एक शाम राधा – माधव के नाम सत्संग कीर्तन का आयोजन अर्चना व्यवहार बलराम टॉकीज के पीछे सिंधी कॉलोनी बिलासपुर में किया गया बाबा आनंद राम दरबार चक्करभाटा के संत सांई कृष्ण दास जी के द्वारा सत्संग और कीर्तन की अमृत वर्षा की गई सत्संग की शुरुआत रात्रि 7:00 बजे हुई समापन 9:00 बजे हुआ
सत्संग आरंभ भगवान श्री कृष्ण एवं बाबा भगत राम जी के फोटो पर पुष्प अर्पण करके किया गया सांई कृष्ण दास जी ने अपनी अमृतवाणी में सत्संग में कई प्रसंग सुनाएं जिसमें एक प्रसंग था महाभारत के समय का एक बार कुंती अपने कशं मैं आराम करती रहती है तब भगवान श्री कृष्णा उनसे मिलने आते हैं और वह कहती है कृष्ण से आप मुझे कुछ देना चाहते हैं तो और ज्यादा दुख तकलीफ दीजिए भगवान श्री कृष्ण मुस्कुराते हुए कहते हैं बुआ आप यह क्या बोल रही है लोग तो सुख शांति स्मृति धन दौलत मांगते हैं और आप दुख और परेशानी मांग रही हो आप भुल रही हो तब कुंती कहती है
है कृष्ण जब सुख आता है तो लोग प्रभु का नाम भूल जाते हैं और दुख आता है तब उसे याद करते हैं तो मैं वह चीज क्यों मांगू जिसमें मैं आपको भूल जाऊं मुझे वह चीज चाहिए जो मैं हमेशा आपको याद करती रहूं एक शरण भी आपको न भूलूं हर सांस में सिर्फ आपका ही नाम हो यह होती सच्ची भक्ति वह भगवान के प्रति भाव पर आज के भक्त क्या कभी भगवान से कहेंगे कि हमें दुख दो
कोई नहीं कहेगा
ऐसा भाव नहीं है हमारा जिस दिन ऐसा भाव आ जाएगा आपको दुख में ही सुख नजर आएगा
इस अवसर पर एक ज्ञानवर्धक कथा सुनाई
एक संत हुआ करता था नागार्जुन जो भिक्षा मांग कर अपनी आजीविका चलता था प्रतिदिन मिट्टी के बर्तन में भिक्षा मांगने जाता था जिसके घर में लेने जाता था वह बड़ा पैसे वाला संपन्न परिवार था एक दिन उस परिवार की महिला आरती ने कहा बाबा आप प्रतिदिन आते हो भींक्षा लेने और मिट्टी का बर्तन लेकर आते हो हमें अच्छा नहीं लगता है भगवान ने हमें सब कुछ दिया है हम कुछ सेवा करना चाहते हैं आज से आप इस मिट्टी के बर्तन में भिक्षा ना मांगा करें इसके बदले में इस सोने का बर्तन ले जाइए इसमें भींक्षा मांगे
उस संत ने कहा मुझे इसकी जरूरत नहीं है मैं इसमें खुश हूं पर वह महिला नहीं मानी आखिर में संत ने कहा ठीक है मैं आपकी बात मान लेता हूं यह सोने का बर्तन रख लेता हूं पर इस मिट्टी के बर्तन को आप अपने पास सुरक्षित रखिए मुझे ईसकी जरूरत फिर पड़ेगी व संत सोने के बर्तन को अपनी झोली में रखकर अपने घर की ओर जंगल को रवाना हुआ रास्ते में एक चोर ने देख लिया कि इस फकीर के झोली में सोने का बर्तन है और उसके पीछे-पीछे आने लगा संत समझ गया था कि यह चोर है और इस सोने के बर्तन के लिए ही आ रहा है संत अपनी झोपड़ी में पहुंचा और बर्तन को निकाल कर रख दिया और दरवाजा खुला छोड़ दिया ताकि वह चोर आए ओर उस बर्तन को लेकर जाए
संत भगवान की भक्ति में लीन हो गया भगवान का नाम जपने लगा दो घंटे गुजर गए
चोल बाहर खड़े होकर सब देखता रहा कब संत सोए तो मैं इस बर्तन को चोरी करु संत समझ गए थे जब तक मैं सोऊंगा नहीं यह बर्तन लेने चोर आएगा नहीं वह उठा और बर्तन को खिड़की से बाहर फेंक दिया चोर देखकर हैरान हो गया उसने जाकर बर्तन उठाया और अंदर गया और संत से कहा आपने यह बर्तन बाहर क्यों फेंका संत ने कहा तुम्हें जो चाहिए वह तुम्हें मिल गया है तुम जाओ यहाँ से चोर ने कहा मुझे यह जानना जरूर है कि आपने सोने का बर्तन बाहर फेंका है तो इसका मतलब इससे भी महंगी चीज आपके पास है मुझे वह चीज क्या है बताएं तब संत मुस्कराकर बोले हां इससे भी महंगी और कीमती चीज मेरे पास है और वह है भगवान का नाम भगवान की भक्ति तब वह चोर संत के चरणों में गिर पड़ता है वह बर्तन रखकर उससे माफी मांगता है और कहता है मुझे भी वह भक्ति चाहिए मुझे भी वह भगवान का नाम चाहिए इस कथा का तात्पर्य है कि जिस वस्तु के पीछे हम भाग रहे हैं वह कोई काम की नहीं और जो हमारे काम की है उसे हम छोड़ देते हैं
संत और इंसान में यही फर्क है संत सब कुछ त्याग करके भगवान को पाते हैं और हम लोग सब कुछ पाकर भगवान को छोड़ देते हैं आखिर में अपनी अमृतवाणी में कई भक्ति भरे भजन गाएं इसे सुनकर भक्त जन झूम उठे अरदास की गई पल्लव पाया गया और प्रसाद वितरण किया गया इस अवसर पर आए हुए सभी साध संगत के लिए प्रभु का प्रसाद रूपी आम भंडारे का आयोजन किया गया बड़ी संख्या मे भक्त जनो ने भंडारा ग्रहण किया आज के इस कार्यक्रम को सफल बनाने में बाबा आनंद राम सेवा समिति बिलासपुर चक्करभाटा के सभी सेवादारियों का विशेष सहयोग रहा आज के इस आयोजन का सोशल मीडिया के माध्यम से लाइव प्रसारण किया गया हजारों की संख्या में घर बैठे भक्त जनों ने आज के सत्संग का आनंद लिया इस सत्संग में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में लोग बिलासपुर चक्करभाटा से पहुंचे थे