भारत में आयोजित यह सम्मेलन आने वाले वर्षों में राष्ट्रमंडल लोकतंत्रों के लिए दिशा-निर्देशक के रूप में याद किया जाएगा।
राजनीतिक ध्रुवीकरण,फेक न्यूज़,सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव,आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी नई तकनीकों का हस्तक्षेप क़े बीच सीएसपीओसी का आयोजन महत्वपूर्ण -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर जनवरी 2026 में भारत की राजधानी नई दिल्ली एक ऐसे ऐतिहासिक और बहुआयामी संसदीय आयोजन की साक्षी बनी, जिसने न केवल राष्ट्रमंडल देशों की संसदीय परंपराओं को एक साझा मंच प्रदान किया, बल्कि 21वीं सदी के लोकतंत्र के सामने खड़ी जटिल चुनौतियों पर सामूहिक वैश्विक चिंतन का अवसर भी दिया। राष्ट्रमंडल देशों के संसदीय अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों का 28वां सम्मेलन, जिसे कॉमनवेल्थ स्पीकर्स एंड प्रेसाइडिंग ऑफिसर्स कॉन्फ्रेंस (सीएसपीओसी) कहा जाता है, अपने पैमाने, भागीदारी और विषयगत व्यापकता के लिहाज से अब तक का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण आयोजन माना जा रहा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी यहमानता हूं क़ि यह सम्मेलन केवल एक औपचारिक संसदीय बैठक नहीं था,बल्कि यह लोकतंत्र के भविष्य, संसदों की प्रासंगिकता, तकनीकी बदलावों के प्रभाव और नागरिकों की बढ़ती अपेक्षाओं पर एक गंभीर वैश्विक संवाद का मंच बनकर उभरा।बता दें सीएसपीओसी की स्थापना का मूल उद्देश्य राष्ट्रमंडल देशों की संसदों के बीच संवाद, अनुभवों के आदान-प्रदान और श्रेष्ठ संसदीय प्रथाओं को साझा करना रहा है। यह मंच स्पीकर्स और पीठासीन अधिकारियों को इस बात पर विचार करने का अवसर देता है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में संसदें किस प्रकार अपनी संवैधानिक भूमिका, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रख सकती हैं। 28वां सीएसपीओसी सम्मेलन इस परंपरा का विस्तार करते हुए एक ऐसे समय में आयोजित हुआ है, जब दुनियाँ भर में लोकतांत्रिक संस्थाएँ अनेक दबावों का सामना कर रही हैं राजनीतिक ध्रुवीकरण, फेक न्यूज़,सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव,आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी नई तकनीकों का हस्तक्षेप और नागरिकों का संस्थाओं पर घटता विश्वास। ऐसे संदर्भ में

सीएसपीओसी का यह संस्करण केवल विमर्श का मंच नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक पुनर्संतुलन की दिशा में एक सामूहिक प्रयास के रूप में सटीक रूप से सामने आया।28वें सीएसपीओसी सम्मेलन का व्यापक कार्यक्रम 14 से 16 जनवरी 2026 के बीचआयोजित गतिविधियों और संसदीय संवादों की श्रृंखला के रूप में देखा गया, जबकि इसका औपचारिक और मुख्यआयोजन भारत की संसद द्वारा 14 से 16 जनवरी 2026 के बीच नई दिल्ली में आयोजित किया गया।भारत की संसद द्वारा इस सम्मेलन की मेजबानी अपने आप में एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक और कूटनीतिक संदेश देती है। दुनियाँ का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते भारत ने यह दर्शाया कि वह न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का सफल क्रियान्वयन करता है, बल्कि वैश्विक लोकतांत्रिक विमर्श का नेतृत्व करने की क्षमता भी रखता है।इस सम्मेलन की सबसे उल्लेखनीय विशेषता इसकी अभूतपूर्व भागीदारी रही। कुल 42 राष्ट्रमंडल देशों के 61 स्पीकर्स और पीठासीन अधिकारी, साथ ही चार सेमी-ऑटोनॉमस संसदों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने इसेसीएसपीओसी
