रा के लिए मिली है? विस्तार के बाद अतिरिक्त पानी की व्यवस्था कहां से होगी? इन सवालों का जवाब EIA और EMP में दिए गए आंकड़ों तथा संबंधित विभागों की अनुमति से मिलना चाहिए। आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों और कृषि पर इसके संभावित प्रभावों का भी आकलन जरूरी है।
स्थानीय युवाओं को कितना मिला रोजगार?
करीब दो दशक से संचालित संयंत्र से हार्डीकला और आसपास के गांवों के कितने युवाओं को स्थायी रोजगार मिला, कितने लोग ठेका श्रमिक के रूप में काम कर रहे हैं और श्रमिकों को सुरक्षा, ईएसआई तथा पीएफ जैसी सुविधाएं किस स्तर पर मिल रही हैं, इसका सार्वजनिक हिसाब सामने आना चाहिए। प्रस्तावित विस्तार के बाद कितने नए रोजगार सृजित होंगे और उनमें स्थानीय युवाओं को कितनी प्राथमिकता मिलेगी, यह भी कंपनी को स्पष्ट करना चाहिए। ग्रामीण विकास और सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के तहत खर्च की गई राशि तथा कराए गए कार्यों का विवरण भी सार्वजनिक होना चाहिए।
पर्यावरण संरक्षण मंडल और प्रशासन की भूमिका पर नजर
छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल और जिला प्रशासन को कंपनी के पुराने संचालन रिकॉर्ड, निरीक्षण रिपोर्ट, प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों की स्थिति, वर्तमान संचालन सहमति (CTO) और पर्यावरणीय शर्तों के अनुपालन की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। प्रस्तावित विस्तार की EIA और EMP रिपोर्ट, पर्यावरणीय स्वीकृति की वर्तमान स्थिति तथा यदि जनसुनवाई हुई है तो उसमें उठाई गई आपत्तियों और उनके जवाबों का विवरण भी सामने आना चाहिए।
सवाल यह नहीं है कि किसी उद्योग का विस्तार होना चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि औद्योगिक विकास के साथ स्थानीय लोगों का स्वास्थ्य, पर्यावरण और रोजगार भी सुरक्षित रहेंगे या नहीं। नई परियोजना के लिए EIA में किए गए आकलन और EMP में किए गए वादों के साथ पुराने संयंत्र के वास्तविक पर्यावरणीय प्रदर्शन की तुलना भी जरूरी है। कंपनी और संबंधित विभागों को इन सवालों पर तथ्यात्मक जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि प्रस्तावित विस्तार को लेकर ग्रामीणों और आम नागरिकों की आशंकाओं का समाधान हो सके।
