व्यक्ति से विश्व-मानवता तक सफ़लता का शाश्वत दर्शन – स्वभाव ही जीवन की दिशा तय करता है
लोकतांत्रिक देश में ज़ब नागरिक मनमुख स्वभाव से संचालित होते हैं,तो लोकतंत्र अधिकारों की भीड़ बन जाता है;परंतु जब वे गुरमुख व सनमुख होते हैं, तो लोकतंत्र लोक-कल्याण का जीवंत तंत्र बनता है- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर मनुष्य का जीवन केवल उसकी शिक्षा, धन या पद से नहीं, बल्कि उसके स्वभाव से संचालित होता है।इतिहास गवाह है कि जिन व्यक्तियों, समाजों और राष्ट्रों ने अपने स्वभाव को अनुशासन, नैतिकता और उच्च मूल्यों से जोड़ा, वे दीर्घकालीन सफलता के प्रतीक बने।भारतीय दर्शन में मानव स्वभाव को समझाने के लिए मनमुख,गुरमुख और सनमुख जैसे गहन और सार्वकालिक सिद्धांत दिए गए हैं। ये अवधारणाएँ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैश्विक मानव व्यवहार विज्ञान की भी कसौटी पर खरी उतरती हैं। आज जब विश्व नेतृत्व संकट, नैतिक पतन, मानसिक तनाव और मूल्य- संक्रमण से गुजर रहा है, तब इन स्वभावों का विश्लेषण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और भी प्रासंगिक हो जाता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूँ क़ि किसी भी लोकतंत्र की सफ़लता केवल उसके संविधान की सुंदर भाषा या संस्थाओं की मजबूती से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से तय होती है कि उसके नागरिकों का स्वभाव कैसा है। संविधान नागरिकों को अधिकार देता है, परंतु यह अपेक्षा भी करता है कि नागरिक विवेकशील,उत्तरदायी और नैतिक होंगे। जब नागरिक मनमुख स्वभाव से संचालित होते हैं, तो लोकतंत्र अधिकारों की भीड़ बन जाता है; और जब वे गुरमुख व सनमुख होते हैं, तो लोकतंत्र लोक-कल्याण का जीवंत तंत्र बनता है।

साथियों बात अगर हम मनमुख से गुरमुख सनमुख की यात्रा क़ो संविधान, लोकतंत्र और नागरिकता के संदर्भ में समझने की करें तो (1) मनमुख स्वभाव और लोकतंत्र का क्षरण-मनमुख नागरिक वह है जो संविधान को केवल अपने हित के औज़ार की तरह देखता है। उसे अधिकार याद रहते हैं,कर्तव्य नहीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो लोकतंत्रों में बढ़ता ध्रुवीकरण, हिंसक असहमति, टैक्स चोरी, सार्वजनिक संपत्ति का दुरुपयोग, ये सभी मनमुख नागरिकता के लक्षण हैं।जब,”मैं” राष्ट्र से ऊपर हो जाता है, तब संविधान की आत्मा कमजोर पड़ती है।(2) गुरमुख नागरिकता:- संवैधानिक विवेक की नींव गुरमुख नागरिक संविधान को अपना नैतिक गुरु मानता है। वह कानून के शब्दों के साथ-साथ उसके उद्देश्य को भी समझता है,न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व। ऐसा नागरिक मतदान को केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी मानता है। विश्व के सफल लोकतंत्रों में नागरिकों का यही गुरमुख स्वभाव संस्थाओं को मजबूत बनाता है। (3) सनमुख लोकतंत्र:अधिकार से आगे मानवता सनमुख नागरिकता लोकतंत्र को केवल राष्ट्र तक सीमित नहीं रखती,बल्कि उसे वैश्विक मानवता से जोड़ती है। पर्यावरण संरक्षण, अल्पसंख्यक अधिकार,शरणार्थी संवेदनशीलता ये सब सनमुख दृष्टि के बिना संभव नहीं। यही दृष्टि संविधान को मानव गरिमा का वैश्विक दस्तावेज़ बनाती है।इसलिए हम कर सकते हैं क़ि यदि नागरिक मनमुख रहेंगे, तो संविधान केवल किताब बनेगा; यदि नागरिक गुरमुख बनेंगे, तो संविधान व्यवस्था बनेगा;और यदि नागरिक सनमुख बनेंगे, तो संविधान मानवता का पथप्रदर्शक बनेगा।