के इतिहास का सबसे बड़ा सम्मेलन बना दिया। यह विशाल भागीदारी इस बात का संकेत है कि राष्ट्रमंडल के भीतर संसदीय संस्थाएँ आज जिन चुनौतियों से जूझ रही हैं, वे साझा हैं और उनके समाधान भी सामूहिक संवाद और सहयोग से ही संभव हैं। विविध भौगोलिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पृष्ठभूमियों से आए प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने इस मंच को वास्तव में वैश्विक और बहुसांस्कृतिक स्वरूप प्रदान किया।
साथियों बात अगर हम इस सम्मेलन के मुख्य विषय:बदलती संसदीय भूमिका को समझने की करें तो सीएसपीओसी 2026 के विमर्श का केंद्रबिंदु रहा, स्पीकर्स और पीठासीन अधिकारियों की बदलती भूमिका।पारंपरिक रूप से स्पीकर की भूमिका सदन की कार्यवाही को निष्पक्ष रूप से संचालित करने तक सीमित मानी जाती रही है,किंतु आज यह भूमिका कहीं अधिक जटिल और बहुआयामी हो गई है।आधुनिक लोकतंत्र में स्पीकर न केवल प्रक्रिया के संरक्षक हैं, बल्कि वे संस्थागत गरिमा, विपक्ष और सत्ता के बीच संतुलन,और संसद की सार्वजनिक छवि के भी संरक्षक बन चुके हैं। सम्मेलन में इस बात पर गहन चर्चा हुई कि कैसे स्पीकर्स राजनीतिक दबावों, सोशल मीडिया के त्वरित निर्णय- निर्माण वाले माहौल और बढ़ते सार्वजनिक ध्रुवीकरण के बीच अपनी निष्पक्षता बनाए रख सकते हैं।

साथियों बात अगर हम संसदीय कामकाज में तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव को समझने की करें तो,सम्मेलन के सबसे चर्चित औरभविष्यपरक विषयों में से एक रहा, संसद में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग। संसद में एआई: इनोवेशन निगरानी और अनुकूलन में संतुलन विषय पर आयोजित सत्र का नेतृत्व मलेशिया ने किया।इस सत्र में यह स्पष्ट किया गया कि एआई संसदीय प्रक्रियाओं को अधिक कुशल, पारदर्शी और डेटा- आधारित बना सकता है,जैसे विधायी शोध,प्रश्नोत्तर प्रणाली, दस्तावेज़ प्रबंधन और नागरिक फीडबैक विश्लेषण।हालांकि, इसके साथ ही निगरानी,डेटा गोपनीयता एल्गोरिदमिक पक्षपात और लोकतांत्रिक जवाबदेही जैसे गंभीर प्रश्न भी जुड़े हुए हैं।सम्मेलन में इस बात पर सहमति बनी कि एआई को संसद का सहायक बनाया जाना चाहिए, निर्णायक नहीं। तकनीक का उद्देश्य लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त करना होना चाहिए, न कि उन्हें कमजोर करना।सोशल मीडिया और सांसदों पर इसका प्रभाव-डिजिटल युग में सोशल मीडिया राजनीति और संसद दोनों के लिए एक शक्तिशाली लेकिन दोधारी तलवार बन चुका है। इस विषय पर आयोजित सत्र का नेतृत्व श्रीलंका द्वारा किया गया।चर्चा में यह सामने आया कि सोशल मीडिया ने सांसदों को सीधे जनता से जोड़ने का माध्यम तो दिया है, लेकिन इसके साथ ही त्वरित प्रतिक्रियाओं का दबाव,ट्रोलिंग, दुष्प्रचार और भावनात्मक राजनीति को भी बढ़ावा मिला है।कई देशों के प्रतिनिधियों ने साझा किया कि कैसे सोशल मीडिया ट्रेंड्स कभी-कभी संसदीय प्राथमिकताओं और विधायी विमर्श को प्रभावित करने लगते हैं।इस सत्र का निष्कर्ष यह रहा कि सांसदों और स्पीकर्स के लिए डिजिटल साक्षरता, आचार संहिता और संस्थागत दिशानिर्देशों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।
