सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” ट्रिन… ट्रिन… ट्रिन… ट्रिन… मेरी जेब में रखे मोबाइल फोन की घंटी लगातार बज रही थी। मैं तब ह्यूमन राइट एसोसिएशन की प्रदेशसभा में बैठा हुआ था।कार्यक्रम चल रहा था। मेरे साथ सैकड़ो लोग हाल में मौजूद थे। मैंने जेब से निकाल कर मोबाइल देखा तो कोई अननोन नंबर से काल किया जा रहा था। मैंने फोन जैसे ही ऑन किया, उधर से महिला की कड़कदार आवाज आई उसने सीधे ही कहा-” आप सुरेश सिंह जी बोल रहे हैं?” मैंने कहा जी हां, मैं ही बात कर रहा हूं! फिर मैंने कहा आप कौन बात कर रहे हैं? तब उसने मुझे धमकाते हुए लहजे में कहा कि मैं दिल्ली साइबर क्राइम ब्रांच के कंट्रोल रूम से बोल रही हूं! आपको अरेस्ट वारंट जल्द ही मिलने वाला है, आपको अरेस्ट किया जा रहा है। ये सुनकर एक पल को तो मुझे कुछ समझ नही आया, फिर भी मैंने पूछा अरेस्ट किए जाने का कारण क्या है? तो उसने जवाब दिया आप अश्लील कंटेंट लोगों से शेयर करते हैं,और अभी भी आपकी टीवी पर अश्लील कंटेंट चल रहा है
अब साहब मैं तो ह्यूमनराइट के सम्मिट में बैठा हुआ था। जल्द ही मैं समझ गया कि यह क्या हो रहा है। वैसे भी उसने एक वाक्य कहकर बहुत बड़ी गलती कर दी थी कि आपकी टीवी में अभी भी अश्लील कंटेंट चल रहा है।यह भी अच्छा इत्तेफाक था कि मेरी बगल की सीट में ऐसीबी क्राइम ब्रांच के इंस्पेक्टर जो मेरे छोटे भाई भी लगते हैं, वह बैठे हुए थे। मैंने तत्काल ही मोबाइल में उनसे कहा महोदया.. आपको शायद नहीं मालूम..आपने कहां फोन लगाया है! मैं खुद ही ऐसीबी क्राइम ब्रांच का इंस्पेक्टर बोल रहा हूं। बताइए आगे क्या कहना है। इतना सुनते ही तत्काल उसने फोन कट कर दिया। यह मेरी सजगता थी या संयोग था कि उसने गलत समय में गलत व्यक्ति को फोन लगाया वरना वह तो बुरी तरह से डरा कर हाउस अरेस्ट करने पर ही तुली हुई थी। ऐसे ही न जाने कितने लोगों को ऐसा ही फोन कर लोगों को डराया धमकाया जाता है फिर उनसे एक मोटी रकम वसूली जाती है ।लोग मानसिक ,आर्थिक परेशानियों में उलझ जाते हैं इन सभी वाक्यातों में यह भी बड़ी विडंबना वाली बात है कि इन साइबर ठगों और अपराधियों के जाल में अच्छे-अच्छे पढ़े लिखे लोग भी झांसे में आ जाते हैं। जबकि ये साइबर ठग कम पढ़े लिखे और जीवन में असफल लोग होते हैं। डिजिटल हाउस अरेस्ट या डिजिटल अरेस्ट एक उभरता हुआ साइबर अपराध है, जिसमें ठग पुलिस या सरकारी एजेंसियों के नाम से लोगों को फोन, वीडियो कॉल या मैसेज के जरिए डराते हैं और घर में कैद रखकर पैसे ऐंठते हैं। भारत में ये मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, खासकर 2024 से अब तक, क्योंकि डिजिटल लेन-देन बढ़ने से स्कैमर्स को नया मौका मिला है। डिजिटल अरेस्ट में अपराधी खुद को सीबीआई, ईडी, पुलिस या नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का अधिकारी बताते हैं। वे पीड़ित को आधार कार्ड, बैंक खाते या सिम के गैरकानूनी इस्तेमाल का आरोप लगाते हैं, गिरफ्तारी की धमकी देते हैं और वीडियो कॉल पर पुलिस स्टेशन या कोर्ट जैसा माहौल दिखाते हैं। पीड़ित को घर से बाहर न जाने, किसी से बात न करने और पैसे ट्रांसफर करने को मजबूर किया जाता है। 