साथियों बात अगर हम,मनमुख से गुरमुख, सनमुख की यात्रा क़ो भारत के भविष्य युवाओं से जोड़कर समझने की करें तो, युवा ही राष्ट्र का स्वभाव हैं।आज का युवा केवल कल का नागरिक नहीं, बल्कि आज का निर्णायक है। उसका स्वभाव तय करेगा कि भविष्य में राष्ट्र कैसा होगा। यदि युवा मनमुख है, तो तकनीक भी विनाश का औज़ार बनेगी;और यदि युवा गुरमुख-सनमुख है, तो वही तकनीक मानवता की सेवा करेगी। (1) मनमुख युवा: तात्कालिक सफलता का भ्रम-आज का युवा यदि केवल त्वरित प्रसिद्धि, आसान पैसा और सोशल मीडिया की वाहवाही के पीछे भागता है, तो वह मनमुखता की ओर बढ़ रहा है।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानसिक तनाव,अवसाद और उद्देश्यहीनता इसी का परिणाम हैं। मनमुख युवा प्रतियोगिता तो जीतना चाहता है, पर धैर्य नहीं रखना चाहता।(2) गुरमुख युवा: कौशल के साथ संस्कार-गुरमुख युवा वह है जो सीखने को गुरु मानता है,शिक्षक,अनुभव, असफलता और अनुशासन को।वह जानता है कि वास्तविक सफलता रातों-रात नहीं आती। विश्व के नवाचार, स्टार्ट-अप और शोध नेतृत्व इसी स्वभाव से निकले हैं। (3) सनमुख युवा: करियर से आगे योगदान- सनमुख युवा अपने करियर को समाज से जोड़ता है। वह पूछता है-मैं क्या बनूँ? के साथ-साथ मैं किसके काम आऊँ? यही युवा जलवायु परिवर्तन, सामाजिक असमानता और शांति प्रयासों में नेतृत्व करता है।

साथियों बात अगर हम,मनमुख से गुरमुख, सनमुख की यात्रा क़ो प्रशासनिक, आध्यात्मिक समन्वित स्थिति सुशासन का बाहरी अनुशासन और आत्मशासन की आंतरिक शक्ति इस रूप में समझने की करें तो, शासन की गुणवत्ता शासक के स्वभाव से ही अधिक सफल होने की संभावना रखती है,प्रशासन केवल नियमों से नहीं, बल्कि प्रशासक के स्वभाव से चलता है। इतिहास बताता है कि जब प्रशासक मनमुख होता है, तो नियम भी भ्रष्ट हो जाते हैं; और जब वह गुरमुख-सनमुख होता है, तो सीमित संसाधनों में भी सुशासन संभव हो जाता है।(1) मनमुख प्रशासन:-सत्ता का अहंकार -मनमुख प्रशासक पद को अधिकार समझता है, सेवा नहीं। इससे लालफीताशाही, भ्रष्टाचार और जन-अविश्वास जन्म लेता है। वैश्विक स्तर पर प्रशासनिक विफलताओं का मूल कारण यही स्वभाव है।(2) गुरमुख प्रशासन:-नियम +विवेक गुरमुख प्रशासक नियमों को गुरु मानता है, पर विवेक से काम लेता है। वह संविधान, कानून और नीति को आत्मसात करता है। ऐसे प्रशासन से नागरिकों का विश्वास बढ़ता है और संस्थाएँ सशक्त होती हैं। (3) सनमुख नेतृत्व:- सत्ता से सेवा तक- सनमुख प्रशासक सत्ता को साधना मानता है। वह निर्णय लेते समय सबसे कमजोर व्यक्ति को ध्यान में रखता है। यही आध्यात्मिक चेतना प्रशासन को मानवीय बनाती है,जहाँ फाइलों के पीछे चेहरे दिखते हैं।