साथियों बात अगर कर हम मतदान से परे नागरिक सहभागिता: लोकतंत्र का विस्तार इसको समझने की करें तो, लोकतंत्र को केवल चुनाव और मतदान तक सीमित रखना आज की जटिल सामाजिक- राजनीतिक वास्तविकताओं में अपर्याप्त माना जा रहा है। इसी संदर्भ में संसद की सार्वजनिक समझ और मतदान से परे नागरिक भागीदारी को बढ़ानेके लिए अभिनव रणनीतियाँ विषय पर सत्र आयोजित किया, जिसमें नाइजीरिया और दक्षिण अफ्रीका ने प्रमुख योगदान दिया।इस सत्र में नागरिक सभाओं, डिजिटल कंसल्टेशन, युवाओं की संसदीय सहभागिता, और संसद-नागरिक संवाद मंचों जैसे नवाचारों पर चर्चा हुई। प्रतिनिधियों ने इस बात पर बल दिया कि जब नागरिक स्वयं को केवल मतदाता नहीं, बल्कि नीति-निर्माण प्रक्रिया का सहभागी मानने लगते हैं, तभी लोकतंत्र वास्तव में सशक्त होता है।
साथियों बात अगर हम इस मंच से प्रधानमंत्री का उद्घाटन संबोधन को समझने की करें तो, भारतीय लोकतंत्र का वैश्विक संदेश 15 जनवरी 2026 को सुबह 10:30 बजे, नई दिल्ली स्थित संसद भवन परिसर के संविधान सदन के केंद्रीय हॉल में भारत के प्रधानमंत्री द्वारा 28वें सीएसपीओसी सम्मेलन का औपचारिक उद्घाटन किया गया। यह क्षण न केवल भारत के लिए,बल्कि पूरे राष्ट्रमंडल के लिए प्रतीकात्मक महत्व रखता था।पीएम ने अपने संबोधन में कहा कि भारत में डेमोक्रेसी का अर्थ लास्ट माइल डिलीवरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र केवल संस्थाओं और चुनावों तकसीमित नहीं है, बल्कि उसका वास्तविक मूल्य तब सामने आता है जब शासन की नीतियाँ समाज के अंतिम व्यक्ति तक बिना किसी भेदभाव के पहुँचती हैं। पीएम ने अपने भाषण में लोक कल्याण की भावना को भारतीय लोकतंत्र की आत्मा बताया। उन्होंने कहा कि इसी दृष्टिकोण के कारण पिछले कुछ वर्षों में भारत में 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकल सके हैं।यह कथन केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि का उल्लेख नहीं था, बल्कि यह उस मॉडल की ओर संकेत करता है जिसमें लोकतांत्रिक शासन को सामाजिक न्याय, समावेशन और विकास से जोड़ा गया है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के लिए यह संदेश महत्वपूर्ण था कि लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब वह लोगों के जीवन में ठोस बदलाव लाता है।
साथियों बात अगर हम भारत की लोकतांत्रिक भूमिका: एक वैश्विक दृष्टिकोण इसको समझने की करें तो सीएसपीओसी 2026 के माध्यम से भारत ने स्वयं को केवल एक मेजबान देश के रूप में नहीं,बल्कि लोकतांत्रिक विचारों के वैश्विक केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया। भारत का अनुभव, विविधता, विशाल जनसंख्या, डिजिटल शासन और सामाजिक कल्याण अन्य राष्ट्रमंडल देशों के लिए सीख और प्रेरणा दोनों का स्रोत बना।सम्मेलन में यह स्पष्ट रूप से उभरा कि भारत लोकतंत्र का प्रयोगशाला ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र के भविष्य पर विचार करने वाला एक प्रमुख वैश्विक हितधारक भी है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि 28वां राष्ट्रमंडल संसदीय अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आत्ममंथन का वैश्विक मंच था। तकनीक,सोशल मीडिया, नागरिक सहभागिता और संस्थागत भूमिका जैसे विषयों पर हुई चर्चाओं ने यह स्पष्ट किया कि लोकतंत्र स्थिर नहीं, बल्कि निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है।सीएसपीओएस 2026 ने यह संदेश दिया कि यदि संसदें प्रासंगिक रहना चाहती हैं, तो उन्हें नवाचार और परंपरा, स्वतंत्रता और जवाबदेही, तथा तकनीक और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन साधना होगा। भारत में आयोजित यह सम्मेलन आने वाले वर्षों में राष्ट्रमंडल लोकतंत्रों के लिए दिशा-निर्देशक के रूप में याद किया जाएगा।
-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425