2024 में 92,000 से ज्यादा भारतीय इससे प्रभावित हुए, और कुल साइबर स्कैम से 27,914 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। ये शिकायतें 2023 में 11 लाख से ज्यादा हो गईं। ये साईबर अपराधी एआई वॉइस, डीपफेक वीडियो और फर्जी वर्दी वाले कॉल्स से विश्वसनीय लगते हैं, खासकर बुजुर्गों और कम तकनीकी जानकारी वालों को ही इनके द्वारा निशाना बनाया जाता है। शुरुआती कॉलः ऑडियो या वीडियो कॉल से संपर्क, आरोप लगाना जैसे मनी लॉन्ड्रिंग या ड्रग्स तस्करी। फिर डर फैलानाः घर में कैमरा ऑन रखने को कहना, हर दो घंटे में ‘डिजिटल कोर्ट’ में पेशी दिखाना।पैसे ऐंठनाः ‘समस्या सुलझाने’ के नाम पर यूपीआई या बैंक ट्रांसफर मांगना, मुंबई पुलिस ने 2025 में बड़े बाईबल गिरोह पकड़े, जहां सीनियर सिटीजन सबसे बड़े शिकार बने थे। यह बात अच्छी तरह से जान लें कोई असली एजेंसी फोन पर गिरफ्तारी की धमकी नहीं देती। डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई कानूनी चीज नहीं है। संदेह हो तो कॉल काटें, 1930 पर रिपोर्ट करें या स्थानीय पुलिस से सत्यापित करें।जागरूकता अभियान और 14C जैसे केंद्र बढ़ रही शिकायतों पर काम कर रहे हैं। तकनीकी साक्षरता बढ़ाकर ही ये रुकेगा।डिजिटल अरेस्ट या हाउस अरेस्ट स्कैम भारत में साइबर अपराध का एक खतरनाक रूप बन चुका है, जहां ठग आधुनिक तकनीक का सहारा लेकर लोगों को घर में कैद कर पैसे वसूलते हैं। ये मामले 2024 से तेजी से बढ़े हैं, क्योंकि सस्ते स्मार्टफोन और इंटरनेट ने स्कैमर्स को व्यापक पहुंच दी है। विस्तार से समझने पर पता चलता है कि ये न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाता है, बल्कि मानसिक आघात भी देता है। डिजिटल अरेस्ट एक काल्पनिक अवधारणा है, जो वास्तविक हाउस अरेस्ट (घर में नजरबंदी) से प्रेरित है, लेकिन इसमें कोई कानूनी आधार नहीं। अपराधी व्हाट्सएप, वीडियो कॉल या एसएमएस के जरिए संपर्क करते हैं, खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी या एनसीबी अधिकारी बताते हैं। वे पीड़ित के नाम पर ड्रग्स, मनी लॉन्ड्रिंग या टेरर फंडिंग, अश्लीलता का आरोप लगाते हैं, और ‘गिरफ्तारी से बचने’ के लिए घर में कैद रहने को मजबूर करते हैं। पहली बार ये 2023 में सुर्खियों में आया, लेकिन 2025 तक मामलों ने रफ्तार पकड़ ली। भारतीय साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर के अनुसार, 2024 में डिजिटल अरेस्ट से जुड़े 92,000 से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं, जो पिछले वर्षों से कई गुना ज्यादा हैं। कुल साइबर फ्रॉड से 27,914 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, जिसमें डिजिट अरेस्ट का बड़ा हिस्सा था। 2021 में साइबर शिकायतें 1.3 लाख थीं, 2025 में बढ़ते मामलों का आंकड़ो पर अगर नजर डालें तो भारतीय साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर के अनुसार, कुल साइबर फ्रॉड से 27,914 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, जिसमें डिजिटल अरेस्ट का बड़ा हिस्सा था। 2025 में मुंबई, दिल्ली और कोलकाता जैसे शहरों में बड़े गिरोह पकड़े गए, जहां सीनियर सिटीजन्स 60% शिकार बने। एआई-जनरेटेड वॉइस क्लोनिंग और डीपफेक वीडियो ने इसे और विश्वसनीय बना दिया। ये साईबर ठग एक सुनियोजित तरीके से काम करते हैं:पहला चरण (आरोप और संपर्क) अज्ञात नंबर से कॉल आती है, जिसमें फर्जी वर्दी या पुलिस स्टेशन का बैकग्राउंड दिखाया जाता है। पीड़ित का निजी डेटा (जैसे आधार, बैंक डिटेल्स) पहले से लीक डेटाबेस से लिया जाता है।