साथियों बात हम मनमुख,गुरमुख और सनमुख स्वभाव को समझने की करें तो, (1) मनमुख स्वभाव का तात्पर्य है ऐसा व्यक्ति जो केवल अपने मन, इच्छा, वासना, अहंकार और तात्कालिक लाभ के अनुसार निर्णय लेता है। वह न तो विवेक को महत्व देता है, न ही गुरु, समाज, शास्त्र या नैतिक मूल्यों को। आधुनिक वैश्विक संस्कृति में यह स्वभाव उपभोक्तावाद भोगवाद और अति-व्यक्तिवाद के रूप में व्यापक रूप से दिखाई देता है।राजनीति और शासन में मनमुख प्रवृत्ति के दुष्परिणाम व त्रासदी भयंकर प्रमाण में होती है।अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जब शासक मनमुख स्वभाव से निर्णय लेते हैं, तो सत्ता अहंकार, भ्रष्टाचार और युद्ध को जन्म देती है। इतिहास में कई साम्राज्य केवल इसलिए गिरे क्योंकि उनके नेतृत्व ने जनकल्याण की बजाय व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को चुना। यह स्वभाव राष्ट्रों को भी अस्थिर कर देता है। (2) गुरमुख स्वभाव का अर्थ है,गुरु,विवेक,ज्ञान और नैतिक मार्गदर्शन के अनुसार जीवन जीना। यहाँ ‘गुरु’ केवल व्यक्ति विशेष नहीं, बल्कि सत्य, अनुभव, संविधान, नैतिकता और सामूहिक विवेक का प्रतीक है। गुरमुख व्यक्ति अपने मन को अनुशासित करता है, न कि उसका दास बनता है।जब शासन गुरमुख स्वभाव से चलता है, तो नीति-निर्माण में पारदर्शिता, जवाबदेहीऔर न्याय प्राथमिकता बनते हैं। संविधान भी एक प्रकार का ‘गुरु’ है, जो सत्ता को मर्यादा में रखता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुशासन के सफल मॉडल इसी सिद्धांत पर आधारित हैं।(3) सनमुख स्वभाव का अर्थ है,सत्य, सद्गुण, सेवा और सार्वभौमिक मानव मूल्यों की ओर उन्मुख होना। यह स्वभाव गुरमुख से भी आगे जाकर व्यक्ति को स्वार्थ से परमार्थ की यात्रा पर ले जाता है। यहाँ व्यक्ति केवल अपने या अपने समाज के बारे में नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण के बारे में सोचता है।आज़ जब जलवायु परिवर्तन, युद्ध, शरणार्थी संकट और असमानता जैसी वैश्विक समस्याएँ सामने हैं, तब सनमुख स्वभाव की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। यह स्वभाव ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को व्यवहार में उतारता है।अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी संगठनों चिकित्सकों शिक्षकों और स्वयंसेवकों में यह स्वभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही स्वभाव विश्व को अधिक मानवीय बनाता है।सनमुख स्वभाव किसी एक धर्म या परंपरा तक सीमित नहीं है। यह एक सार्वभौमिक नैतिक चेतना है, जो आधुनिक विज्ञान, तकनीक और विकास के साथ भी सामंजस्य बिठा सकती है। यह व्यक्ति को भीतर से मजबूत और बाहर से उपयोगी बनाता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि सुशासन यानें बाहरी अनुशासन (कानून) आंतरिक अनुशासन यानें स्वभाव,मनमुख से सत्ता बिगड़ती है,गुरमुख से व्यवस्था चलती है,और सनमुख से इतिहास बनता है।आओ,मनमुख स्वभाव छोड़ें।गुरमुख बनकर विवेक अपनाएँ।सनमुख बनकर मानवता को प्राथमिकता दें। यही व्यक्तिगत सफलता, सुशासन और विश्व-कल्याण का साझा मार्ग है।
-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425