
21 जनवरी पर विशेष
- भारत देश अपनी स्वतंत्रता के अमृत काल के सोपान पर आरूढ़ हो चुका है। इस तथ्य के आलोक में भारत भूमि के वीरों देशभक्ति का स्मरण किया जा रहा है। अखंड भारत के सुदूर पश्चिम क्षेत्र में स्थित सिंध क्षेत्र के योद्धा वीर सपूत हेमू कालानी का स्मरण आज समीचीन है ।स्वाधीनता आंदोलन के अप्रतिम योद्धा तथा भारत देश के गौरवशाली इतिहास के अमर वीर सपूत हेमू कालानी का स्मरण जन सामान्य में अत्यंत ही श्रद्धा विनम्रता आधार के साथ लिया जाता है। भारत माता को अंग्रेज आतताइयों की दासता से मुक्त करने तथा संपूर्ण राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधने के लिए युवा हेमू कालानी ने अपने जीवन की आहुति दे दी थी। हेमू कालानी का जन्म 23 मार्च सन 1923 को सिंध प्रांत के सखर नामक शहर में हुआ था। माता का नाम जेठीबाई और पिता का नाम पेशूमल था। हेमू कालानी सखर के सुप्रसिद्ध तिलक हाई स्कूल में अध्ययन करते थे। वह मेधावी छात्र थे ।बाल्य काल से ही देश प्रेम की भावना उनके हृदय में अपना स्थान बना चुकी थी एक उदाहरण यहां प्रस्तुत करना चाहता हूं। 23 मार्च सन 1931 सरदार भगत सिंह की फांसी का दिन था और दूसरी तरफ उसी दिन नवयुवक हेमू का आठवां जन्मदिन था। लेकिन वह मात्र 8 वर्ष का बालक न तो कभी खिलौने लेने की जिद कर रहा था और न ही अपने माता-पिता से मिठाई ही मांग रहा था। हेमू अपने घर शहीद होने का अभ्यास कर रहा था। इस समय मां ने हेमू के इस कृत्य को देखा और आश्चर्यचकित होकर पूछा बेटा यह क्या कर रहे हो? हेमू ने अत्यंत शांत भाव से उत्तर दिया मां मैं भी शहीद भगत सिंह की तरह फांसी पर चढूंगा। मां ने बालक हेमू को प्यार से समझाया और शीघ्रता से उसके हाथ से रस्सी ले ली। लेकिन उनको यह क्या मालूम था कि उनका प्रिय पुत्र हेमू एक दिन भारत माता को स्वतंत्र करने के लिए वास्तव में फांसी के फंदे को चूम लगा और शहीद हो जाएगा। यह भारत देश के पराधीनता के काल की घटना है ।जब आतताई अंग्रेज अपने क्रूर दमन चक्र से स्वतंत्रता के सिपाहियों से स्वतंत्रता के पुजारियो से जीवन जीने का अवसर और अधिकार छीन रहा था।आम समाज अंग्रेजों के निर्दयता पूर्ण व्यवहार से कराह रहा था ।ऐसे समय में भारतवासियों का आत्म सम्मान अंग्रेजों के प्रति रोष की अग्नि और विद्रोह की ज्वाला में धधक उठा जब युवा हेमू को फांसी की सज़ा सुनाई गई।
23 अक्टूबर 1942 की रात चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था और अचानक इस सन्नाटे को चीरती हुई टन टन की आवाज़ें आने लगी यह आवाज रेलवे पटरी से फिश प्लेट निकालते हुए तीन सिंधी नवयुवक विद्यार्थियों द्वारा किए गए कार्य से आ रही थी। यह सिंधी नवयुवक स्वराज सेवा के मार्गदर्शन में 1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े थे।
क्वेटा नामक शहर के आंदोलनकारी देश भक्तों को कुचलने के लिए कराची से अंग्रेज सिपाहियों की गोरी पलटन को लेकर जाने वाली विशेष रेलगाड़ी को उड़ा देने की योजना इन सिंधी नवयुवकों ने बना रखी थी। रेलवे लाइन के आसपास गश्त लगाते हुए अंग्रेज सिपाहियों ने यह टन-टन की आवाज सुनी। युवकों को फिश प्लेटें निकालते हुए देखकर वह बड़ी फुर्ती से उनकी ओर दौड़ कर टूट पड़े। इन युवकों में से दो युवक वहां से सफलतापूर्वक निकल गए । परंतु एक युवक वहीं पर डटा रहा सीना तानकर खड़ा रहा और पकड़ा गया ।यह सिंधी नवयुवक भारत माता का सपूत हेमू कालानी था। हेमू को गिरफ्तार किया गया ।उसे शारीरिक यातनाएं दी गई ।साथियों के नाम बताने के लिए दबाव बनाया गया। लेकिन इस वीर बालक ने अपनी जबान नहीं खोली। हेमू पर राजद्रोह का अभियोग लगाकर अंग्रेजों के सैनिक न्यायालय में मुकदमा चलाया गया। इस मुकदमे में उसे 10 वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई । जो बाद में हैदराबाद मुख्यालय के प्रमुख शासक रिचर्डसन द्वारा फांसी में बदल दी गई। रिचर्डसन के आदेश में परिवर्तन करने के लिए हेमू कालानी पर माफी मांगने के लिए दबाव डाला गया । उस धीरोदात्त युवक ने साहसी युवक ने क्षमा मांगने से इनकार कर दिया ।अंततः रिचर्डसन के निर्दयी निर्णय अनुसार 21 जनवरी सन 1943 के दिन भारत माता का यह वीर सपूत भारत माता की जय के उद्घोष के साथ फांसी के फंदे पर प्रसन्न भाव से चढ़ गया।
फांसी के पश्चात उसके पार्थिव शरीर का परंपरा अनुसार अंतिम संस्कार किया गया। सिंध के शहर सखर में उस दिन वीर हेमू को फांसी दिए जाने के विरोध में प्रदर्शन हुए हड़ताल रखी गई ।
भारत देश को अंग्रेजों के चंगुल से स्वतंत्र कराने के लिए देश के कोने-कोने से वीरों ने वीरांगनाओं ने अपने प्राण की आहुति दे दी थी। हेमू कालानी जैसे वीर नवयुवक के जीवन से यह प्रेरणा मिलती है कि नवयुवकों को देशभक्ति के भाव से ओतप्रोत होकर अनुशासन वध रहकर इस पवित्र भूमि की सुरक्षा करनी चाहिए।
प्रो रविप्रकाश टेकचंदानी
विभागाध्यक्ष
भारतीय भाषाएं एवं साहित्यिक अध्ययन विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय
तथा
अध्यक्ष
सेंटर फॉर इंडिपेंडेंस एंड पार्टीशन स्टडीज
दिल्ली विश्वविद्यालय