दूसरा चरण (डर और नियंत्रण) ‘डिजिटल कोर्ट’ में पेशी के नाम पर वीडियो कॉल पर हर 2-3 घंटे रिपोर्टिंग कराई जाती है। घर से बाहर न जाने, दरवाजा बंद रखने और किसी से बात न करने को कहा जाता है।तीसरा चरण (वसूली) ‘क्लीन चिट’ या ‘समस्या सुलझाने’ के नाम पर यूपीआई गिफ्ट कार्ड या क्रिप्टो वॉलेट में पैसे मांग एक मामले में तो 14 करोड़ की ठगी हुई। और जो ठगे गए वह बहुत बड़े भारतीय सेवा के अधिकारी रह चुके थे ।और उन्हें दुनिया के कई देशों में रहने का अनुभव था। ये स्कैमर केवल पैसे नहीं छीनते, बल्कि परिवारों को तोड़ते हैं-बुजुर्ग अकेले पड़ जाते हैं, मानसिक तनाव से सुसाइड तक के मामले सामने आए। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी से शिकार ज्यादा होते है। विदेशी गिरोह भी (जैसे कंबोडिया, लाओस से चलने वाले) भारत को निशाना बनाते हैं, जहां तकनीकी साक्षरता कम है। इन सबसे बचने के लिए तात्कालिक उपाय है- यह अच्छी तरीके से जानकारी रखना होगा की कोई सरकारी एजेंसी फोन पर गिरफ्तारी की धमकी नहीं देती। संदेह हो तो कॉल काटें, 1930 (नेशनल साइबर हेल्पलाइन) डायल करें या cybercrime.gov.in पर रिपोर्ट करें।लंबे उपायः 14C और पुलिस के जागरूकता अभियान, जैसे ‘नेशनल साइबर अवेयरनेस मंथ’ चल रहे हैं। एआई टूल्स से फर्जी कॉल्स डिटेक्ट करने की तकनीक विकसित हो रही है।व्यक्तिगत सावधानीः अनजान कॉल्स न लें, टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन चालू रखें, और परिवार को शिक्षित करें। 2025 में 500+ गिरोह बस्ट होने से संकेत मिला कि अब सख्ती काम कर रही है। जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है।डिजिटल अरेस्ट से रोकथाम के लिए व्यक्तिगत और सामाजिक उपाय अपनाना जरूरी है, क्योंकि ये स्कैम तेजी से फैल रहे हैं। व्यक्तिगत स्तर पर सतर्कता से 80% मामले रोके जा सकते हैं, जबकि सामाजिक प्रयास जागरूकता बढ़ाकर समुदाय को मजबूत बनाते हैं। आपको अगर ऐसा कल कभी आ जाए तो आप व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए तत्काल कदम उठाएं। सबसे पहले रुको-सोचो-एक्शन लो। संदिग्ध कॉल पर रुकें, व्यक्तिगत जानकारी (आधार, ओटीपी, बैंक डिटेल्स) न दें, और सोचें कि कोई सरकारी एजेंसी फोन पर गिरफ्तारी की धमकी नहीं देती। फिर 1930 पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर रिपोर्ट करें। तकनीकी सावधानियां भी रखें।अनजान नंबर ब्लॉक करें, एंटीवायरस सॉफ्टवेयर अपडेट रखें, वीपीएन इस्तेमाल करें, और टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन चालू रखें। स्क्रीनशॉट लें और कॉल रिकॉर्ड करें।