बिलासपुर:+ तीज त्योहार *प्राकृतिक शीतलता का पर्व है थदड़ी* हर धर्म समाज वर्ग की अपनी अपनी सांस्कृतिक धार्मिक परम्पराएं , मान्यताएं व उन पर आधारित तीज त्योहार होते हैं इनमें कई रीतियां परमपराएं सुनी सुनाई या फिर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अनुसरण की हुई होती है इसी तारतम्य में विश्व की सबसे पुरानी व विकसित तथा समृद्ध सिंधु सभ्यता के वाशिंदे जो कि पारम्परिक रूप से प्रकृति के उपासक हैं इसलिए हर सिंधी व्रत उपवास तीज त्योहार प्रकृति को समर्पित या उसके प्रति आभार प्रकट किए हुए होता है ~ आज 15 अगस्त को सिंधी समाज द्वारा मनाया जाने वाला पर्व *थदड़ी* भी इन्हीं मान्यताओं में से एक है जिसमें एक मान्यता है कि पुराने समय में प्राकृतिक प्रकोप यथा चेचक आदि से बचाव के लिए माता शीतला की पूजा अर्चना कर उसे प्रसन्न करना

`~ इस पूजा अर्चना के लिए थदड़ी के एक दिन पूर्व संध्या को ग्रहणीया स्नान ध्यान कर चौका चूल्हा साफ सुथरा कर मीठी कोकी , चेहरी कोकी और नाना प्रकार के जो व्यंजन बनाती है उसे दूसरे दिन माता जी की विधिवत पूजा करने के पश्चात् पूरा परिवार दिन भर इस ठंडे भोजन को ही ग्रहण करता है इस दिन चूल्हा जलाना पूर्णतः प्रतिबंधित है हमारे सयाने बूढे बुजुर्ग बताते हैं कि अविभाजित भारत के सिंध प्रांत में इस दिन होटल ढाबे आदि के पट तक बंद रहते थे इस मान्यता का दूसरा पहलू यह है कि वर्षा ऋतु में आई प्राकृतिक शीतलता से जनित जीव जंतु , किट पतंगे या अन्य कारणों से उत्पन्न रोगों से अपने व परिजनों की सुरक्षा हेतु माता से प्रार्थना की जाती थी इसी पूजा पर आधारित सिंधी गीत के स्वर अक्सर हमें सुनाई दे जाते हैं जिसके बोल हैं *ठार माता ठार पहिंजे बचणन खे ठार ,,,,,,,,,,,,*।
सतराम जेठमलानी
संयोजक सेवा एक नई पहल।