लेखराज मोटवानी/रीवा (म.प्र.) : भगवान श्रीचन्द्र जी की महिमा का गुणगान करते हुए अखिल भारतीय सिंन्धु सन्त समाज ट्रस्ट के राष्ट्रीय महामन्त्री स्वामी हंसदास जी ने बताया- भगवान् श्रीचन्द्र जी के छोटे भाई लखमीचन्द सद्गृहस्थ तो थे ही, उन्हें क्षत्रिय-धर्म के नाते शिकार का भी बहुत शौक था। समय-समय पर वह सेवकों को साथ लेकर टाहली साहब के पीछे वाले जंगल में शिकार खेलने चले जाते थे। एक दिन लखमीचन्द शिकार खेलकर जंगल से लौट रहे थे कि भगवान् श्रीचन्द्र से वहीं भेंट हो गई। लखमीचन्द ने कई मृग मारे थे, खरगोश भी उनका निशाना बने थे और ये सब मृत पशु उठाए उनके सेवक भी पीछे-पीछे चले आ रहे थे।
लखमीचन्द ने भगवान् श्रीचन्द्र जी के चरण स्पर्श किए, लेकिन आज भगवान् उतनी प्रसन्नता के साथ भाई को आशीष नहीं दे पाए। मृत पशुओं को देखकर भगवान् के कोमल भावों को आघात लगा। वे दुःखी होकर लखमीचन्द को समझाने लगे कि निरपराध, निर्दोष, निरीह पशुओं की इस प्रकार हत्या करना उचित नहीं है। पिता जी का उपदेश इस सबके अनुकूल नहीं। केवल राजवर्ग के लोगों को ही चल-संधान में पारंगत होने के लिए आखेट की छूट है।
जो लोग माँसाहार, जीभ के स्वाद और केवल क्रीड़ा की खातिर जानवरों का वध करते हैं, उन्हें परमात्मा के दरबार में अपने अनुचित कर्मों का लेखा देना पड़ता है। तुम इस प्रकार से जीव-हत्या करते हो, अतः तुम्हें भी हिसाब चुकाना पड़ेगा। लखमीचन्द भाई की बातों से परेशान हो उठा। क्षमा माँगते हुए बोला, ‘मुझसे भूल हुई। मैं तो क्रीड़ा वश ही यह सब करता रहा, मुझे आध्यात्मिक रहस्यों का गहन ज्ञान न था। मैं प्रायश्चित करने को तैयार हूं और अभी धर्मराज के दरबार में अपने पापों का हिसाब देने के लिए प्रस्थान करता हूँ।’
इतना कहकर लखमीचन्द घर चले गए और भगवान् श्रीचन्द्र जी अपने धूने पर ध्यानस्थ हो गए। लखमीचन्द ने घर जाकर अपनी पत्नी-बच्चे को साथ लेकर धर्मराज की अदालत में जाने की तैयारी की और तीनों घोड़े की पीठ पर सवार होकर आकाश मार्ग से यमपुर के लिए चल निकले। यह घटना वैसाख शुक्ला तीज सं. 1586 वि. की है। घोड़ा धूने के ऊपर से जब उड़ता हुआ गुजरा तो अकस्मात् भगवान् श्रीचन्द्र को ध्यान आया कि यदि लखमीचन्द, धर्मचन्द को भी साथ ही यमपुर ले जाएंगे तो गुरु नानकदेव का वेदीवंश तो समाप्त हो जाएगा।
अतः वेदी वंश-संरक्षण के लिए बाबा श्रीचन्द्र जी ने अपने आसन पर बैठे-बैठे अपने दाहिने बाजू को चार योजन लम्बा करके आकाश मार्ग से जाते हुए घोड़े की पीठ पर से धर्मचन्द को उतार लिया।लखमीचन्द सपत्नीक यमपुरी चले गए, किन्तु उनका सुपुत्र धर्मचन्द अपने ताऊ के पास रह गया, इसी धर्मचन्द से गुरु नानक देव जी का वेदी-वंश’ आलोकित हुआ और परवान चढ़ा। वेदी वंश संरक्षण में भगवान् श्रीचन्द्र ने जो भूमिका निभाई उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए वेदी-वंश के लोग आज तक विवाह-पूर्व अपने बेटों को भगवान् श्रीचन्द्र के वेश से विभूषित करते हैं।
भावी दूल्हा उदासीन वेश धारण करता है, उदासीन निर्वाण महापुरुष धूना प्रज्वलित कर भगवान श्रीचन्द्र जी की मात्रा-शास्त्र वाणी का पाठ करते हैं। वेदी आज भी भगवान् श्रीचन्द्र को अपना गुरु मानते हैं।(श्रौतमुनि चरितामृत प्रवाह ७ तरंग ५ पृ. १६८)