फिर आने वाले संदिग्ध काल की जांच स्वयं करें। कॉल काटने के बाद स्थानीय पुलिस स्टेशन या आधिकारिक वेबसाइट से सत्यापित करें। कभी भी यूपीआई या बैंक ट्रांसफर न करें। इस समस्या के रोकथाम के लिए सामाजिक स्तर पर सामूहिक प्रयास बहुत प्रभावी साबित हो सकते हैं। जिसके लिए जागरूकता अभियान चलाकर परिवार, पड़ोस और कार्यस्थल पर वर्कशॉप आयोजित किया जाना , स्कूलों-कॉलेजों में साइबर साक्षरता सिखाएं। सोशल मीडिया पर पीएम मोदी के “‘रुको-सोचो-एक्शन लो”‘ मंत्र को शेयर करें। समुदाय निगरानीः मोहल्ला समितियां बनाएं जो बुजुर्गों को शिक्षित करें, क्योंकि वे मुख्य शिकार होते हैं। सामाजिक संस्थान और एनजीओस मिलकर हेल्पलाइन कैंप लगाएं। सरकारी सहयोग में साइबर सिक्योरिटी और पुलिस के अभियानों में भाग लें, जैसे नेशनल साइबर अवेयरनेस मंथ। साइबर ठगों से संबंधित शिकायतों को तुरंत रिपोर्ट कर गिरोहों को पकड़ने में मदद करें। अब साहब मैं तो ह्यूमनराइट के सम्मिट में बैठा हुआ था। जल्द ही मैं समझ गया कि यह क्या हो रहा है। वैसे भी उसने एक वाक्य कहकर बहुत बड़ी गलती कर दी थी कि आपकी टीवी में अभी भी अश्लील कंटेंट चल रहा है।यह भी अच्छा इत्तेफाक था कि मेरी बगल की सीट में ऐसीबी क्राइम ब्रांच के इंस्पेक्टर जो मेरे छोटे भाई भी लगते हैं, वह बैठे हुए थे। मैंने तत्काल ही मोबाइल में उनसे कहा महोदया.. आपको शायद नहीं मालूम..आपने कहां फोन लगाया है! मैं खुद ही ऐसीबी क्राइम ब्रांच का इंस्पेक्टर बोल रहा हूं। बताइए आगे क्या कहना है। इतना सुनते ही तत्काल उसने फोन कट कर दिया। यह मेरी सजगता थी या संयोग था कि उसने गलत समय में गलत व्यक्ति को फोन लगाया वरना वह तो बुरी तरह से डरा कर हाउस अरेस्ट करने पर ही तुली हुई थी। ऐसे ही न जाने कितने लोगों को ऐसा ही फोन कर लोगों को डराया धमकाया जाता है फिर उनसे एक मोटी रकम वसूली जाती है ।लोग मानसिक ,आर्थिक परेशानियों में उलझ जाते हैं इन सभी वाक्यातों में यह भी बड़ी विडंबना वाली बात है कि इन साइबर ठगों और अपराधियों के जाल में अच्छे-अच्छे पढ़े लिखे लोग भी झांसे में आ जाते हैं। जबकि ये साइबर ठग कम पढ़े लिखे और जीवन में असफल लोग होते हैं। डिजिटल हाउस अरेस्ट या डिजिटल अरेस्ट एक उभरता हुआ साइबर अपराध है, जिसमें ठग पुलिस या सरकारी एजेंसियों के नाम से लोगों को फोन, वीडियो कॉल या मैसेज के जरिए डराते हैं और घर में कैद रखकर पैसे ऐंठते हैं। भारत में ये मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, खासकर 2024 से अब तक, क्योंकि डिजिटल लेन-देन बढ़ने से स्कैमर्स को नया मौका मिला है। डिजिटल अरेस्ट में अपराधी खुद को सीबीआई, ईडी, पुलिस या नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का अधिकारी बताते हैं। वे पीड़ित को आधार कार्ड, बैंक खाते या सिम के गैरकानूनी इस्तेमाल का आरोप लगाते हैं, गिरफ्तारी की धमकी देते हैं और वीडियो कॉल पर पुलिस स्टेशन या कोर्ट जैसा माहौल दिखाते हैं। पीड़ित को घर से बाहर न जाने, किसी से बात न करने और पैसे ट्रांसफर करने को मजबूर किया जाता है। 2024 में 92,000 से ज्यादा भारतीय इससे प्रभावित हुए, और कुल साइबर स्कैम से 27,914 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। ये शिकायतें 2023 में 11 लाख से ज्यादा हो गईं। ये साईबर अपराधी एआई वॉइस, डीपफेक वीडियो और फर्जी वर्दी वाले कॉल्स से विश्वसनीय लगते हैं, खासकर बुजुर्गों और कम तकनीकी जानकारी वालों को ही इनके द्वारा निशाना बनाया जाता है। शुरुआती कॉलः ऑडियो या वीडियो कॉल से संपर्क, आरोप लगाना जैसे मनी लॉन्ड्रिंग या ड्रग्स तस्करी। फिर डर फैलानाः घर में कैमरा ऑन रखने को कहना, हर दो घंटे में ‘डिजिटल कोर्ट’ में पेशी दिखाना।