विजय की कलम
बिलासपुर :- यह दुनिया आजकल व्यापार पर टिकी है, धंधे पर टिकी है ऐसा अब महसूस होने लगा है ,
क्योंकि विश्व के जितने बड़े देशों को देखो शुरुआत अमेरिका से देखो वहां के राष्ट्रपति भी बिजनेस कर रहे हैं, धंधा कर रहे हैं क्योंकि एक बिजनेसमैन चीन को देखो, रुस को देखो, जिस देश को देखो वहां पर वही हाल है अब बारी आती है अपने देश के, अपने प्रदेश के और अपने शहर के, अपने समाज की अभी तक तो सिर्फ देश प्रदेश शहर की बात हो रही थी पर अब समाज में भी बिजनेस चालू हो चुका है धर्म के नाम पर, संस्कृति के नाम पर, भगवान के नाम पर इमोशनली ब्लैकमेल करके धंधा, बिजनेस किया जा रहा है.
जब से सोशल मीडिया आया है यह बिजनेस काफी बढ़ सा गया है करोड़ों, अरबों रुपए का हो गया है .
जिधर देखो वही हाल है मेरी मुर्गी एक टांग वाली बात हो गई है.

मैंने पहले भी कहा है कि कोई बिजनेसमैन अगर कोई समाज की कुर्सी पर बैठता है तो वह बिजनेस ही करेगा तो उसकी सोच वैसे ही होगी जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की है वह एक बड़े बिजनेसमैन है और राष्ट्रपति कुर्सी पर बैठे हैं तो वह बिजनेस कर रहे हैं इस तरह हमारे समाज में भी कुछ धन्ना सेठ लोग इस पर बैठे हैं
और जो बड़ा कार्य करते हैं उसके पीछे अपना फायदा देखते हैं,अपना हित, अपने लोगों का हित पहले सोचते हैं और देखते हैं और करते भी हैं समाज हित को तो भूल ही गए हैं निम्न वर्ग, मध्यम वर्ग को तो अछूत मानते हैं आप लोग सोचते होंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं इसके पीछे भी बड़ा विजन है. सिंध का मेला करते हैं तो ₹1000 पास कीमत रखते हैं ,क्रिकेट का आयोजन करते हैं तो उसमें भी भारी भरकम कमाई करते हैं ,शामिल होने वाली टीम को मोटी रकम पड़ती है?
चेटीचंड का जुलूस निकालते हैं तो उसमें भी चंदा करते हैं और मोटी रकम बचती है कोई मोटिवेशन कार्यक्रम करेंगे किसी वीआईपी को बुलाएंगे तो उसके लिए भी पास रखेंगे और उसका शुल्क वासुलेंगे डांडिया (जो कि हमारी संस्कृति ही नहीं है) उसका आयोजन किया तो उसका भी ₹ 1500 शुल्क एक पास का रखा गया और अब देखने को, सुनने में आ रहा है कि भगवान झूलेलाल के नाम से पूज्य बहिराणा साहिब निकाले जा रहे है अच्छी बात है निकालने चाहिए पर इसमें भी धंधा सोच लिया है ?
और इस धार्मिक आयोजन को भी व्यापार बना दिया?
और ₹ 500 प्रत्येक बहराणा साहिब निकालने वालों के लिए शुल्क रखा गया है ?
पुरे सोशल मीडिया में प्रचार प्रसार कर रहे हैं ?
समझ में नहीं आ रहा है कि तुम समाज सेवा कर रहे हो, धार्मिक आयोजन कर रहे हो, सांस्कृतिक कार्यक्रम कर रहे हो, या बिजनेस धंधा कर रहे हो ?
ऐसा लगता है कि आयोजन सेंट्रल पंचायत या उनकी सहयोगी संस्थाओं का न होकर किसी बड़े बिजनेसमैन का निजी आयोजन हो गया है ?
जिसके आगे पूज्य आता है
क्या वे ऐसे बिजनेसमैन वाला आयोजन करते हैं?
एक बार पहले भी
सेंट्रल पंचायत के अध्यक्ष को डांडिया फ्री करने का ज्ञापन दिया था कि इस बार डांडिया प्रोग्राम को फ्री किया जाए लेकिन उसका जवाब आज तक नहीं आया. बीच में दो बार फोन द्वारा संपर्क कर कह गया तो जवाब में कहा गया कि आपको जवाब मिल जाएगा लेकिन आज तक जवाब नहीं मिला क्यों ?
क्योंकि हमने सामाज हित की बात की थी हमने निम्न वर्ग , मध्यम वर्ग के लिए भले की बात की थी सबका साथ सबका भला हो उसकी बात की थी .
अब आप स्वयं चिंतन करें कि बड़े बिजनेसमैन है कुर्सी पर कुंडली मार कर बैठ गए हैं जैसे नाग मणि के ऊपर, धन के ऊपर बैठा रहता है
वैसे यह लोग भी बैठ गए हैं
ना कुर्सी छोड़ना चाहते हैं और ना ही समाज हित का कार्य करना चाहते हैं.
भ्रष्ट नेताओं की तरह लंबे-लंबे वादे करते हैं और काम कुछ नहीं करते
जो काम होता है वह अपने भले के लिए होता है.
समाज को तो एक 🐐बकरा बना दिया गया है जब चाहो हलाल करते जाओ.
ऐसा लगता है कि महाभारत हो रही है और सभी लोग धृतराष्ट्र की तरह सूरदास बन बैठे हैं और दूसरी और समाज के निम्न वर्ग, मध्यम वर्ग को किस तरह लूटा जा रहा है सब कुछ देखने के बाद भी लोग आंखों में पट्टी बांधकर बैठे हैं गांधारी की तरह ?
चुप बैठे हैं सब कुछ देखते हुए भी भीष्म पितामह कुलगुरु एवं द्रोणाचार्य जेसे लोगों की तरह ?
लेकिन याद रखें महाभारत में जिसने अधर्म का साथ दिया था ,अधर्मियों के साथ खड़े थे उनका विनाश और कुल का विनाश हो गया था.
सच और धर्म की लड़ाई में आप लोग अगर चुप रहोगे तो हानी सिर्फ धर्म और सच की नहीं होगी बल्कि आपके भी होगी आपके आने वाली पीढ़ी की भी होगी और इतिहास कभी क्षमा नहीं करेगा इस बात का ध्यान रखें. धर्म के नाम पर धंधा न करें भगवान के नाम पर धंधा न करें इस कुर्सी में बैठकर धंधा न करें?
सेवा के कार्य करें, परोपकार्य करें, धर्म के कार्य करें, अच्छे कार्य करें, निस्वार्थ होकर कार्य करें ,सबके भले के लिए कार्य करें, मध्यम एवं कमजोर वर्गों को ऊपर उठाने का कार्य करें, सबको साथ लेकर समाज को आगे बढ़ने का कार्य करें इसमें ही सबका भला है. मैंने पहले भी कहा है क्या संस्था में, पंचायत में पैसे की कमी है ? नहीं है, भगवान ने धन-दौलत खूब दी है बस जरूरत है इच्छा शक्ति की व ईमानदारी की और अगर मेरी बातें समझ में ना आए तो पंच परमेश्वर कहानी पढ़ लीजिएगा और उस पर अमल करेंगे तभी आप इस कुर्सी में बैठने का अधिकारी कहलाएंगे वरना एक कठपुतली बनकर ही रह जाएंगे?
हम सदा हैं धर्म के साथ, समाज के साथ, सच के साथ !
संपादकीय