पितृ दिवस पर विशेष . . .✍
पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः।
पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वाः प्रीयन्ति देवता।।
यह श्ल़ोक, संस्कृत में है जिसका अर्थ है, पिता ही धर्म है, पिता ही स्वर्ग है और पिता ही सबसे श्रेष्ठ तपस्या है। पिता के प्रसन्न हो जाने पर सारे देवता प्रसन्न हो जाते है।
यह श्ल़ोक पिता के महत्व और उनके प्रति सम्मान को दर्शाता है।
पिता धर्म है:-
पिता, धर्म के मार्ग पर चलने और अपने बच्चों को सही शिक्षा देने का प्रतीक है।
पिता स्वर्ग है:-
पिता, अपने बच्चों के लिए स्वर्ग के समान है, जो उन्हें सुख और सुरक्षा प्रदान करता है।
पिता ही परम तप है:-
पिता, अपने बच्चों के लिए जो त्याग और बलिदान करता है, वह परम तपस्या के समान है।
पिता के प्रसन्न होने पर सभी देवता प्रसन्न होते हैं:-
जब पिता प्रसन्न होते हैं, तो इसका मतलब है कि घर में सब कुछ ठीक है और परिवार खुश है।
यह श्ल़ोक, पिता के प्रति सम्मान और प्रेम व्यक्त करने का एक सुंदर तरीका है।
सम्पूर्ण योनियों में प्राणियों की मूल प्रकृति तो माता है और बीजस्थापन करने वाला पिता है।
पसीने में माँ और पिता धूप में जलता है,
तब कहीं जाकर एक बच्चा लाड़ प्यार से पलता है,
👨🏻💼 पिता एक ऐसी हस्ती है जो खुद तंग रहकर अपने बच्चों की खुशियों के लिए जान तक न्योछावर कर देता है। वो पिता ही है जो भगवान से दुआ करता है कि मेरे बच्चे मुझसे चार कदम आगे बढ़े। उन्होंने मुझसे ज्यादा कामयाबी मिले। माँ का मुकाम तो बेशक़ अपनी जगह है, पर पिता का भी कुछ कम नही।
पिता का सिर्फ इतना ही कहना कि ‘चिंता मत करना, मैं हूं न बेटा’ हर मुश्किल व हर परेशानी का समाधान है। शायद ही ऐसी हिम्मत आपको कोई और दे सके।
👩💼 माँ के कदमों मे स्वर्ग है, तो पिता स्वर्ग का दरवाजा है। अगर दरवाज़ा ना ख़ुला तो अंदर कैसे जाओगे.? गर्मी हो या सर्दी अपने बच्चों की रोज़ी रोटी की फ़िक्र में परेशान रहता है। ना कोई पिता के जैसा प्यार दे सकता है और ना कर सकता है अपने बच्चों से। याद रख़े सूरज गर्म ज़रुर होता है मगर डूब जाए तो अंधेरा छा जाता है।
अगर इस दुनिया में आपको नि:स्वार्थ कोई प्रेम करता है तो वो सिर्फ आपके माता-पिता ही होते हैं। इसलिए यह हर बच्चे का कर्तव्य है कि किसी भी परिस्थिति में अपने माता-पिता को जाने-अनजाने में दुखी न करें। आपको जीवन में हर चीज दुबारा मिल जाएगी लेकिन माता-पिता दोबारा नहीं मिलेंगे।
पिता के लिए सिर्फ एक ही दिन क्यों, हर दिन उनका है। उनसे ही तो बच्चों का जीवन है। उनसे ही तो बच्चों की खुशियां हैं। उनके इस प्यार को शब्दों में पिरोना बहुत मुश्किल है।
पिता के लिए क्या लिखूं, उनकी ही लिखावट हूं मैं। पिता का हाथ अगर सर पर रहे तो हम जीवन की हर मुश्किल परिस्थितियों से पार पा सकते हैं। उनसे मिली हिम्मत आपको जीवन के हर पड़ाव पर शक्त़ि देती है।
यूँ तो सनातनी सभ्यता में माता-पिता का दर्जा ईश्व़र से भी ऊँचा है। लेकिन सांस्कृतिक सहिष्णुता और हमारी समृद्ध सभ्यता में हर प्रकार के उत्सव हेतु स्थान है और पिता तो स्वयं में उत्सव हैं। अतः लौकिक-यात्रा के तमाम रास्तों पर अपने मज़बूत कंधों का सहारा देने और मनुष्यता का पाठ पढ़ाने वाले पिताजी को इस विशेष अवसर पर असंख्य प्रणाम।
जीवन के हर पथ पर धैर्य और संयम के साथ परिवार की सुरक्षा व आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए समर्पित सभी पिताओं को नमन करते हुए, आओ आज सब मिलकर उस अज़ीम हस्ती के लिए प्रार्थना करें … हे भगवान दुनिया के सभी पिताओं को अच्छी सेहत और तंदरुस्ती देना। उनकी तमाम परेशानियों को दूर करना और उन्हें हमेशा खुश रख़ना।
संकलन एवं साभार प्रस्तुति:-
इन्दू गोधवानी, रायपुर