पैसे ऐंठनाः ‘समस्या सुलझाने’ के नाम पर यूपीआई या बैंक ट्रांसफर मांगना, मुंबई पुलिस ने 2025 में बड़े बाईबल गिरोह पकड़े, जहां सीनियर सिटीजन सबसे बड़े शिकार बने थे। यह बात अच्छी तरह से जान लें कोई असली एजेंसी फोन पर गिरफ्तारी की धमकी नहीं देती। डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई कानूनी चीज नहीं है। संदेह हो तो कॉल काटें, 1930 पर रिपोर्ट करें या स्थानीय पुलिस से सत्यापित करें।जागरूकता अभियान और 14C जैसे केंद्र बढ़ रही शिकायतों पर काम कर रहे हैं। तकनीकी साक्षरता बढ़ाकर ही ये रुकेगा।डिजिटल अरेस्ट या हाउस अरेस्ट स्कैम भारत में साइबर अपराध का एक खतरनाक रूप बन चुका है, जहां ठग आधुनिक तकनीक का सहारा लेकर लोगों को घर में कैद कर पैसे वसूलते हैं। ये मामले 2024 से तेजी से बढ़े हैं, क्योंकि सस्ते स्मार्टफोन और इंटरनेट ने स्कैमर्स को व्यापक पहुंच दी है। विस्तार से समझने पर पता चलता है कि ये न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाता है, बल्कि मानसिक आघात भी देता है। डिजिटल अरेस्ट एक काल्पनिक अवधारणा है, जो वास्तविक हाउस अरेस्ट (घर में नजरबंदी) से प्रेरित है, लेकिन इसमें कोई कानूनी आधार नहीं। अपराधी व्हाट्सएप, वीडियो कॉल या एसएमएस के जरिए संपर्क करते हैं, खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी या एनसीबी अधिकारी बताते हैं। वे पीड़ित के नाम पर ड्रग्स, मनी लॉन्ड्रिंग या टेरर फंडिंग, अश्लीलता का आरोप लगाते हैं, और ‘गिरफ्तारी से बचने’ के लिए घर में कैद रहने को मजबूर करते हैं। पहली बार ये 2023 में सुर्खियों में आया, लेकिन 2025 तक मामलों ने रफ्तार पकड़ ली। भारतीय साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर के अनुसार, 2024 में डिजिटल अरेस्ट से जुड़े 92,000 से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं, जो पिछले वर्षों से कई गुना ज्यादा हैं। कुल साइबर फ्रॉड से 27,914 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, जिसमें डिजिट अरेस्ट का बड़ा हिस्सा था। 2021 में साइबर शिकायतें 1.3 लाख थीं, 2025 में बढ़ते मामलों का आंकड़ो पर अगर नजर डालें तो भारतीय साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर के अनुसार, कुल साइबर फ्रॉड से 27,914 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, जिसमें डिजिटल अरेस्ट का बड़ा हिस्सा था। 2025 में मुंबई, दिल्ली और कोलकाता जैसे शहरों में बड़े गिरोह पकड़े गए, जहां सीनियर सिटीजन्स 60% शिकार बने। एआई-जनरेटेड वॉइस क्लोनिंग और डीपफेक वीडियो ने इसे और विश्वसनीय बना दिया। ये साईबर ठग एक सुनियोजित तरीके से काम करते हैं:पहला चरण (आरोप और संपर्क) अज्ञात नंबर से कॉल आती है, जिसमें फर्जी वर्दी या पुलिस स्टेशन का बैकग्राउंड दिखाया जाता है। पीड़ित का निजी डेटा (जैसे आधार, बैंक डिटेल्स) पहले से लीक डेटाबेस से लिया जाता है।दूसरा चरण (डर और नियंत्रण) ‘डिजिटल कोर्ट’ में पेशी के नाम पर वीडियो कॉल पर हर 2-3 घंटे रिपोर्टिंग कराई जाती है। घर से बाहर न जाने, दरवाजा बंद रखने और किसी से बात न करने को कहा जाता है।