रचना
डॉ . क्षमा पाटले “अनंत”
(अंतर्राष्ट्रीय साहित्यकार एवं समाज सेवी) जांजगीर चांपा, छत्तीसगढ़
छलकते अश्क आंखों के कोहिनूर बन जाये ,
जहां को दूं खुशी ऐसी मेरी तकदीर बन जाये ।
किसी के ख्वाब पूरे हो मुझे दिल से खुशी होगी ,
अंधेरा दूर हो जग से मेरी कोशिश यही होगी।
क़यामत की रात आये तो मैं चट्टान बन जाऊं,
जिगर में चोट खाकर भी मैं फौलाद बन पाऊं!
औरत की तमन्ना तो मुट्ठी में सिमट जाती है ,
दिल जख्मी है लेकिन मैं वफा की खान बन जाऊं ।
दरिया दिल है मेरा ये जमाने को नहीं दिखता ,
फर्ज की खातिर कभी वफादारी नहीं बिकता !
गर ज़हर है जिंदगी मैं हंसकर पी लूंगी ,
किसी की मायूस जिंदगी में आस ज्योति ही बनूंगी।
दिली तमन्ना है जहां को कोई सौगात दे जाऊं
जर्रे-जर्रे में मोहब्बत की ओस बनकर मैं खुद बिखर जाऊं।