तीसरा चरण (वसूली) ‘क्लीन चिट’ या ‘समस्या सुलझाने’ के नाम पर यूपीआई गिफ्ट कार्ड या क्रिप्टो वॉलेट में पैसे मांग एक मामले में तो 14 करोड़ की ठगी हुई। और जो ठगे गए वह बहुत बड़े भारतीय सेवा के अधिकारी रह चुके थे ।और उन्हें दुनिया के कई देशों में रहने का अनुभव था। ये स्कैमर केवल पैसे नहीं छीनते, बल्कि परिवारों को तोड़ते हैं-बुजुर्ग अकेले पड़ जाते हैं, मानसिक तनाव से सुसाइड तक के मामले सामने आए। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी से शिकार ज्यादा होते है। विदेशी गिरोह भी (जैसे कंबोडिया, लाओस से चलने वाले) भारत को निशाना बनाते हैं, जहां तकनीकी साक्षरता कम है। इन सबसे बचने के लिए तात्कालिक उपाय है- यह अच्छी तरीके से जानकारी रखना होगा की कोई सरकारी एजेंसी फोन पर गिरफ्तारी की धमकी नहीं देती। संदेह हो तो कॉल काटें, 1930 (नेशनल साइबर हेल्पलाइन) डायल करें या cybercrime.gov.in पर रिपोर्ट करें।लंबे उपायः 14C और पुलिस के जागरूकता अभियान, जैसे ‘नेशनल साइबर अवेयरनेस मंथ’ चल रहे हैं। एआई टूल्स से फर्जी कॉल्स डिटेक्ट करने की तकनीक विकसित हो रही है।व्यक्तिगत सावधानीः अनजान कॉल्स न लें, टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन चालू रखें, और परिवार को शिक्षित करें। 2025 में 500+ गिरोह बस्ट होने से संकेत मिला कि अब सख्ती काम कर रही है। जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है।डिजिटल अरेस्ट से रोकथाम के लिए व्यक्तिगत और सामाजिक उपाय अपनाना जरूरी है, क्योंकि ये स्कैम तेजी से फैल रहे हैं। व्यक्तिगत स्तर पर सतर्कता से 80% मामले रोके जा सकते हैं, जबकि सामाजिक प्रयास जागरूकता बढ़ाकर समुदाय को मजबूत बनाते हैं। आपको अगर ऐसा कल कभी आ जाए तो आप व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए तत्काल कदम उठाएं। सबसे पहले रुको-सोचो-एक्शन लो। संदिग्ध कॉल पर रुकें, व्यक्तिगत जानकारी (आधार, ओटीपी, बैंक डिटेल्स) न दें, और सोचें कि कोई सरकारी एजेंसी फोन पर गिरफ्तारी की धमकी नहीं देती। फिर 1930 पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर रिपोर्ट करें। तकनीकी सावधानियां भी रखें।अनजान नंबर ब्लॉक करें, एंटीवायरस सॉफ्टवेयर अपडेट रखें, वीपीएन इस्तेमाल करें, और टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन चालू रखें। स्क्रीनशॉट लें और कॉल रिकॉर्ड करें।फिर आने वाले संदिग्ध काल की जांच स्वयं करें। कॉल काटने के बाद स्थानीय पुलिस स्टेशन या आधिकारिक वेबसाइट से सत्यापित करें। कभी भी यूपीआई या बैंक ट्रांसफर न करें। इस समस्या के रोकथाम के लिए सामाजिक स्तर पर सामूहिक प्रयास बहुत प्रभावी साबित हो सकते हैं। जिसके लिए जागरूकता अभियान चलाकर परिवार, पड़ोस और कार्यस्थल पर वर्कशॉप आयोजित किया जाना , स्कूलों-कॉलेजों में साइबर साक्षरता सिखाएं। सोशल मीडिया पर पीएम मोदी के “‘रुको-सोचो-एक्शन लो”‘ मंत्र को शेयर करें। समुदाय निगरानीः मोहल्ला समितियां बनाएं जो बुजुर्गों को शिक्षित करें, क्योंकि वे मुख्य शिकार होते हैं। सामाजिक संस्थान और एनजीओस मिलकर हेल्पलाइन कैंप लगाएं। सरकारी सहयोग में साइबर सिक्योरिटी और पुलिस के अभियानों में भाग लें, जैसे नेशनल साइबर अवेयरनेस मंथ। साइबर ठगों से संबंधित शिकायतों को तुरंत रिपोर्ट कर गिरोहों को पकड़ने में मदद करें।